घटती आबादी, पलायन से दुखी हुआ 'सबसे खुशहाल देश' भूटान
'सबसे खुशहाल देश' कहलाने वाला भारत का पड़ोसी पर्वतीय देश भूटान हाल के सालों में जन्मदर में गिरावट और युवाओं के पलायन की परेशानी से जूझ रहा है.
'सबसे खुशहाल देश' कहलाने वाला भारत का पड़ोसी पर्वतीय देश भूटान हाल के सालों में जन्मदर में गिरावट और युवाओं के पलायन की परेशानी से जूझ रहा है. सरकार अब लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैकरीब आठ लाख की आबादी वाला भूटान जीडीपी की बजाय राष्ट्रीय प्रगति और लोगों की खुशहाली को मापने का एक अनूठा बहुआयामी पैमाना ‘सकल राष्ट्रीय खुशी सूचकांक' अपनाता रहा है.
बीते एक दशक में यहां सालाना जन्म दर में एक-चौथाई से ज्यादा की गिरावट आई है. इसके साथ ही रोजगार की तलाश में तेजी से बढ़ते पलायन की वजह से घटती युवा आबादी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कुल आबादी में से करीब दस फीसदी लोग विदेशों में बस गए हैं.
'सबसे खुश देश' भूटान पर छाए चिंता के बादल
वैसे तो दुनिया के कई देशों में लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है. लेकिन इस खुशहाल और 'सकल राष्ट्रीय खुशी सूचकांक' वाले देश को पहली बार ऐसी समस्या से जूझना पड़ रहा है. देश में 2050 तक 65 साल से ज्यादा की उम्र वाली आबादी का आंकड़ा मौजूद छह से बढ़कर 17 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है.
प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने इसे 'आबादी के अस्तित्व' से जुड़ा संकट बताते हुए इस पर अंकुश लगाने के लिए कुछ उपायों का एलान किया है. सरकार ने तेजी से घटती आबादी पर अंकुश लगाने के लिए बीते महीने 'द थर्ड चाइल्ड' यानी तीसरा बच्चा नामक एक योजना शुरू की है. इसके तहत ऐसे परिवारों को 3 साल तक हर महीने 105 अमेरिकी डॉलर की आर्थिक सहायता दी जाएगी. सरकार ने प्रतिभा का पलायन रोकने के लिए सौ अरब अमेरिकी डालर की एक गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी नामक एक महत्वाकांक्षी परियोजना भी शुरू की है.
घटती जनसंख्या चुनौती है या अवसर?
प्रधानमंत्री ने संसद में बताया है कि ताजा आंकड़े भूटान के कामकाजी लोगों की संख्या, वित्तीय स्थिरता और देश भर में विभिन्न समुदायों के सामाजिक ताने-बाने पर बढ़ते दबाव को बताते हैं. सरकार को डर है कि जन्म दर में गिरावट और लगातार हो रहे पलायन के कारण अर्थव्यवस्था और बुजुर्ग आबादी को सहारा देने के लिए देश में काम करने की उम्र वाले बहुत कम लोग बचेंगे.
सरकारी नियंत्रण वाली भूटान ब्राडकास्टिंग सेवा की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल विदेशों में रहने वाले 71 हजार से ज्यादा भूटानी नागरिकों में 39 हजार यानी 55 फीसदी अकेले ऑस्ट्रेलिया में हैं. उसके अलावा कनाडा और अमेरिका भी युवाओं की पसंद बन रहा है.
भूटान के स्थानीय लोगों का कहना है कि महज वित्तीय मदद से लोगों को तीसरा बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता. एक सरकारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में जन्म दर 1.8 प्रति महिला रह गई है जो रिप्लेसमेंट स्तर से कम है.
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पूर्व सरकारी अधिकारी खांडू वांग्मो सरकार की पहल का तो स्वागत करते हैं. लेकिन उनका सवाल है कि क्या केवल नकद भुगतान से लोग अधिक बच्चे पैदा करने के लिए राजी होंगे? वो डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सिर्फ बच्चे पैदा करना ही समस्या का हल नहीं है. उनके पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई और स्वास्थ्य सुविधाओं का खर्च बहुत ज्यादा है."
राजधानी थिम्पू के एक कालेज में मानव विज्ञान पढ़ाने वाले सी.के.लेप्चा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "भूटान की आबादी में बदलाव काफी तेज रहा है. नब्बे के दशक में यहां जन्म दर 6.6 प्रति महिला थी, जो अब घटकर 1.8 रह गई है. रोजगार के लिए युवा आबादी के विदेशों का रुख करने के बढ़ते चलन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है."
