देश की खबरें | ठाणे के एक व्यक्ति को नाबालिग रिश्तेदार से दुष्कर्म करने के जुर्म में 10 साल की जेल

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ठाणे (महाराष्ट्र), 30 जून ठाणे की एक अदालत ने 15 वर्षीय अपनी रिश्तेदार से दुष्कर्म करने के जुर्म में एक व्यक्ति को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनायी है। बलात्कार के बाद किशोरी गर्भवती हो गई थी।

अदालत ने कहा कि इस सजा से यह संदेश जाना चाहिए कि ऐसे अपराधियों से ‘‘सख्ती’’ से निपटा जाता है।

बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पोक्सो) अदालत के विशेष न्यायाधीश डी एस देशमुख ने 16 जून को दिए आदेश में बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि संबंध आपसी सहमति से बने थे। न्यायाधीश ने कहा कि पोक्सो कानून के तहत नाबालिग की सहमति मायने नहीं रखती है।

महाराष्ट्र के ठाणे जिले में उल्हासनगर निवासी 35 वर्षीय आरोपी ने पीड़िता की रिश्ते की एक बहन से शादी की है और उसका एक बेटा है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता अपने पिता की मृत्यु के बाद नवी मुंबई के घनसोली में आरोपी के घर चली गई। आरोपी ने पीड़िता को गलत तरीके से छूआ और जुलाई 2016 में जब उसकी पत्नी सो गयी तो उसने लड़की से दुष्कर्म किया। उसने पीड़िता को धमकी दी कि अगर उसने घटना के बारे में किसी को बताया तो वह अपनी पत्नी को छोड़ देगा।

उससे बचने के लिए पीड़िता ठाणे शहर में एक और रिश्तेदार के घर रहने चली गयी।

अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी ने वहां भी उसका पीछा किया, उससे अपने ‘‘प्यार’’ का इजहार किया और शादी का झांसा देकर उससे दुष्कर्म करता रहा।

दिसंबर 2016 में पीड़िता को पता चला कि वह गर्भवती है और उसने आरोपी को इसके बारे में बताया, जिसने उसे गर्भपात की दवा दी लेकिन गर्भपात नहीं हो पाया।

इसके बाद आरोपी और उसकी मां लड़की को उल्हासनगर के एक अस्पताल लेकर गए, जहां एक चिकित्सक ने कहा कि गर्भपात संभव नहीं है क्योंकि वह छह महीने की गर्भवती है।

इसके बाद पीड़िता आरोपी के घर लौट आयी। उसकी मां ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया। आरोपी ने अपने घर पर कई बार उससे दुष्कर्म किया।

पीड़िता ने बाद में अपनी बहनों और मां को इसके बारे में बताया, जिसके बाद मई 2017 में आरोपी के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया। वह 17 अप्रैल 2019 से न्यायिक हिरासत में है।

अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और महत्वपूर्ण डीएनए साक्ष्य पेश किए।

अदालत ने कहा, ‘‘उपरोक्त तथ्यों से यह साफ है कि डीएनए रिपोर्ट को स्वीकार किया जाना चाहिए, जब तक कि इसमें कोई त्रुटि न हो और डीएनए जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है, बशर्ते कि रक्त का नमूना उचित रूप से लिया जाए और नमूने में किसी प्रकार की छेड़छाड़ का संकेत देने वाला कोई सबूत न हो।’’

वहीं, बचाव पक्ष ने दलील दी कि संबंध सहमति से बने थे और उसने डीएनए नमूना इकट्ठा करने को चुनौती दी। आरोपी ने सजा में नरमी बरतने की अपील की और कहा कि वह पहले ही छह साल से अधिक समय से जेल में है और उसकी पत्नी और छोटा बेटा उस पर निर्भर है।

बहरहाल, अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता के कारण अधिकतम सजा दिए जाने की पैरवी की।

अदालत ने आरोपी को पोक्सो कानून और भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

अदालत ने कहा, ‘‘इस मामले में आरोपी ने 15 साल की पीड़िता का यौन शोषण किया, जिससे वह गर्भवती हो गयी जबकि वह उसकी रिश्ते की बहन का पति है।’’

उसने कहा, ‘‘इसलिए सजा यौन उत्पीड़न के कृत्य के अनुरूप होनी चाहिए और समाज को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि ऐसे मामलों में अपराधियों से सख्ती से निपटा जाता है।’’

मामले में सह-आरोपी उसकी मां को पर्याप्त सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।

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