फीफा वर्ल्ड कप की वह डॉक्टर जो बदल रही हैं खेल से जुड़ी सोच

सूजाने हूरमान 2026 वर्ल्ड कप में इकलौती महिला चीफ डॉक्टर हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सूजाने हूरमान 2026 वर्ल्ड कप में इकलौती महिला चीफ डॉक्टर हैं. उनका काम पुरुषों की फुटबॉल की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लाने के लिए प्रेरित कर रहा है.डॉ. सूजाने हूरमान 2026 वर्ल्ड कप में इकलौती महिला चीफ डॉक्टर हैं. मूल रूप से नीदरलैंड्स से आने वाली यह 36 वर्षीय डॉक्टर इस समय कुरासाओ की टीम के लिए काम कर रही हैं. कुरासाओ वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई करने वाला अब तक का सबसे छोटा देश है. डॉ. सिल्या श्वात्स के अलावा हूरमान पूरे टूर्नामेंट में इकलौती महिला डॉक्टर हैं. डॉ. सिल्या पिछले तीन सालों से जर्मनी की मेंस फुटबॉल टीम में बतौर डॉक्टर काम कर रही हैं, लेकिन वह चीफ डॉक्टर नहीं हैं. वैसे, वर्ल्ड कप के पूरे इतिहास की बात करें, तो हूरमान किसी भी टीम के लिए डॉक्टर के तौर पर काम करने वाली दुनिया की सिर्फ तीसरी महिला हैं.

इसकी कई वजहें हैं, लेकिन ज्यादा वजहें फुटबॉल के क्षेत्र में पुरुषों के दबदबे से जुड़ी हैं.

हूरमान ने डीडब्ल्यू को बताया, "ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अच्छी महिला डॉक्टर नहीं हैं, क्योंकि जब मैं मेडिकल कॉलेज में थी, तब क्लास में 70 से 80 फीसदी लड़कियां ही थीं. हालांकि, जैसे ही आप एलीट स्पोर्ट्स मेडिसिन (उच्च स्तरीय खेल चिकित्सा) की तरफ बढ़ते हैं, महिलाओं की संख्या कम होती जाती है, खासकर पुरुषों के खेल चिकित्सा के क्षेत्र में. यह दुनिया आज भी पूरी तरह से पुरुषों के दबदबे वाला क्षेत्र है.”

उन्होंने आगे कहा, "आपको सच में खुद को साबित करना पड़ता है. लोग आपको स्वीकार करें और आपकी काबिलियत को समझें, इसमें काफी समय लगता है. सारा खेल अपनी काबिलियत साबित करने का है और उन्हें यह दिखाने का है कि आप वहां उनकी सेहत और मदद के लिए अपना सौ प्रतिशत देने आई हैं. हालांकि, यह बहुत मुश्किल है, क्योंकि आपको कई तरह की रुकावटों और रूढ़िवादी सोच का सामना करना पड़ता है. लोग खुलकर कह देते हैं: ‘नहीं, तुम यहां काम नहीं कर सकती, क्योंकि तुम एक महिला हो और हम पुरुषों की टीम में किसी महिला को नहीं रखना चाहते.' मैंने यह बात लाखों बार सुनी है. आपको बस खुद को साबित करना है, आगे बढ़ते रहना है और सिर्फ इसलिए हार नहीं माननी है क्योंकि किसी ने आपसे ‘ना' कह दिया है.”

हूरमान का सफर साफ तौर पर इस बात का सबूत है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत डच फुटबॉल क्लब ‘गो अहेड ईगल्स डेवेंटर' से की थी और वह 2015 से ही प्रोफेशनल स्पोर्ट्स में हेड ऑफ मेडिकल (मुख्य चिकित्सा प्रमुख) के तौर पर काम कर रही हैं. इसके अलावा, उन्होंने कई सालों तक दुनिया के मशहूर क्लब ‘रियल मैड्रिड' में भी अपनी सेवाएं दी हैं. उनके अनुभव के मुताबिक, असली दिक्कतें बड़े संगठनों के डायरेक्टरों और ऊंचे मैनेजमेंट के लेवल पर आती थीं, जहां उन्हें अक्सर यही जवाब मिलता था: ‘नहीं, हम पुरुषों की टीम में किसी महिला को रखने की इजाजत नहीं दे सकते.”

