सिहरन पैदा करने के साथ ही व्यापार करना भी जानते थे वाइकिंग्स
वाइकिंग्स की छवि बर्बर लुटेरों की रही है.
वाइकिंग्स की छवि बर्बर लुटेरों की रही है. लेकिन डेनमार्क में जारी एक खुदाई ने इस छवि को झकझोरा है. पुरातत्वविदों को वाइकिंग काल का एक उन्नत कपड़ा उत्पादन केंद्र मिला है.डेनमार्क के दूसरे बड़े शहर आरहुस से 10 किलोमीटर दूर, पुरातत्वविद बीते 10 महीने से व्यस्त हैं. उनकी टीम, खुरपियों और कन्नियों के जरिए सावधानी से मिट्टी खुरचती है. खुरचन के दौरान जैसे ही कोई सबूत मिलता है, वैसे ही खोजकर्ता उस जगह पहुंच जाते हैं. फिर बारीक बालों वाले ब्रशों की मदद से साफ सफाई की जाती है और बहुत ही एहतियात के साथ, 1000 साल से जमीन में दबे अवशेषों को बाहर निकाला जाता है.
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अब तक निकाले गए अवशेषों के आधार पर पुरातत्वविदों ने दावा किया है कि सफ्टन नाम की यह जगह शुरुआती वाइकिंग समाज का अहम केंद्र रही. एक लाख वर्गमीटर में फैले इस इलाके में पुरातत्वविदों ने वाइकिंग काल का एक विशाल कपड़ा उत्पादन केंद्र खोजा है. यह एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है. डेनमार्क के मोएसगार्ड म्यूजियम के विशेषज्ञों के मुताबिक वहां टेक्सटाइल प्रोसेसिंग के लिए एक अलग क्षेत्र भी मिला है. इसके साथ ही 80 से ज्यादा झोपड़ी जैसे दिखने वाले पिट हाउस भी मिले हैं. ये आंशिक रूप से जमीन में बने ढांचे थे, जिनका इस्तेमाल वाइकिंग काल में वर्कशॉप और रिहाइश के लिए होता था.
उत्तरी यूरोप में कब थे वाइकिंग्स
सफ्टन की इस साइट को, उत्तर लौह युग और शुरुआती वाइकिंग एज का माना जा रहा है. इसका कालखंड 600 से 950 ईस्वी (एडी) के बीच आंका गया है. खुदाई का नेतृत्व करने वाली पुरातत्वविद लिव स्टिडजिंग रेहर-लांगबेर्ग कहती हैं, "यहां वस्त्र उत्पादन पर फोकस साफ दिखाई देता है. यही वजह है कि यह बसावट इस दौर की अन्य बस्तियों से अलग है."
उन्होंने कहा, "हमें तकली की चक्रियां और करघों के अवशेष मिले हैं. इससे पता चलता है कि पिट हाउस में किस तरह का काम होता रहा होगा." खोजकर्ताओं के मुताबिक उन्हें चांदी के सिक्के, कांच के मनके और मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं. इसके अलावा एक आवासीय घर भी मिला है. इससे संकेत मिलता है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति की निगरानी में यहां काम होता था.
असल में करीब डेढ़ साल पहले, एक सड़क और औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण से पहले सफ्टन में परीक्षण संबंधी खुदाई की गई थी. इसी दौरान पुरातत्वविदों को इस साइट के बारे में विस्तार से पता चला.
क्या वाइकिंग सिर्फ लड़ाके और लुटेरे थे?
मोएसगार्ड म्यूजियम के इतिहासकार कास्पर एंडरसन ने कहा कि सफ्टन की यह खोज उस दौर की स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राजनीतिक ढांचे को समझने में एक और महत्वपूर्ण कड़ी है. आज के आरहूस शहर को वाइकिंग काल में आरोस कहा जाता था. उस कालखंड में आरोस, शाही सत्ता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था.
2025 में भी इस जगह से करीब 4 किलोमीटर दूर लिसब्यर्ग में भी एक वाइकिंग साइट मिली. माना जाता है कि वहां अभिजात वर्ग के लोग रहते थे. एंडरसन के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों और सफ्टन जैसी बस्तियों से माल और संसाधन यहां लाए जाते थे. इसके बाद यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क का हिस्सा बनते थे. एंडरसन कहते हैं, "इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन केवल स्थानीय जरूरतों के लिए नहीं हो सकता. से एक बड़े नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में समझना चाहिए."
क्या क्या बता सकते हैं वाइकिंग काल के अवशेष
खोजकर्ताओं को उम्मीद है कि कार्बन डेटिंग और पराग विश्लेषण से कई सवालों के जवाब मिलेंगे. इन पड़तालों से यह भी पता चलेगा कि यहां किस तरह के कपड़े बनाए जाते थे. कपड़ों से उस दौर के मौसम का अंदाजा भी लग सकेगा.
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एंडरसन ने कहा कि सफ्टन की यह खोज दिखाती है कि वाइकिंग केवल असभ्य और बिखरे हुए समूह नहीं थे, "ऐसी जगह के लिए एक बेहद संगठित समाज की जरूरत होती है. यहां उत्पादन की एक स्पष्ट व्यवस्था रही होगी. साथ ही बाजार भी जरूरी था. सफ्टन के वस्त्र केवल स्थानीय जरूरतों तक सीमित नहीं थे, बल्कि एक बड़े बाजार के लिए बनाए जाते थे."
वाइकिंग काल को आम तौर पर 793 से 1066 ईस्वी के बीच माना जाता है. उस दौरान नॉर्स लोग, जिन्हें वाइकिंग कहा जाता है, यूरोप में बड़े पैमाने पर हमले, व्यापार, उपनिवेश और विजय अभियान चलाते रहे. वे उत्तरी अमेरिका तक भी पहुंचे. आज वाइकिंग समाज की बची खुची झलक उत्तरी ध्रुव के करीब बसे कुछ देशों के त्योहारों और नौकायन में दिखाई पड़ती है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 24, 2026 06:10 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

