देश की खबरें | भारत-पाक तनाव: डर, सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बाढ़ से मानसिक स्वास्थ्य हो रहा प्रभावित
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. सात साल की हेजल के लिए इस हफ्ते की शुरुआत तक पाकिस्तान सिर्फ एक नाम था। अब दरवाजे पर हर दस्तक के साथ वह सशंकित हो जाती है और किसी आसन्न खतरे के बारे में सोचकर परेशान हो जाती है।
नयी दिल्ली, 11 मई सात साल की हेजल के लिए इस हफ्ते की शुरुआत तक पाकिस्तान सिर्फ एक नाम था। अब दरवाजे पर हर दस्तक के साथ वह सशंकित हो जाती है और किसी आसन्न खतरे के बारे में सोचकर परेशान हो जाती है।
अन्नू मैथ्यू को अपनी बेटी हेजल को यह समझाने में मुश्किल हो रही है कि वह केरल के त्रिवेंद्रम में किसी सीधे खतरे की जद में नहीं है।
मैथ्यू ने कहा, ‘‘यह सब तब शुरू हुआ, जब उसके स्कूल में जागरूकता सत्र था और फिर उसने कक्षा में अपने दोस्तों से कुछ बातें सुनीं। अब वह चाहती है कि मैं दरवाजा खोलने से पहले सावधान रहूं। वह कहती है कि पाकिस्तान हम पर हमला करेगा और हर कोई मर जाएगा।’’
हेजल अकेली नहीं है। सैकड़ों मील दूर दिल्ली में 36 वर्षीय महेंद्र अवस्थी ने कहा कि उन्हें नींद नहीं आती। बच्ची अपने आस-पास की बातचीत से परेशान है, तो युवा सोशल मीडिया का सहारा ले रहे, जिन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि किस तथ्य पर विश्वास करें और किस पर नहीं।
शनिवार शाम को पाकिस्तान और भारत के बीच सैन्य टकराव रोकने पर बनी सहमति के बावजूद लोग सहमे हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव रोकने पर सहमति बन गई है। राहत की यह भावना जल्द ही नयी चिंता में बदल गई, जब पाकिस्तान द्वारा कई सीमावर्ती क्षेत्रों में विस्फोटों और ‘ब्लैकआउट’ के साथ उस समझौते का उल्लंघन करने की खबरें आईं।
हर कोई चिंतित है।
इसकी शुरुआत छह-सात मई की रात को हुई, जब भारत ने पहलगाम में हुए हमले के प्रतिशोध में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आतंकवादी अड्डों के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया। अगले दिनों में, दोनों देशों ने सीमा से लगे प्रमुख शहरों में गोलाबारी की।
इन सबका मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच बढ़ता सैन्य तनाव, सूचनाओं की बाढ़, तथा झूठी और सच्ची खबरों में अंतर करने में असमर्थता, व्यक्तियों के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।
क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक श्वेता शर्मा के अनुसार, संभावित युद्ध की निरंतर चर्चा लोगों में ‘‘प्रतिकूल आघात’’ प्रतिक्रिया को जन्म दे सकती है, यहां तक कि उन लोगों में भी जो संघर्ष क्षेत्रों से दूर रहते हैं।
शर्मा ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘लगातार मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया और भावनात्मक विषय वस्तु मस्तिष्क के तनाव विनियमन तंत्र को प्रभावित कर सकती है। युद्ध से संबंधित भय अक्सर अनिश्चितता से उत्पन्न होते हैं-यह कितना आगे तक जाएगा, कौन प्रभावित होगा और इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे?’’
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)