हूरमान ने अपने काम पर ध्यान दिया

हूरमान अपने काम और अनुभव को ही अपनी पहचान बनाने की कोशिश करती हैं. उन्होंने कहा, "मैं इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देती हूं कि पूरी टीम में मैं ही इकलौती महिला हूं. मेरा पूरा ध्यान इस बात पर रहता है कि एक डॉक्टर के तौर पर मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकूं. मैं हर दिन अपना काम पूरी क्षमता से करने की कोशिश करती हूं. हर चीज की तैयारी पहले से करके रखने की कोशिश करती हूं. मेरे लिए यही सबसे जरूरी है.”

वह आगे बताती हैं, "बेशक यह नाइंसाफी है, लेकिन पूरी दुनिया ही नाइंसाफी से भरी हुई है. हम इसके बारे में शिकायत तो कर सकते हैं, पर एक प्रोफेशनल के तौर पर आप सिर्फ एक ही चीज कर सकते हैं, अपनी काबिलियत साबित करना और यह दिखाना कि आप इस काम के लिए पूरी तरह काबिल हैं.”

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इसी साल मार्च में, फीफा ने एक नया नियम मंजूर किया है कि टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाली हर महिला टीम के स्टाफ में कम से कम दो महिला सदस्यों का होना जरूरी है, जिनमें से एक का हेड कोच या असिस्टेंट कोच होना जरूरी है. हालांकि, पुरुष फुटबॉल के लिए ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया गया है. वहां आज भी टीम के ज्यादातर सदस्य पुरुष ही होते हैं.

हूरमान ने कहा, "पुरुषों के दबदबे वाली फुटबॉल की इस दुनिया में आने वाली महिला डॉक्टरों के लिए सबसे पहली चुनौती तो बस कदम रखने की होती है कि वे आपको स्वीकार करें. भले ही, आपका सीवी कितना भी शानदार क्यों न हो, उनकी नजर में आप फिर भी एक महिला ही रहती हैं. जब आप एक बार वहां पहुंच जाती हैं, तब उन्हें आपको अपनाने और आपकी काबिलियत को स्वीकार करने में और भी ज्यादा समय लगता है. हालांकि, जब आप अपना ज्ञान और हुनर दिखाती हैं और वे देखते हैं कि यह बिल्कुल बेहतरीन स्तर का है, तब सब ठीक हो जाता है. उस मुकाम तक पहुंचने से पहले का जो समय है, वही सबसे बड़ी चुनौती है.”

अन्य महिलाओं के लिए भी तैयार हो रहा रास्ता

डॉक्टरों के मामले में, पुरुषों और महिलाओं को बराबरी मिलने में अभी लंबा समय लगेगा, लेकिन दूसरे खेलों से कुछ उम्मीद जगाने वाले संकेत मिल रहे हैं. इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ऑर्थ्रोस्कोपी, नी सर्जरी एंड ऑर्थोपेडिक स्पोर्ट्स (आईएसएकेओएस) के मुताबिक, अमेरिकी ओलंपिक टीम में महिला डॉक्टरों की संख्या में, 2012 के लंदन ओलंपिक और 2024 के पेरिस ओलंपिक के बीच एक बहुत बड़ा उछाल देखा गया. साल 2012 में वहां सिर्फ 19 फीसदी महिला डॉक्टर थीं, लेकिन 12 साल बाद यह आंकड़ा बढ़कर 32 फीसदी तक पहुंच गया.

हूरमान ने कहा, "मैं उम्मीद करती हूं कि अगले वर्ल्ड कप में और भी ज्यादा महिला डॉक्टर देखने को मिलेंगी. मुझे लगता है कि दुनिया बदल रही है, क्योंकि दूसरे खेलों में यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन फुटबॉल की दुनिया में अभी भी पुरुषों का बहुत ज्यादा दबदबा है. उम्मीद है कि चार साल बाद हालात काफी बेहतर होंगे.”

हूरमान और श्वात्स जैसी राह दिखाने वाली महिलाओं की बदौलत ही आज फुटबॉल की पुरुषों वाली इस दुनिया को चुनौती मिल रही है. इसके अलावा, बड़े स्तर के खेलों में सामने आने वाली तमाम मुश्किलों और रूढ़िवादी सोच के बावजूद, काफी महिलाएं आगे बढ़ रही हैं और अगली पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं. अमेरिकी रेफरी टोरी पेंसो भी इसका एक बड़ा उदाहरण हैं, जो ग्रुप-स्टेज के अंतिम मुकाबले में जर्मनी और इक्वाडोर के बीच होने वाले मैच में मुख्य रेफरी की भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

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