नयी दिल्ली, 30 सितम्बर पिता की आकांक्षा भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में चयन के मानकों को परिभाषित नहीं करता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेना की जीवन शैली के उपयुक्त नहीं पाए जाने पर एक उम्मीदवार को भारतीय सेना अकादमी में वापस लेने का निर्देश देने से इंकार करते हुए यह टिप्पणी की।
लेफ्टिनेंट कर्नल का बेटा जुलाई 2017 में आईएमए में कमीशन पूर्व प्रशिक्षण के लिए शामिल हुआ था ताकि भारतीय सेना में कमीशंड अधिकारी बन सके। बहरहाल, उसे नवम्बर 2019 में अकादमी से हटाने का आदेश दिया गया।
न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ और न्यायमूर्ति आशा मेनन की पीठ ने टिप्पणी की कि उम्मीदवार का पिता भारतीय सेना में अधिकारी है और अपने बेटे के प्रति नरम रूख अपनाने की याचिका दी। याचिका में उन्होंने कहा कि भारतीय सेना में उनके बेटे का अधिकारी बनना उनके लिए काफी मायने रखता है क्योंकि उनके परिवार की चौथी पीढ़ी से कोई सेना में शामिल हो रहा है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम लेफ्टिनेंट कर्नल के प्रति सहानुभूति रख सकते हैं लेकिन पिता की आकांक्षा भारतीय सेना में कमीशंड अधिकारी के चयन के मानकों को परिभाषित नहीं करता है।’’
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उच्च न्यायालय ने गौर किया कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि उम्मीदवार को आईएमए के रेजिमेंट और काफी अनुशासित जीवन शैली का अभ्यस्त बनने में कठिनाई हो रही थी।
अदालत ने कहा कि वह प्रशिक्षण में अनुपस्थित रहता था और बीमारी की बात बताकर महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में नहीं जाता था और अनुपस्थित रहने के कारण और कारणों के बारे में झूठ बोलने के चलते उसे कई बार दंडित किया गया और उसके खिलाफ ऑनर कोड कमिटी गठित हुई।
पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता सेना की जीवनशैली के उपयुक्त नहीं है और संभवत: उसके पिता की इच्छा के कारण वह इसमें आया और अपने पिता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए संघर्षरत है।
पीठ ने कहा, ‘‘पिता को सलाह दी जाती है कि वह अपने बेटे को अपना जीवन मार्ग चुनने की आजादी दे और वह जो भी चुनता है उसमें आगे बढ़े और निश्चित रूप से उसका विकल्प भारतीय सेना नहीं है।’’
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