अपनी अलग मुद्रा क्यों छाप रहा है जर्मनी का एक कस्बा
जर्मनी के एक स्कूल में अर्थशास्त्र के टीचर और बच्चों ने नकली नोटों के साथ एक एक्सपेरिमेंट शुरू किया.
जर्मनी के एक स्कूल में अर्थशास्त्र के टीचर और बच्चों ने नकली नोटों के साथ एक एक्सपेरिमेंट शुरू किया. अब ये नोट दुकानदारों और पर्यावरण की मदद भी कर रहे हैं.जर्मन राज्य बवेरिया के किमगाउ इलाके में अगर आप किसी बेकरी या किताबों की दुकान में जाएंगे, तो आपको कुछ अलग नजर आ सकता है. यहां कुछ ग्राहक जर्मनी और पूरे यूरोजोन की मुद्रा, यूरो के बजाए अलग दिखने वाले रंगीन नोटों से भुगतान करते दिखते हैं. इन नोटों पर टिड्डे और दूसरे कीट बने होते हैं. एक पुस्तक विक्रेता ने डीडब्ल्यू को बताया, "करीब 10 से 15 फीसदी ग्राहक इसी तरह भुगतान करते हैं."
स्थानीय लोग अपनी इस मुद्रा को "किमगाउअर" कहते हैं. यह एक ऐसी मुद्रा है जिसे उन्होंने खुद बनाया है. किसी देश के भीतर एक गैरआधिकारिक वित्तीय प्रणाली, अजीबोगरीब लगने के बावजूद यह किमगाउअर छोटे वित्तीय तंत्र का हिस्सा है और यहां, यह व्यवस्था दो दशकों से ज्यादा समय से चल रही है. हाल के बरसों में जलवायु से जुड़ी बहस के बीच इसकी अहमियत और बढ़ चुकी है. यह स्थानीय मुद्रा कार्बन उत्सर्जन को घटाने में अहम भूमिका निभा रही है.
एक कक्षा से शुरू हुआ प्रयोग कैसे पूरे इलाके में फैल गया?
किमगाउअर की शुरुआत 2003 में एक स्थानीय स्कूल से हुई. अर्थशास्त्र के एक शिक्षक क्रिस्टियान गेलेरी और उनके छात्रों ने इसे शुरू किया था. वे स्थानीय दुकानों को बचाने का तरीका खोज रहे थे. उस समय बड़े शॉपिंग मॉल और चेन स्टोरों के कारण स्थानीय व्यवसाय मुसीबत झेल रहे थे.
फिर टीचर की अगुवाई में छात्रों ने एक नई मुद्रा शुरू की. मकसद था कि पैसा इसी इलाके में घूमता रहे. नोट छापे गए और लोगों में बांटे गए. लोग भी धीरे धीरे इनका इस्तेमाल करने लगे. दुकानों ने भी इस प्रयोगधर्मी मुद्रा को स्वीकार करना शुरू कर दिया. धीरे धीरे यह एक वित्तीय प्रणाली बन गई. गेलेरी कहते हैं, "अब हर साल करीब 50 लाख किमगाउअर खर्च किए जाते हैं."
गेलेरी आज भी इस मुद्रा को चलाने वाले संगठन किमगाउअर ईवी के प्रमुख हैं. आज एक किमगाउअर की कीमत एक यूरो के बराबर है.
ट्राउनश्टाइन शहर में स्थित दफ्तर में नोटों के बंडल रखे हैं. गेलेरी ने तिजोरी खोलते हुए कहा, "यह दो लाख से ज्यादा किमगाउअर हैं. इनकी कीमत उतनी ही यूरो में भी है." अब ये नोट पेशेवर कंपनी द्वारा बनाए जाते हैं. इनमें सुरक्षा के फीचर भी हैं.
जर्मनी में यूरो के अलावा दूसरी मुद्रा बनाना आमतौर पर अपराध माना जाता है. लेकिन किमगाउअर को एक निश्चित इलाके तक ही सीमित रखा गया है. अगर यह बहुत बड़ा हो गया, तो जर्मनी का केंद्रीय बैंक इसमें हस्तक्षेप कर सकता है. फिलहाल इसका इस्तेमाल करीब 4,200 लोग और 300 कारोबारी करते हैं. इसी कारण जर्मनी का केंद्रीय बैंक इसे सहन करता है. किमगाउअर मुद्रा इस्तेमाल करने के लिए लोगों को इससे जुड़े संगठन से जुड़ना पड़ता है.
कैसे लगातार चलता रहता है किमगाउअर?
