खामनेई के अंतिम संस्कार से क्या संदेश देना चाहता है ईरान
ईरान में सुप्रीम लीडर का शव चार महीने तक दफनाए जाने का इंतजार करता रहा.
ईरान में सुप्रीम लीडर का शव चार महीने तक दफनाए जाने का इंतजार करता रहा. इतने समय तक शव को रखना इस्लाम में जायज नहीं है. अब इस तरह शवयात्रा निकाल कर क्या चाहता है ईरान?लगभग 40 डिग्री की तपती गर्मी में तेहरान की सड़कों पर लोगों का सैलाब जिस तरह अयातोल्लाह अली खामनेई और उनके परिजनों को श्रद्धांजलि देने उमड़ा उसे देख कर दुनिया भर में चर्चा है कि आखिर ये कौन लोग हैं और क्या चाहते हैं? ईरान युद्ध की शुरुआत में ही अमेरिका और इस्राएल के हमले में मौत के चार महीने बाद ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर का अंतिम संस्कार हो रहा है.
देर से क्यों हुआ अंतिम संस्कार
इतने दिनों तक शव का दफनाया नहीं जाना इस्लाम के लिहाज से उचित नहीं है. इस्लामी रिवयातों के जानकार बताते हैं, "अंतिम संस्कार मौत के तुरंत बाद होना चाहिए." अंतरराष्ट्रीय मामलों की भारतीय परिषद (आईसीडब्ल्यूए) के सीनियर फेलो फज्जुर रहमान सिद्दिकी ने डीडब्ल्यू से कहा, "मौत के बाद जितनी जल्दी हो सके शव को दफनाया जाना चाहिए. इस्लाम में इस बात पर कहीं कोई विवाद नहीं है कि अंतिम संस्कार मौत के तुरंत बाद होना चाहिए. शिया, सुन्नी या किसी भी भी समुदाय में इसे लेकर कोई मतभेद या दो राय नहीं है." तो फिर ईरान ने चार महीने तक इंतजार करने का फैसला क्यों किया?
बीते महीनों में जब जब सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार की बात हुई तो यही कहा गया कि फिलहाल देश में युद्ध चल रहा है और बातचीत शुरू होने के बाद भी हमले जारी हैं इसलिए इसे टाला जा रहा है. अब जब अंतिम संस्कार हो रहा है तो दुनिया उसका विश्लेषण कर रही है. अंतिम संस्कार के हफ्ते भर लंबे कार्यक्रम में ना सिर्फ ईरान और उसके अलग-अलग शहरों बल्कि इराक में भी शवयात्रा निकाली जा रही है. इस दौरान ईरान, इराक और आसपास के देशों में फैले ईरान से सहानुभूति और संबंध रखने वाले लोग और दुनिया भर से आए प्रतिनिधिमंडलों ने इन कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है.
ईरान के संदेश
इस लंबे कार्यक्रम के जरिए ईरान ने दुनिया को कई संदेश देने की कोशिश की है. फज्जुर रहमान कहते हैं, "वो मुहर्रम का इंतजार कर रहे थे क्योंकि सुप्रीम लीडर की मौत को पैगंबर मुहम्मद के पोते हजरत हुसैन की शहादत से जोड़ना उनकी मंशा है." इसे मुहर्रम के दिन ना रख कर 10 दिन के बाद से इसे शुरू किया गया. क्योंकि यह वो समय होता है जब समूचा शिया समुदाय बहुत उत्तेजित, भावुक और संवेदनशील होता है. तो वे उस भावना को इस रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे और शिया समुदाय को संदेश देना भी उनका इरादा था. रहमान के मुताबिक, "ईरान के नेता 21वीं सदी के एक नेता को 7वीं सदी की एक शख्सियत से जोड़कर खामेनेई की ऐतिहासिक छवि बनाना चाहते हैं."
अमेरिका और कई देश यह बीते महीनों में यह जताने की कोशिश कर रहे थे कि ईरान की जनता देश की सरकार और सुप्रीम लीडर के खिलाफ है. तेहरान की सड़कों पर जिस तरह की भीड़ उमड़ी उसने सारे विरोध प्रदर्शनों की हवा निकाल दी है. अपुष्ट खबरों में तेहरान की सड़कों पर 1-2 करोड़ लोगों के जमा होने की बात कही जा रही है. ईरान की तरफ से यह दूसरा संदेश अमेरिका और दुनिया को दिया गया कि देश की जनता सरकार और मौलवियों के साथ है.
