देश की खबरें | इलाहबाद उच्च न्यायालय ने पीठासीन अधिकारी के खिलाफ स्थानांतरण याचिका खारिज की
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प्रयागराज, तीन मई इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक पीठासीन अधिकारी के खिलाफ दायर स्थानांतरण याचिका आरोपों के समर्थन में साक्ष्य की कमी के आधार पर खारिज कर दी है।
अदालत ने याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये हर्जाना भी लगाया और कहा कि अदालतें अवमानना के अधिकारों का उपयोग करने से परहेज कर रही हैं, जिसकी वजह से वादी तेजी से न्यायपालिका के प्रति आक्रामक रुख अपना रहे हैं।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने उक्त आदेश पारित करते हुए कहा कि अदालतें नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार के सम्मान में अवमानना के अधिकारों का उपयोग करने से हिचकती हैं, ऐसे में, इस उदार दृष्टिकोण का दुरुपयोग न्यायाधीशों के खिलाफ निंदनीय आरोप लगाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मौजूदा दौर में वादी किसी ना किसी कारण से आक्रामक रुख अपना रहे हैं। अदालतें आपराधिक अवमानना के अधिकारों का उपयोग करने से परहेज करती हैं क्योंकि वे नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सम्मान करती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि बिना किसी आधार के अदालतों पर किसी तरह का निंदनीय आरोप लगाया जाए।”
मामला बरेली का है जहां राजस्व परिषद ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत मामले को अपर आयुक्त (न्यायिक) तृतीय से किसी दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने से मना कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने पीठासीन अधिकारी और प्रतिवादी के बीच मिलीभगत व पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा था कि इसी वजह से मामले में सुनवाई लंबे समय से टल रही है। उसने इसे साक्ष्य के तौर पर पेश किया।
सुनवाई के दौरान, उच्च न्यायालय ने इन दावों को पूरी तरह से निंदनीय और साक्ष्य रहित पाया।
अदालत ने 25 अप्रैल, 2025 को दिए अपने निर्णय में कहा, “एक गलत आदेश या एक गलत प्रक्रिया से पक्षपात का निष्कर्ष नहीं निकलता। इसी तरह, सुनवाई में पीठासीन अधिकारी की तरफ से विलंब मात्र से पक्षपात का आधार नहीं बनता।”
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