करीब 5,500 साल पहले भी घुमक्कड़ शिकारी इंसानी समुदायों के लिए महामारी साबित हुआ था प्लेग. एक नई रिसर्च से इस बारे में जानकारी मिल सकती है कि तब मानव को यह घातक बीमारी कैसे लगी होगी.आमतौर पर प्लेग को चूहों से जोड़ कर देखा जाता है. जो मध्ययुगीन नगरों की भीड़भाड़ वाली जगहों में इसे फैलाते रहे. इसके चलते 'ब्लैक डेथ' जैसी महामारियां फैलीं. 14 वीं से 19वीं सदी के बीच यूरोप में करोड़ों लोगों की मौत इनकी वजह से हुई.
रूस के साइबेरिया में लेक बाइकाल के आस पास रहने वाले शिकारी घुमक्कड़ मनुष्यों के जीवन से यह बहुत बाद की बात है. पुरातत्वशास्त्रियों ने इस इलाके में प्रागैतिहासिक घुमक्कड़ शिकारी मनुष्यों को दफनाए जाने वाली जगहों का अध्ययन कई दशकों तक किया है. इनमें से एक जगह खासतौर से रहस्यमय है क्योंकि वहां मिले अवशेष जिनके हैं उनकी "मृत्यु का कारण असामान्य है."
प्लेग से मौत
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रुइरे मैक्लॉड ने मीडिया से बातचीत में कहा कि बहुत कम अवधि में बहुत से बच्चे और अवयस्कों की मौत के संकेत हैं. नेचर जर्नल में छपी रिसर्च रिपोर्ट के प्रमुख लेखक का कहना है कि उनकी हड्डियों से किसी हिंसा या पीड़ा के संकेत नहीं मिल रहे हैं. इसका मतलब है कि इस विनाशकारी घटना का कोई उचित कारण नहीं है.
रिसर्चरों की टीम ने जब झील के पास मिले 46 लोगों के प्राचीन डीएनए का सिक्वेंस तैयार किया तो उनमें से 18 में येरसिनिया पेस्टीस नाम के बैक्टीरिया मिले. यह बैक्टीरिया प्लेग के लिए जिम्मेदार है. इसका मतलब है कि इनमें से करीब 40 फीसदी लोगों की मौत प्लेग से हुई थी. मध्ययुगीन कब्रगाहों से मिले शवों की तुलना में यह दर काफी ज्यादा है. प्राचीन डीएनए में प्लेग का पता लगाने के दौरान कई बार यह नकारात्मक परिणाम भी देता है.
तो ऐसे में इन नतीजों से यह अनुमान काफी उचित है कि सभी लोगों की "मौत प्लेग की वजह से हुई थी." मैक्लोड के मुताबिक इतिहास में दो बार ये महामारी आई थी जिसमें पहली करीब 5,500 साल पहले थी. मैक्लोड का कहना है, "यह बहुत हैरानी की बात है."
स्वर्णकाल का सच
इस खोज से पहले प्लेग की बीमारी के बसे पुराने निशान उत्तरी यूरोप के किसान समुदायों में करीब 5,300 साल पहले मिले थे. हालांकि ये प्राचीन बीमारियां कितनी घातक रही होंगी इसे लेकर वैज्ञानिकों के समुदाय में काफी बहस होती है. केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन में जेनेटिक साइंस के प्रोफेसर एस्के विलेरस्लेव के मुताबिक ऐसा समझा जाता है कि इस तरह की महामारी घुमक्कड़ शिकारी समुदायों में नहीं फैल सकती. उसकी वजह यह है कि ये लोग छोटे समूहों में रहते थे और लगातार अपनी जगह बदलते रहते थे.
विलेरस्लेव के मुताबिक माना जाता है कि "संक्रामक बीमारियां सचमुच किसी समुदाय को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं." विलेरस्लेव के मुताबिक यही वजह है कि विज्ञान की कुछ बहुत प्रसिद्ध किताब लिखने वाले युवाल नोआह हरारी और जेयर्ड डायमंड जैसे लेखकों ने घुमक्कड़ शिकारियों के दौर को "एक तरह का स्वर्ण युग" कहा है जिसमें कोई रोग या बीमारी नहीं थी.
विलेरस्लेव का यह भी कहना है, "घुमक्कड़ शिकारी होना आसान नहीं था." इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि प्लेग होना शायद उनमें "बहुत आम बात" थी.
प्लेग को फैलाने के लिए चूहे कुख्यात हैं लेकिन इस तरह की प्रागैतिहासिक साइबेरियन महामारी के लिए एक दूसरे जानवर को जिम्मेदार माना जा सकता है. यह जानवर है टारबैगन मेरमॉट. मैक्लोड का कहना है, "मेरमॉट को वह असली परपोसी प्रजाति माना जाता है जिसमें प्लेग का सबसे पहले विकास हुआ था." साइबेरिया और मंगोलिया के इलाके में आज भी मेरमॉट के जरिए प्लेग फैलने की बात खूब दर्ज होती है. यहां फर और मांस के लिए मेरमॉट का शिकार किया जाता है. घुमक्कड़ शिकारियों के प्लेग की चपेट में आने की भी शायद यही वजह रही होगी.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में वायरोलॉजी की प्रोफेसर आस्ट्रिड इवर्सन का कहना है, "संभवतया पहला संक्रमण जानवर से इंसान के बीच और फिर वहां से दूसरे इंसानों तक फैला होगा." इवर्सन ने ध्यान दिलाया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आज भी संक्रामक रोगों में से करीब तीन चौथाई जानवरों से इंसानों में फैलते हैं. तो ये बदकिस्मत घुमक्कड़ शिकारी आज के इंसानों को एक सबक दे सकते हैं. मैक्लोड का कहना है, "जानवरों से इंसानों तक संक्रमण कब फैला और कैसे दूसरे संदर्भों, जगहों और समय में उनका विकास हुआ इसके बीच की कड़ियों को समझना बेहद जरूरी है यह समझने के लिए कि यह खतरा भविष्य में कैसा होगा."













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