ट्राउनश्टाइन शहर के एक ऑर्गेनिक फूड स्टोर में एक ग्राहक 50 किमगाउअर का नोट देकर सामान खरीदता है. उसने बताया कि वह खुद भी ऐसी दुकान चलाता है और अपनी कमाई इसी मुद्रा में खर्च करता है.
एक बाजार में भूमध्यसागरीय खाद्य पदार्थ बेचने वाली महिला भी यही करती है. वह अपने सप्लायर को इसी मुद्रा में भुगतान करती है. इस तरह पैसा लगातार चलता रहता है. यह नकद या एक खास कार्ड के जरिए डिजिटल रूप में भी इस्तेमाल होता है.
नोट को मान्य बनाए रखने के लिए हर छह महीने में एक छोटा स्टांप खरीदना होता है. जैसे 10 किमगाउअर के नोट के लिए करीब 0.30 यूरो सेंट का स्टांप लगता है. तीन साल बाद नोट पूरी तरह अमान्य हो जाते हैं. आम लोग इसे यूरो में नहीं बदल सकते. कारोबारी बदल सकते हैं, लेकिन इसके लिए पांच प्रतिशत शुल्क देना पड़ता है. यही शुल्क इस व्यवस्था को चलाने और स्थानीय संस्थाओं को मदद देने में उपयोग होता है.
जलवायु संरक्षण में मदद करता किमगाउअर
हाल के वर्षों में इस मुद्रा से पर्यावरण को भी जोड़ा गया है. अब लोग पर्यावरण के अनुकूल काम करके अतिरिक्त किमगाउअर कमा सकते हैं. जैसे पुराने कपड़े ठीक करवाना, कार शेयर करना या घर को प्राकृतिक सामग्री से इंसुलेट करना. ऐसे काम करने पर, एक से 200 किमगाउअर तक बोनस मिलता है.
गेलेरी ने एक घर में लगे सौर पैनल दिखाते हुए कहा, "इन पैनलों के मालिक को 100 किमगाउअर मिले. 20 साल में यह प्रणाली 11 टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत करेगी."
स्थानीय लोग और कारोबारी मिलकर एक फंड बनाते हैं. इसका उपयोग उत्सर्जन की भरपाई के लिए किया जाता है. ऐसी योजनाएं अब जर्मनी के कई क्षेत्रों में फैल चुकी हैं. इन कोशिशों से पिछले चार साल में इससे 12,800 टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत हो चुकी है. यह लगभग 2,000 कारों के उत्सर्जन के बराबर है.
छोटे कदमों से वैश्विक बदलावों तक
दुनिया भर में अब भी करीब 300 वैकल्पिक या टोकन मुद्राएं मौजूद हैं. इन्हें वैकल्पिक या टोकन मुद्रा इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये आधिकारिक मुद्राओं के साथ चलती हैं. ऐसी वैकल्पिक मुद्राएं यूरोप और ब्राजील में सबसे ज्यादा हैं. इनका मकसद स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है. साथ ही यह मुद्रा के परिवहन व रखरखाव में होने वाले उत्सर्जन को भी कम करती है.
स्वीडन की लुंड यूनिवर्सिटी में सामाजिक उद्ममिता की प्रोफेसर एस्टर बारिनागा के मुताबिक, ऐसी मुद्राएं स्थानीय खरीद को बढ़ावा देती हैं. इससे आपूर्ति शृंखला छोटी हो जाती है और पैसा भी काफी हद तक उसी इलाके में घूमता रहता है.
कुछ मुद्राएं खास तौर पर पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं. जैसे स्पेन के विलाडेकांस शहर में "विलावाट" मुद्रा लोगों को ऊर्जा बचाने पर इनाम देती है. इंडोनेशिया और फिलीपींस में प्लास्टिक बैंक टोकन दिए जाते हैं. ये टोकन प्लास्टिक बोतलें जमा करने वाले लोगों को मिलते हैं.
हालांकि इन वैकल्पिक मुद्राओं की सीमाएं भी हैं. वैश्विक बाजार बन चुकी दुनिया में अब ज्यादार कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई सामान, बाहर से आते हैं. बाहर से आने वाले सामान का सौदा, आखिरकार पैसे को बाहर पहुंचता है. या दूसरे शब्दों में कहें तो स्थानीय अर्थव्यवस्था से पैसा बाहर निकलता है.
इन चुनौतियों के बावजूद इस व्यवस्था से एक अहम सीख मिलती है. बारिनागा कहती हैं, "पैसे को डिजाइन किया जा सकता है. अगर पैसे को ऐसे बनाया जाए कि वह पर्यावरण अनुकूल व्यवहार को बढ़ावा दे, तो लोग वैसा ही व्यवहार करने लगेंगे."