देश की खबरें | अदालत ने पीएफआई के नेता की मेडिकल आधार पर ज़मानत मांगने वाली याचिका 12 जनवरी के लिए सूचीबद्ध की

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पूर्व प्रमुख की मेडिकल आधार पर ज़मानत की मांग करने वाली याचिका को सुनवाई के लिए 12 जनवरी को सूचीबद्ध किया है और कहा है कि उसके खिलाफ मामला गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम (यूएपीए) का है जो मामूली अपराध से संबंधित नहीं है।

नयी दिल्ली, छह जनवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पूर्व प्रमुख की मेडिकल आधार पर ज़मानत की मांग करने वाली याचिका को सुनवाई के लिए 12 जनवरी को सूचीबद्ध किया है और कहा है कि उसके खिलाफ मामला गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम (यूएपीए) का है जो मामूली अपराध से संबंधित नहीं है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत अपनी खराब सेहत को लेकर इलाज के संबंध है तो उसे घर भेजने के बजाय अस्पताल भेजा जाना चाहिए।

अदालत ने कहा, “ आप इलाज के लिए कह रहे हैं। आपको घर नहीं भेजा जा सकता है। आप केरल जाना चाहते हैं। एम्स क्यों नहीं?... हम यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि आपको बेहतरीन इलाज मिले।”

अपनी याचिका में अबूबकर ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है जिसमें उसे मेडिकल आधार पर ज़मानत देने से इनकार किया गया है।

ई. अबूबकर को पिछले साल राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार किया था और वह फिलहाल न्यायिक हिरासत में है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अबूबकर की हालत गंभीर है और सिर्फ इलाज ही काफी नहीं हैं और उपचार के बाद देखभाल की भी जरूरत है। वकील ने अदालत से आग्रह किया कि उसे छह महीने की अंतरिम ज़मानत पर रिहा किया जाए।

अदालत को पहले सूचित किया गया था कि 70 वर्षीय अबूबकर को कैंसर है और वह पार्किंसन रोग से पीड़ित है और काफी दर्द में है। लिहाज़ा तत्काल इलाज की जरूरत है।

अदालत ने पूछा कि क्या यूएपीए के तहत दर्ज मामले पर ज़मानत देने पर रोक (अगर प्रथम दृष्टया मामला न बनता हो तो) तब लागू होती है जब आरोपी मेडिकल आधार पर ज़मानत की मांग कर रहा हो और क्या याचिकाकर्ता को केस डायरी और अन्य प्रासंगिक दस्तावेज़ों पर विचार किए बिना रिहा किया जा सकता है?

पीठ ने कहा, “ आप तैयार होकर आ सकते हैं लेकिन आपको हमारे प्रश्नों का जवाब देना होगा क्योंकि ये मामूली अपराध नहीं हैं। ये यूएपीए के तहत अपराध हैं। उन्होंने आप पर साजिश का आरोप लगाया है। आपको हमें आरोप पत्र... डेली डायरी दिखानी होगी ।”

याची के वकील ने दलील दी कि भीमा कोरोगांव मामले समेत अन्य प्रकरणों में भी यूएपीए के तहत आरोपियों को अंतरिम ज़मानत दी गई है और कहा कि बीमार को ज़मानत दी जा सकती है।

एनआईए के वकील ने कहा कि मामले में जांच जारी है और याचिकाकर्ता को निचली अदालत ने जेल में ‘सेवादार’ की इजाज़त दी है और उच्च न्यायालय में कार्यवाही ‘समानांतर’ प्रकृति की है।

एनआईए ने पहले अदालत को बताया था कि अबूबकर ‘बिल्कुल ठीक’ है और उसे जरूरी इलाज दिया जा रहा है। उसने यह भी कहा था कि वह आरोपी को इलाज देने का विरोध नहीं करती है।

पिछले महीने अदालत ने अबूबकर को नजरबंद करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि जरूरत पड़ने पर उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा।

अदालत ने टिप्पणी की थी कि कानून में नज़रबंद करने का कोई प्रावधान नहीं और निर्देश दिया था कि अबूबकर को जांच के लिए हिरासत में एम्स ले जाया जाए। अदालत ने इस दौरान उसके बेटे को मौजूद रहने की इजाज़त दे दी थी।

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