जर्मनी: प्रवासी पृष्ठभूमि वाले मतदाताओं को कैसे लुभा रही हैं पार्टियां?
जर्मनी में प्रवासी पृष्ठभूमि वाले वोटरों की संख्या बढ़ी है.
जर्मनी में प्रवासी पृष्ठभूमि वाले वोटरों की संख्या बढ़ी है. क्या ये पुराने दलों के साथ हैं या एएफडी को मौका दे रहे हैं?बर्लिन स्थित ‘जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेशन एंड माइग्रेशन रिसर्च' के एक अध्ययन के मुताबिक, दूसरे लोगों की तुलना में प्रवासी पृष्ठभूमि वाले जर्मन मतदाता पुरानी और बड़ी राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा दूर हो रहे हैं. 2023 में, जर्मनी में वोट देने के योग्य लोगों में से 12 फीसदी लोग प्रवासी पृष्ठभूमि के थे. मतलब, वे खुद या उनके माता-पिता में से कोई एक गैर-जर्मन नागरिक के तौर पर पैदा हुए थे. लगभग 8.4 करोड़ की कुल आबादी में यह संख्या 70 लाख से भी अधिक बैठती है, लेकिन ये मतदाता अब पारंपरिक मध्यमार्गी पार्टियों से दूर होते जा रहे हैं.
फिर भी, अध्ययन के मुताबिक, सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के पास प्रवासियों और उनकी अगली पीढ़ियों के बीच अब भी सबसे अधिक वोट पाने की संभावना है. प्रवासी पृष्ठभूमि वाले तीन में से दो मतदाताओं ने कहा कि वे एसपीडी को एक सही और बेहतर विकल्प मानते हैं.
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सेंटर-राइट गठबंधन ‘क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन' और ‘क्रिश्चियन सोशल यूनियन' (सीडीयू/सीएसयू) दूसरे स्थान पर ज्यादा पीछे नहीं है. सर्वे में शामिल पांच में से केवल एक व्यक्ति ने इन पार्टियों को पूरी तरह से खारिज किया.
इस सप्ताह एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में अध्ययन की सह-लेखिका फ्रीडेरिके रोमर ने कहा, "प्रवासी पृष्ठभूमि वाले बड़े-बुजुर्ग मतदाता एसपीडी की तरफ अधिक झुकाव रखते हैं. पुराने समय में यह रिश्ता काफी मजबूत रहा है, लेकिन अब नई पीढ़ियों के बीच यह टूटता हुआ दिखाई दे रहा है.”
एएफडी के निशाने पर रहते हैं प्रवासी
इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि बाहर से आए लोगों का विरोध करने वाली पार्टी ‘एएफडी' के पास प्रवासी पृष्ठभूमि वाले वोटरों का सबसे कम समर्थन है. सर्वे में शामिल लगभग दो-तिहाई लोगों ने साफ कह दिया कि इस धुर-दक्षिणपंथी पार्टी को वोट देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. तुर्की, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका से ताल्लुक रखने वाले लोग इस पार्टी को बिल्कुल पसंद नहीं करते. हालांकि, जर्मनी के रूसी समुदाय के बीच एएफडी की अच्छी-खासी पैठ है. फिर भी, एएफडी पार्टी प्रवासी वोटरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है.
जर्मनी में तुर्की समुदाय (टीजीडी) के संघीय कार्यकारी निदेशक मार्टिन गेर्लाच ने 2021 के संघीय चुनावों के दौरान बर्लिन में एएफडी के अभियान को याद करते हुए कहा, "काफी लंबे समय तक, यह पहली ऐसी पार्टी थी जिसने प्रवासियों की मातृभाषाओं में उनसे बात की और ऐसे चित्रों का इस्तेमाल किया, जो वाकई असरदार थे.”
उन्होंने आगे कहा, "इसमें लिखा था, ‘अतातुर्क एएफडी को वोट देते.' दूसरी पार्टियां इन खास मतदाता समूहों के बारे में सोचने की भी जहमत नहीं उठाती हैं. यह हैरानी की बात है, क्योंकि अगर आप प्रवासी पृष्ठभूमि वाले मतदाताओं के बड़े हिस्से का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो चुनाव जीत सकते हैं.”