भूटान में क्यों कम हो रही है जन्मदर?
जानकारों का कहना है कि छोटे परिवारों की बढ़ती संख्या के कई कारण हैं. इनमें रहने-खाने और बच्चों की देखभाल के बढ़ते खर्च के अलावा लोगों की बदलती प्राथमिकताएं शामिल हैं. फुंटशोलिंग शहर के सामाजिक कार्यकर्ता सी.के. शेरिंग डीडब्ल्यू से कहते हैं, देश में रोजगार और करियर के बेहतर अवसरों की कमी है. इसके अलावा खासकर शहरी इलाकों में बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और आवास की लागत तेजी से बढ़ रही है. साथ ही करियर को प्राथमिकता देने और महिलाओं में उच्च-शिक्षा का चलन बढ़ने के कारण कामकाजी दंपतियों की संख्या बढ़ रही हैं और ऐसे लोग छोटे परिवार के प्राथमिकता दे रहे हैं.
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भारतीय सीमा से सटे फुंटशोलिंग शहर में रहने वाली एक कामकाजी महिला सोनम शेरिंग डीडब्ल्यू से कहती हैं, "मेरा एक भी बेटा है. अगर आर्थिक स्थिति बेहतर होती तो मैं एक और बच्चा पैदा करने के बारे में सोच सकती थी. लेकिन बच्चों के पालन-पोषण पर बढ़ते खर्च और महंगी स्वास्थ्य सुविधाओं के अलावा लगातार बढ़ते घरेलू खर्चों की वजह से ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सकती."
पूर्व पत्रकार और महिला अधिकार कार्यकर्ता नामगे जम डीडब्ल्यू से कहती हैं, "तीसरे बच्चे के लिए सिर्फ सरकारी सहायता से काम नहीं होगा. यह मदद महज तीन वर्षों तक ही जारी रहेगी. इसके लिए बच्चों के पालन-पोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं और पढ़ाई के खर्च को बी ध्यान में रखना होगा."
दिलचस्प बात यह है कि भूटान ने 1974 में 'छोटा परिवार, सुखी परिवार' अभियान के जरिए परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया था. उसकी वजह से अगले कुछ दशकों में देश में प्रजनन दर कम करने में सहायता मिली थी. नब्बे के दशक में प्रवासन नीतियों को कड़ाई से लागू करने के कारण नेपाली मूल के करीब एक लाख लोग देश छोड़ कर बाहर चले गए थे. उस समय वो देश की आबादी का छठा हिस्सा थे.
पलायन रोकने के लिए कैसी कोशिशें कर रही है भूटान सरकार
युवा आबादी का पलायन रोकने के लिए सरकार ने गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी (जीएमसी) नामक एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है. इसमें बौद्ध दर्शन के तहत एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र की स्थापना की जानी है जो 'एक देश, दो प्रणाली' मॉडल पर काम करेगा. इसका मकसद दुनिया के विभिन्न देशों की बेहतरीन प्रशासनिक और व्यापारिक व्यवस्था को अपना कर उनको स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढालना है.
सरकार का कहना है कि इस योजना के तहत बसे शहरों का सबसे प्रमुख मकसद देश से प्रतिभा पलायन रोकना है. इसके लिए भारत समेत कई देशों के अलावा विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक भी अनुदान और कर्ज के तौर पर मदद कर रहे हैं. कुल परियोजना लागत सौ अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है. इस विशेष क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के अलावा कई पर्यावरण अनुकूल योजनाएं शुरू की जाएंगी ताकि युवाओं को देश में ही रोजगार मिल सके.
लेकिन आलोचक इस पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं. सिलीगुड़ी में रहने वाले भूटानी नागरिक ड्रुक नामग्ये डीडब्ल्यू से कहते हैं, "क्या इस भारी -भरकम निवेश के बावजूद प्रतिभा पलायन पर अंकुश लगाना संभव होगा? क्या इस परियोजना के जरिए रोजगार के ऐसे बेहतरीन मौके पैदा होंगे जो विदेश में बसे नागरिकों को स्वदेश वापसी के लिए लुभा सके? यह तो आने वाला समय ही बताएगा." उनका कहना था कि सरकार को समय रहते इस दिशा में पहल करनी चाहिए थी.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 27, 2026 07:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