तीसरा संदेश इस कार्यक्रम के जरिए ईरान ने यह दिया है कि जिस "मुल्ला तंत्र" को दुनिया क्रूर, निरंकुश और अलोकतांत्रिक मानती है वह अपने सारे स्वरूपों में भी "ईरान के प्रति आस्थावान, ईमानदार और हितों का ख्याल रखने वाली और पूरे दमखम से कायम है." अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ से कुछ हद तक यह बात भी साबित हुई है. फज्जुर रहमान के मुताबिक, "यह तंत्र आने वाले समय में ईरान पर अपनी पकड़ और मजबूत करेगा इसमें कहीं कोई दरार नहीं आई है."
चौथा संदेश ईरान ने यह दिया है कि तमाम प्रतिबंधों और दूसरे उपायों के जरिए भले ही उसे वैश्विक रूप से अलग थलग करने की कोशिश की गई है लेकिन फिर भी वह दुनिया के कई देशों लिए अहम बना हुआ है. खासतौर से तीसरी दुनिया और ग्लोबल साउथ के देश जो जो उसके सुख दुख में शामिल हो रहे हैं. सुप्रीम लीडर को श्रद्धांजलि देने के लिए जिस तरह दुनिया भर के देशों से प्रतिनिधिमंडल वहां पहुंचे उससे इस सोच को काफी मजबूती मिली है.
पांचवां संदेश ईरान ने दिया है अपनी निडरता का. युद्धविराम के दौर में जिस बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर निकले हैं वो भी तब जबकि कई बड़े नेताओं और अधिकारियों की मौत हो चुकी है उसने भी दुनिया को हैरान किया है. फज्जुर रहमान कहते हैं, "लोगों की भीड़ में जिस तरह के नारे लग रहे थे, ट्रंप और अमेरिका से बदला लेने की बात हो रही थी उससे ईरान यह बताना चाहता है कि तमाम हमलों के बावजूद वह दुनिया के आगे झुका नहीं है ना ही उसके मन में कोई डर है. इराक, अफगानिस्तान, सीरिया का हाल देख कर भी ईरान के अधिकारी और लोग डरे नहीं हैं."
ईरान का छठा संदेश खाड़ी के देशों के लिए है जहां के लोग कभी सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करते दिखाई नहीं देते. ईरान दिखाना चाहता है कि उन देशों में लोगों को दबा कर रखा गया है. फज्जुर रहमान ने कहा, "जनता को सड़कों पर उतार कर ईरान ने उन देशों को यह दिखाया है कि असल सत्ता उनके पास है जहां जनता के पास लोकतंत्र, आजादी भी है और वो अपने देश के लोकतंत्र में हिस्सा लेते हैं और अपनी शासन व्यवस्था के साथ हैं."
मुज्तबा खामेनेई क्यों नहीं दिखे
अंतिम संस्कार के कार्यक्रम में दुनिया भर के लोग आए. ईरान के करोड़ों लोग सड़कों पर उतर कर श्रद्धांजली देने निकले लेकिन एक चेहरा जिसका इंतजार सबको था वो अब तक कहीं नहीं दिखा. दिवंगत सुप्रीम लीडर के तीन दूसरे बेटे उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए लेकिन नए सुप्रीम लीडर बनाए गए मुज्तबा खामेनेई इसमें शामिल नहीं हुए.
माना जा रहा है कि इसकी वजह उनका गंभीर रूप से घायल होना है. ईरान पर शुरुआती हमलों में वह भी घायल हुए थे और युद्ध शुरू होने के बाद से ही वह नजर नहीं आए हैं. फज्जुर रहमान के मुताबिक, "इस मौके पर उनके बाहर नहीं निकलने से यह साबित हो गया है कि वह गंभीर रूप से घायल हैं और कमजोर दिखना नहीं चाहते. मुमकिन है कि वह बिस्तर से उठने की हालत में भी ना हों."
अमेरिका के हमलों और प्रतिबंधों से ईरान का काफी नुकसान किया है लेकिन वह उसकी सोच और मनोबल में दरार नहीं डाल सकी है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 07, 2026 06:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

