पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में चुनाव: तनाव कम करने की कोशिश या नई चुनौती?
आरक्षित सीटों के मुद्दे पर कई हफ्तों तक चले हिंसक प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में चुनाव हो रहा है.
आरक्षित सीटों के मुद्दे पर कई हफ्तों तक चले हिंसक प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में चुनाव हो रहा है. एक स्थानीय संगठन ने इन चुनावों के बहिष्कार की मांग की है.पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में स्थानीय निकाय के चुनावों का पहला चरण 27 जुलाई, सोमवार को है. इस बीच हाल ही में प्रतिबंधित किए गए जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी (जेएएसी) ने चुनाव बहिष्कार की घोषणा की है.
जेएएसी लंबे समय से उन 12 आरक्षित विधानसभा सीटों को खत्म करने की मांग कर रही है, जो भारत प्रशासित कश्मीर से आए विस्थापितों के लिए आरक्षित हैं. इस संगठन का तर्क है कि चुनाव में उम्मीदवारी का अधिकार केवल स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए.
यह विवाद तब और गहरा गया जब पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों का आधआर संविधान है और इन्हें संविधान में संशोधन के बिना खत्म नहीं किया जा सकता.
इसके बाद क्षेत्रीय सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताते हुए जून में आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत जेएएसी पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके दर्जनों समर्थकों को हिरासत में ले लिया. बढ़ते तनाव और हिंसक विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में सरकार ने जेएएसी के खिलाफ कार्रवाई भी की. ये प्रदर्शन शरणार्थी सीटों को समाप्त करने की मांग को लेकर शुरू हुए थे.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने स्थानीय आकलनों के आधार पर जून से जारी अशांति में अब तक 30 लोगों के मौत की बात कही है.
भारत और पाकिस्तान पूरे कश्मीर पर अधिकार का दावा करते हैं, हालांकि वास्तव में दोनों के पास इस क्षेत्र का केवल एक-एक हिस्सा है. 1947 में ब्रिटेन से आजादी के बाद से यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र परमाणु शक्ति वाले दो पड़ोसियों के बीच तनाव का प्रमुख एक प्रमुख कारण बना हुआ है.
विरोध प्रदर्शनों से घिरा मतदान
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में जून की शुरुआत से आंदोलन चल रहा है. आरक्षित सीटों के मुद्दे के साथ-साथ जेएएसी शासन और अर्थव्यवस्था से जुड़े सुधारों की मांग भी कर रहा है.
हालिया तनाव और प्रदर्शनों के मद्देनजर अधिकारियों ने चुनाव प्रक्रिया को तीन चरणों में कराने का फैसला किया है. मीरपुर में 27 जुलाई को मतदान होगा, जबकि अशांत पुंछ डिवीजन में चुनाव 10 अगस्त तक के लिए टाल दिए गए हैं.
प्रशासन ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए मुजफ्फराबाद में मतदान की तारीख 2 अगस्त निर्धारित की है. वहीं, भारत सीमा के निकट रावलाकोट में जेएएसी का विरोध प्रदर्शन अब भी जारी है.
निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की मांग
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या ये चुनाव जनता का भरोसा दोबारा जीत पाएंगे या फिर लोगों के गुस्से को केवल अस्थायी रूप से शांत करने का काम करेंगे.
रावलाकोट में प्रदर्शन कर रहे 22 वर्षीय छात्र अली रजा ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम सिर्फ निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं, जो हमारा अधिकार है. यहां रहने वाले स्थानीय लोगों को अपने प्रतिनिधि चुनने का हक होना चाहिए, ना कि उन शरणार्थियों को जो भारत से आकर यहां बसे हैं."
क्षेत्र में सत्ताधारी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की केंद्रीय सूचना सचिव शाजिया मर्री ने कहा, "यह चुनाव एजेके के लोगों के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनने का एक महत्वपूर्ण अवसर है. लोग चाहते हैं कि उनके अधिकारों की रक्षा हो, उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए और सरकार अपने वादों को पूरा करे."
हालांकि, जेएएसी का कहना है कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन इससे उन समस्याओं का समाधान नहीं होगा, जिनके कारण हजारों लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए.
नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर डीडब्ल्यू से बातचीत में जेएएसी के एक पदाधिकारी ने कहा, "हमारा आंदोलन केवल एक सरकार को हटाकर दूसरी सरकार लाने के लिए नहीं है. हमें अपने अधिकार चाहिए, लेकिन चुनावी अभियानों में सिर्फ राजनीतिक नारे सुनाई दे रहे हैं."
भूराजनीतिक विशेषज्ञ और यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस, पाकिस्तान के पूर्व निदेशक इमरान खान का मानना है कि चुनावों के बाद भी यह आंदोलन जारी रहेगा.
डीडब्ल्यू से बातचीत में इमरान खान ने कहा, "चुनाव अपने आप में महत्वपूर्ण हैं और राजनीतिक प्रक्रिया को जारी रखने में उनकी भूमिका है, लेकिन वे जेएएसी समर्थकों की नाराजगी दूर नहीं कर पाएंगे." उन्होंने कहा, "आंदोलन अब विधानसभा से बाहर है और लोगों का संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ चुका है."
कश्मीर की राजनीति पर जेएएसी का असर कितना गहरा?
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि जेएएसी के प्रदर्शन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजनीति में बड़ा बदलाव लाए हैं. इस आंदोलन ने पारंपरिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से आगे बढ़कर आर्थिक और सुशासन के मुद्दों पर विभिन्न दलों से जुड़े लोगों को एक मंच पर ला खड़ा किया है. इमरान खान के अनुसार, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के कई महत्वपूर्ण इलाकों में जेएएसी एक प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बन चुका है.
खान के अनुसार, विदेशी समर्थन और फंडिंग के आरोपों के बावजूद जेएएसी की साख आम लोगों के बीच मुख्यधारा के नेताओं और राजनीतिक दलों से अधिक है. इसने पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे आंदोलनों को कमजोर करने के लिए पाकिस्तानी स्थानीय प्रशासन के पास पर्याप्त साधन और तरीके मौजूद हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि जनता का भरोसा वापस पाने के लिए केवल चुनावी अभियान नहीं, बल्कि वास्तविक बदलाव जरूरी हैं.
खान ने तर्क दिया कि आने वाली सरकार दोहरे दबाव में होगी क्योंकि एक तरफ पाकिस्तानी स्थानीय प्रशासन और दूसरी तरफ जेएएसी के पक्ष में खड़ी जनभावना है. उनके अनुसार, जब तक स्थानीय सरकार जेएएसी के साथ किसी समझौते पर नहीं पहुंचती, उसकी विश्वसनीयता सीमित रहेगी और शासन चलाने की गुंजाइश भी कम होगी.
हालांकि, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की शाजिया मर्री का मानना है कि जनता का भरोसा तभी लौटेगा जब उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए, ठोस समाधान पेश किए जाएं और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाया जाए.
क्या सुधारों में देरी से फिर भड़केंगे प्रदर्शन?
जानकारों का कहना है कि महत्वपूर्ण मुद्दे अनसुलझे रहने पर क्षेत्र में फिर से बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भड़क सकते हैं.
इमरान खान का मानना है, "यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि विरोध प्रदर्शनों की और लहरें देखने को मिलेंगी, लेकिन जेएएसी में एक स्थाई राजनीतिक ताकत बनने की क्षमता जरूर है " हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि आंतरिक मतभेद और स्थानीय प्रशासन का दबाव संगठन को कमजोर कर सकता है.
हालांकि, यह चुनाव तय करेंगे कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सत्ता किसके हाथ में होगी, लेकिन इससे कश्मीर से जुड़े व्यापक संवैधानिक विवाद के सुलझने या शासन व्यवस्था को लेकर लंबे समय से चली आ रही नाराजगी के खत्म होने की संभावना कम है.
शाजिया मर्री के अनुसार, "जनता की समस्याओं को समझना और बातचीत के माध्यम से उनका समाधान निकालना सरकारों की जिम्मेदारी है. स्थिरता तभी संभव है जब लोगों की आवाज सुनी जाए और वादों को नतीजों में बदला जाए."
वहीं, जेन-जी प्रदर्शनकारी रजा के मुताबिक, "दुनिया बदल चुकी है. हमने पड़ोसी देशों में छात्र आंदोलनों के जरिए सरकारों को गिरते देखा है. हम रुकने वाले नहीं हैं और जब तक हमारे अधिकार हमें नहीं मिल जाते, तब तक हमारा विरोध जारी रहेगा.