नाटो प्रमुख से खुश लेकिन यूरोपीय साझेदारों से चिढ़े हैं ट्रंप
नीदरलैंड्स के पूर्व प्रधानमंत्री और नाटो के महासचिव मार्क रुटे को डॉनल्ड ट्रंप ने अपना दोस्त बताया है.
नीदरलैंड्स के पूर्व प्रधानमंत्री और नाटो के महासचिव मार्क रुटे को डॉनल्ड ट्रंप ने अपना दोस्त बताया है. लेकिन उनके देश समेत नाटो के यूरोपीय साझेदारों को अमेरिकी राष्ट्रपति ने फिर से तीखे ताने सुनाए हैं.वॉशिंगटन पहुंचे नाटो महासचिव मार्क रुटे से मुलाकात के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा, "वह मेरे मित्र हैं, वह शानदार व्यक्ति है, महान नेता, महान महाचिव हैं, हर कोई उनका सम्मान करता है." अपने ओवल ऑफिस में रुटे के बगल में बैठे ट्रंप ने इसके बाद नाटो के यूरोपीय साझेदारों पर तंज कसा, "ईमानदारी से कहूं तो मुझे लगता है कि उनकी जगह इस पद पर अगर कोई और होता तो आज हम मिल भी नहीं रहे होते, क्योंकि हमें शर्मिंदा किया गया."
ट्रंप के मुताबिक, ईरान के साथ युद्ध के दौरान यूरोपीय साझेदारों के रुख ने अमेरिका को "शर्मिंदा किया." 32 देशों वाले सैन्य साझेदारी संगठन नाटो में तुर्की समेत 30 यूरोपीय देश हैं. ये सभी देश 7-8 जुलाई 2026 को तुर्की की राजधानी अंकारा में होने वाले नाटो सम्मेलन में शिरकत करने जा रहे हैं. 'अंकारा समिट' में नाटो देश सैन्य खर्च, हथियार उत्पादन और यूक्रेन की मदद जैसे कई मुद्दों पर चर्चा करेंगे. लेकिन इस सम्मलेन से पहले अमेरिका और यूरोपीय साझेदारों के बीच उभरे गहरे मतभेदों को सुलझाने के लिए नाटो महासचिव रुटे, वॉशिंगटन गए थे.
रुटे के सामने ही ट्रंप ने कहा, "मैं इटली से निराश हुआ. मैं ब्रिटेन से निराश हुआ...हम जर्मनी और फ्रांस भी निराश हुए." इस दौरान स्पेन की उन्होंने अलग से आलोचना की. ईरान युद्ध के दौरान स्पेन ने अमेरिकी सेना को अपने सैन्य अड्डे देने से इनकार कर दिया था. ऐसा ही इनकार कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने भी किया.
क्या है नाटो
1949 में स्थापित किए गए नाटो का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की स्वतंत्रता व सुरक्षा की रक्षा करना है. 14 अनुच्छेदों वाले नाटो के संविधान में, धारा 5 खासी अहम है. यह सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर टिकी है. इसके तहत यदि किसी एक या एक से अधिक सदस्य देशों पर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे पूरे गठबंधन (सभी सदस्य देशों) पर हमला माना जाएगा. इसके जवाब में, सभी सदस्य देश सामूहिक रूप से सैन्य बल का उपयोग कर सकते हैं.
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दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका नाटो में सबसे बड़ी सैन्य ताकत है. वॉशिंगटन, नाटो पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च भी करता है. ट्रंप ने राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल (जनवरी 2017- जनवरी 2021) के दौरान भी नाटो के अन्य देशों को सेना पर कम खर्च करने के लिए खरी खोटी सुनाई थी. वर्तमान में उनके दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान नाटो के यूरोपीय साझेदारों ने अपने बजट का पांच फीसदी हिस्सा सैन्य तैयारियों पर खर्च करने पर सहमति जताई है.
यूरोपीय साझेदारों से नाराज क्यों हैं ट्रंप
अमेरिका ने इस्राएल के साथ मिलकर फरवरी 2026 में ईरान पर हमले किए. यूरोपीय साझेदारों का कहना है कि इन हमलों से पहले ना तो उनके साथ कोई मशविरा किया गया और ना ही उनकी आपत्तियों पर ध्यान दिया गया. खाड़ी के देशों ने भी अमेरिका से ईरान पर हमले ना करने की अपीलें की थीं, लेकिन इन अपीलों को बावजूद अमेरिका और इस्राएल ने ईरान से युद्ध छेड़ा. ईरान युद्ध का मकसद क्या था? युद्ध की व्यापक रणनीति क्या थी? ईरान पर हमले कर अमेरिका क्या हासिल करना चाहता था? ये सवाल अब भी अनसुलझे हैं.
हालांकि जून 2025 में भी अमेरिका और इस्राएल ने ईरान पर 12 दिन तक हवाई हमले किए थे. लेकिन इस बार शुरू किए गए हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई की मौत हो गई. खमेनेई की मौत के बाद ईरान ने भी पूरी ताकत से पलटवार किया और मध्य पूर्व में भीषण जंग छिड़ गई. ईरान ने इस्राएल के साथ साथ, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन, कतर, ओमान और कुवैत के कई सैन्य व पेट्रोलियम प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया. तेहरान ने मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना के ठिकानों को खासा नुकसान पहुंचाया.
ईरान युद्ध का असर खाड़ी ही बल्कि पूरी दुनिया ने महसूस किया. तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से पूरे विश्व में पेट्रोलियम और खाद की सप्लाई चरमरा गई. तेल सप्लाई को सुचारू व सस्ता बनाए रखने के लिए खुद अमेरिका को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को 1980 के दशक के बाद सबसे नीचे ले जाना पड़ा. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़े दबाव की वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति को तेहरान के साथ संघर्ष विराम करना पड़ा.
हालांकि संघर्ष विराम की शर्तों को लेकर अब भी स्थिति साफ नहीं है.
नाटो के सामने कैसी चुनौतियां हैं?
करीब 35 साल पहले सोवियत संघ के पतन के साथ ही अमेरिका दुनिया की एक मात्र महाशक्ति बन गया. लेकिन बीते 10 साल में चीन ने अब उसे चुनौती देना शुरू कर दिया है. हाल ही में बीजिंग पहुंचे ट्रंप से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह चुके हैं कि ताकत का केंद्र बदल रहा है और इसे विनम्रता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए.
वॉशिंगटन को रूस और चीन की गहराती दोस्ती की भी चिंता है. लेकिन अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वाड ग्रुप को ट्रंप करीबन मूर्छित कर चुके हैं. मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति बीच बीच में ब्रिक्स देशों को लेकर भी अपनी खीझ जाहिर करते हैं.
ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका अब रणनीतिक रूप से चीन पर ध्यान लगाए. वहीं यूरोपीय साझेदार यूक्रेन पर कब्जा कर रहे रूस को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चिंता मानते हैं. नाटो के इतिहास में यह पहला मौका है जब साझेदार देशों के सामने अलग अलग किस्म के लक्ष्य हैं. मुश्किल यह है कि ट्रंप अपने हितों को पूरा करने के लिए साझेदारों को दंडित करने भी नहीं चूकते हैं. टैरिफ वॉर, कारोबारी समझौते के लिए दबाव और आए दिन विदेशी नेताओं को असहज करने वाले उनके बयान इसी का उदाहरण पेश करते हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 26, 2026 11:40 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

