देश की खबरें | भाजपा शासित मप्र, राजस्थान ने रॉयल्टी से जुड़े फैसले के कार्यान्वयन पर केंद्र का समर्थन किया

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नयी दिल्ली, 31 जुलाई भाजपा शासित मध्य प्रदेश और राजस्थान ने खदानों एवं खनिजों पर रॉयल्टी एवं कर पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को इसकी तारीख के बाद से लागू करने के लिए केंद्र की मांग का बुधवार को शीर्ष अदालत में समर्थन किया और कहा कि वे ‘‘नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण’’ अपनाएंगे तथा राशि की वापसी की मांग नहीं करेंगे।

हालांकि, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने केंद्र की मांग का विरोध किया और 25 जुलाई के फैसले को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू करने की मांग की। ओडिशा में नवनिर्वाचित भाजपा सरकार ने इस बारे में कोई स्पष्ट रुख नहीं जाहिर किया।

प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रखा कि क्या खनिज अधिकारों एवं खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति को बरकरार रखने वाले उसके 25 जुलाई के फैसले को पूर्वव्यापी या निर्णय आने की तारीख के बाद से क्रियान्वित किया जाना चाहिए।

पीठ ने 25 जुलाई को एक महत्वपूर्ण फैसले में 8:1 के बहुमत से निर्णय सुनाया था कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति राज्यों के पास है और खनिजों पर भुगतान की गई रॉयल्टी कर नहीं है।

इसमें इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु मामले में 1989 के उस फैसले को खारिज कर दिया गया, जिसमें कहा गया था कि खनिजों और खनिज वाली भूमि पर रॉयल्टी लगाने की शक्ति केवल केंद्र के पास है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ बताया कि मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों ने नागरिक केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने तथा फैसले को निर्णय आने की तारीख के बाद से कार्यान्वित करने का समर्थन करने का फैसला किया है।

उन्होंने कहा कि 25 जुलाई के फैसले को पूर्वव्यापी करने से आम नागरिकों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि कंपनियां उन पर वित्तीय बोझ डालेंगी।

झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने 25 जुलाई के फैसले को पूर्वव्यापी बनाने की वकालत की और कहा, ‘‘यह भी याद रखा जाना चाहिए कि खनिज समृद्ध राज्य देश में सबसे गरीब हैं और कर लगाने को चुनौती देने वाली कंपनियां देश में सबसे अमीर कंपनियां हैं।’’

द्विवेदी ने कहा कि राज्य का खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकरण गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहा है और यह पिछले चार वर्षों से न तो अपने कर्मचारियों को भुगतान कर पाया है और न ही अपने पूर्व कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति-सह-मृत्यु लाभ का भुगतान कर पाया है।

ओडिशा सरकार के महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य ने 25 जुलाई के फैसले के पूर्वव्यापी या निर्णय की तारीख के बाद से प्रभावी बनाने पर राज्य सरकार का कोई स्पष्ट रुख नहीं बताया और कहा कि ओडिशा सरकार अपने लोगों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।

उत्तर प्रदेश में शक्तिनगर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने भी 25 जुलाई के फैसले को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने की मांग की।

खनन कंपनियों सहित विभिन्न संगठनों की ओर से पेश हुए हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी, अभिषेक सिंघवी और अरविंद दत्तार सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने फैसले को निर्णय की तारीख के बाद से क्रियान्वित करने की केंद्र की मांग का समर्थन किया।

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