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नेपाल में "महाराज लौटो, देश बचाओ" के नारे

हिंसक संघर्ष के बाद नेपाल में लोकतंत्र तो आया, लेकिन सत्ता के लिए तिकड़म और भ्रष्टाचार भी उसे जकड़ते गए.

नेपाल में
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

हिंसक संघर्ष के बाद नेपाल में लोकतंत्र तो आया, लेकिन सत्ता के लिए तिकड़म और भ्रष्टाचार भी उसे जकड़ते गए. अब 17 साल बाद नेपाल में एक बार फिर राजशाही की मांग गूंजने लगी है.नेपाल के पूर्व राजा, ज्ञानेंद्र शाह का रविवार को राजधानी काठमांडू में जोरदार स्वागत हुआ. राजशाही का समर्थन करने वाले हजारों लोग स्वागत के लिए एयरपोर्ट के गेट पर मौजूद थे.

उनके हाथ में नेपाल के झंडे और जुबान पर "महाराज लौटो, देश बचाओ" के नारे थे. पूर्व राजा बीते हफ्तों में देश का दौरा कर रहे थे. रविवार को वह पोखरा से काठमांडू लौटे.

एयरपोर्ट पर मौजूद 43 साल के शिक्षक राजेंद्र कुंवर ने कहा, "देश अस्थिरता का सामना कर रहा है, महंगाई है, लोग बेरोजगार हैं, और शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है." उन्होंने आगे कहा, "गरीब भूख से मर रहे हैं. कानून आम नागरिकों पर लागू होता है, लेकिन राजनेताओं पर नहीं. इसीलिए हम चाहते हैं कि राजा वापस लौटें."

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सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होते ज्ञानेंद्र शाह

77 साल के ज्ञानेंद्र शाह अब तक नेपाल की राजनीति के बारे में बोलने से बचते रहे हैं. लेकिन हाल के समय में वह अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक रूप से कई बार नजर आए हैं.

इसी साल फरवरी में राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस की वर्षगांठ के मौके पर पूर्व राजा ने एक बयान जारी कर कहा है, "अब समय आ चुका है. अगर हम अपने देश और अपनी राष्ट्रीय एकता को बचाना चाहते हैं, तो मैं सभी देशवासियों से नेपाल की समृद्धि और प्रगति के वास्ते हमारा समर्थन करने की अपील करता हूं."

नेपाल के राजनीतिक समीक्षक लोक राज बराल ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा कि उन्हें राजशाही की वापसी की कोई संभावना नहीं दिख रही है. वह कहते हैं, "राजनेताओं की अक्षमता और उनके भीतर बढ़ती आत्म केंद्रिता के बीच, कुछ असंतुष्ट गुटों के लिए यह एक राहत जैसी बात है. यही झल्लाहट इस तरह के जमावड़े और प्रदर्शनों में बदल रही है."

नेपाल की राजशाही से लोकशाही कठिन राह

नेपाल में 1996 में माओवादियों के नेतृत्व में गृहयुद्ध शुरू हुआ. इसके कुछ ही साल बाद 2001 में राजमहल में तत्कालीन राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह और उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई.

इस हत्याकांड के बाद ज्ञानेंद्र शाह नेपाल के महाराज घोषित किए गए. उनकी ताजपोशी के वक्त नेपाल में माओवादी हिंसा फैल चुकी थी. 2005 में शाह ने संविधान निलंबित कर संसद को भंग कर दिया. इसके बाद लोकतंत्र समर्थक भी माओवादियों के साथ मिल गए देश में राजशाही के विरुद्ध बड़े प्रदर्शन होने लगे. आखिकार नेपाल में राजशाही ढह गई. देश में 1996 से 2006 तक चले गृहयुद्ध में 16 हजार से ज्यादा लोगों की जान गई.

2008 में नेपाल की संसद ने देश में 240 साल से हुकूमत कर रही हिंदू राजशाही को भंग कर दिया. नेपाल लोकतंत्र की राह पर तो चल पड़ा, लेकिन राजनीतिक स्थिरता हिचकोलों से भरी रही.

2008 से अब तक नेपाल 14 सरकारें देख चुका है. इनमें भी तीन मौकों पर पुष्प कमल दहल प्रधानमंत्री बने और चार अवसरों पर केपी शर्मा ओली. बीते 17 साल के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा लगता है जैसे सत्ता मुख्य रूप से एक-दो लोगों के बीच झूल रही हो.

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भ्रष्टाचार की चपेट में नेपाल

फरवरी 2025 में आए करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में नेपाल 180 देशों की लिस्ट में 107वें नंबर पर था. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने इस इंडेक्स में नेपाल को 100 में से 34 अंक दिए.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक, 50 से कम अंक पाने वाले देश को भ्रष्ट माना जाता है. इस लिहाज से देखें तो 2015 से अब तक नेपाल 35 अंकों के पार नहीं जा सका है.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और ग्लोबल इनसाइट के डाटा के मुताबिक सरकार और बिजनेस से जुड़ी गतिविधियों में भ्रष्टाचार बढ़ा है. रिपोर्ट में कहा गया कि नेपाल में आयात-निर्यात, जन सेवाओं, टैक्स भुगतना और ठेकों में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है.

कारोबार और ठेकों में रिश्वतखोरी काफी बढ़ी है. वहीं दूसरी तरफ सरकार की जवाबदेही और संसाधनों के प्रबंधन के मामले में भ्रष्टाचार कम हुआ है. वर्ल्ड बैंक और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सर्वे में यह संकेत भी सामने आया कि शायद राजनीतिक लेन देन और चुनावी खर्च के कारण भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.

ओएसजे/एवाई (एएफपी)

(The above story first appeared on LatestLY on Mar 11, 2025 04:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).