प्रवासियों के लिए पहली प्राथमिकता है सुरक्षा
टीजीडी फरवरी 2025 में हुए पिछले संघीय चुनावों से पहले जर्मनी के 60 शहरों में सक्रिय था और तुर्की पृष्ठभूमि वाले मतदाताओं को वोट डालने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था. हालांकि, गेर्लाच ने ध्यान दिया है कि प्रवासी स्वभाव से ही अप्रवासन के समर्थक नहीं होते. इसके विपरीत, नए प्रवासियों या शरणार्थियों को लेकर उनके मन में गहरा संदेह रहता है और इसी मुद्दे को एएफडी ने भुनाया है. उनका तर्क है कि अन्य पार्टियों का इन मतदाताओं के बीच अपना समर्थन खोने की कई वजहों में से यह भी एक मुख्य कारण है.
उन्होंने कहा, "राजनीतिक पार्टियां सुरक्षा के मुद्दे पर बिल्कुल बात नहीं करती हैं और यह एक बहुत बड़ी समस्या है.” उन्होंने उस इलाके में विदेशियों के प्रति नफरत से प्रेरित हमलों का जिक्र करते हुए कहा, "हमारे समुदाय के लोग जर्मनी के कई हिस्सों में खुद को बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं. वे बाल्टिक सागर के तटीय इलाकों में जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते.”
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गेर्लाच का मानना है कि इस्लाम से जुड़ी नफरत (इस्लामोफोबिया) का तुर्की समुदाय के मतदाताओं पर बहुत गहरा असर पड़ता है, लेकिन मध्यमार्गी (सेंट्रिस्ट) पार्टियां इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही हैं.
बतौर गेर्लाच, "जर्मनी में भेदभाव-विरोधी (एंटी-डिस्क्रीमिनेशन) नीति को प्रगतिशील और वामपंथी सोच माना जाता है, लेकिन तुर्की मूल के समुदाय के लिए इसका असली मतलब संविधान के जरिए सुरक्षा पाना है. मेरा मानना है कि यह एक ऐसा विचार है जो बहुत से लोगों का दिल जीत सकता है.”
क्या राजनीतिक पार्टियां सामाजिक बदलाव को समझने में चूक रही हैं?
राजनीतिक वैज्ञानिक ओजगुर ओजवातन ने बताया कि 2030 तक जर्मनी की आधी से अधिक आबादी प्रवासी पृष्ठभूमि की होगी. वे स्थापित पुरानी राजनीतिक पार्टियों के आलोचक भी रहे हैं, जिसका जिक्र उन्होंने हाल ही में आई अपनी 2025 की किताब ‘एवरी वोट काउंट्स — अंडरएस्टिमेटेड बाय डेमोक्रैट्स, कोर्टेड बाय पॉपुलिस्ट्स: माइग्रेंट जर्मन्स एज ए पॉलिटिकल फोर्स' में भी किया है.
उन्होंने कहा, "ये पार्टियां प्रवासी मूल के मतदाताओं से जिस तरह जुड़ना चाहिए, वैसा बिल्कुल नहीं कर रही हैं. न तो उन्हें अपनी पार्टी से जोड़ने की कोशिश है, न वॉलंटियर बनाने की, और न ही मतदाता के तौर पर उनसे बातचीत करने की. दुख की बात है कि हम समाज में हो रहे इस बड़े बदलाव को समझने और इसका लाभ उठाने का मौका गंवा रहे हैं.”
ओजवातन का मानना है कि तानाशाही या सत्तावादी शासन वाले मुल्कों से जर्मनी आए मतदाताओं को साधने का बहुत बड़ा मौका है. देखा जाए तो ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने खुद लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ी है और इसके लिए संघर्ष का अनुभव रखते हैं. वह आगे बताते हैं, "अगर हम उन्हें जल्द से जल्द मतदान के अधिकार के साथ नागरिकता दिला सकें, तो हम इस मौके का लाभ उठा सकते हैं.”
वहीं दूसरी तरफ, एएफडी पार्टी अलग ही चाल चल रही है. वह तुर्की मूल के लोगों को साधने के साथ-साथ वहां के दक्षिणपंथी सत्तावादी राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन की तरफ भी हाथ बढ़ा रही है. ओजवातन कहते हैं, "इसके अलावा, एएफडी प्रवासी पृष्ठभूमि वाले अलग-अलग समूहों को एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा करने और आपस में भिड़ाने की कला में काफी माहिर हो गई है.”
बतौर ओजवातन, "पुराने प्रवासियों को यह समझाने में बहुत मेहनत की जा रही है: ‘आप नए आने वाले लोगों से अलग हैं. प्रवासन या देश से बाहर निकालने की बहस आप पर असर नहीं डालेगी.' यह चाल उन लोगों पर बहुत असरदार साबित हो रही है जो एएफडी को सीधे तौर पर खारिज नहीं करते.”
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 04, 2026 03:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

