देश की खबरें | उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का उद्देश्य उपभोक्तावाद को बढ़ावा देना : न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 देश में उपभोक्तावाद को प्रोत्साहित करने के लिए है और उपभोक्ताओं के खिलाफ इसके प्रावधानों की व्याख्या करने का कोई भी तकनीकी दृष्टिकोण इसके पीछे के उद्देश्य को विफल कर देगा।
नयी दिल्ली, 15 मई उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 देश में उपभोक्तावाद को प्रोत्साहित करने के लिए है और उपभोक्ताओं के खिलाफ इसके प्रावधानों की व्याख्या करने का कोई भी तकनीकी दृष्टिकोण इसके पीछे के उद्देश्य को विफल कर देगा।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश की पीठ ने कहा कि एक “रूढ़िवादी और अति-तकनीकी दृष्टिकोण” उपभोक्तावाद की अवधारणा को नुकसान पहुंचाएगा।
शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी एक आवासीय परियोजना को पूरा करने से संबंधित एक मामले में पारित राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई के दौरान आई।
पीठ ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का एक “प्रशंसनीय उद्देश्य” है और 2019 का कानून उपभोक्ताओं को बहुत ही लचीली प्रक्रिया प्रदान करके मंचों से संपर्क करने की सुविधा देता है।
न्यायालय ने कहा, “यह देश में उपभोक्तावाद को प्रोत्साहित करने के लिए है। उपभोक्ता के खिलाफ प्रावधानों को बनाने में कोई भी तकनीकी दृष्टिकोण अधिनियमन के पीछे के उद्देश्य के खिलाफ जाएगा।”
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता हरियाणा पंजीकरण और सोसायटी के विनियमन (एचआरआरएस) अधिनियम, 2012 की धारा 6 के तहत पंजीकृत एक फ्लैट आवंटियों का संघ है, जबकि प्रतिवादी एक बिल्डर है जिसे आवास परियोजना के विकास का काम सौंपा गया है।
अपने फैसले में, पीठ ने यह भी पाया कि एसोसिएशन ने एनसीडीआरसी से संपर्क किया था और आरोप लगाया था कि बिल्डर तय समय सीमा के भीतर वादा किए गए फ्लैटों के निर्माण और उन्हें पूरा करने के दायित्व में विफल रहा है और अतिरिक्त मांगों पर भी सवाल उठा रहा है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि बाद में, बिल्डर द्वारा सोसायटी के जिला रजिस्ट्रार के पास एक शिकायत दर्ज की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्ता संघ के उपनियमों में उल्लिखित लक्ष्य और उद्देश्य एचआरआरएस अधिनियम के अनुरूप नहीं थे।
मामले के विवरण का उल्लेख करते हुए, पीठ ने पाया कि हरियाणा के प्रदेश निबंधक ने एसोसिएशन को छह महीने के भीतर अपने उपनियमों में संशोधन करने का निर्देश दिया था, जिसमें यह संकेत दिया गया था कि अनुपालन करने में किसी भी विफलता के परिणामस्वरूप पहले से ही प्रदान किया गया पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा।
एसोसिएशन ने एक संशोधन किया था जिसे नवंबर 2019 में गुरुग्राम जिला रजिस्ट्रार द्वारा विधिवत पंजीकृत किया गया था।
पीठ द्वारा इस पर भी संज्ञान लिया गया कि बाद में, गुरुग्राम जिला रजिस्ट्रार ने जून 2020 में एक आदेश द्वारा संशोधनों पर इस आधार पर रोक लगा दी कि छह महीने की अवधि समाप्त हो गई थी।
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता का पंजीकरण रद्द नहीं किया गया था।
शीर्ष अदालत ने पाया कि बाद में प्रदेश निबंधक और हरियाणा के महानिबंधक द्वारा मामले में पारित आदेशों को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए स्थगन की मांग की गई। यह मामला अब भी लंबित है और कोई अंतरिम आदेश फिलहाल नहीं दिया गया।
एनसीडीआरसी ने भी अदालत में मामला लंबित होने के मद्देनजर याचिकाकर्ताओं की याचिका पर अदालत के उचित निर्देश तक सुनवाई स्थगित कर दी थी।
इस पर एसोसिएशन ने शीर्ष अदालत का रुख किया और एनसीडीआरसी के आदेश को रद्द करने की मांग की।
न्यायालय ने पाया कि पांच वर्ष बीतने के बाद भी मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है।
पीठ ने कहा, “इस मामले को देखते हुए, आक्षेपित आदेश को दरकिनार किया जाता है, और अपील स्वीकार की जाती है। लंबित आवेदनों, यदि कोई हों, का निस्तारण किया जाता है। राष्ट्रीय आयोग मामलों की गुण-दोष के आधार पर शीघ्रता से सुनवाई करेगा।”
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