Kark Sankranti 2022: क्या है कर्क संक्रांति का महात्म्य? जानें इसकी पूजा-अनुष्ठान के नियम एवं कुछ रोचक तथ्य

हिंदू धर्म के अनुसार सूर्य जब राशि परिवर्तन करता है, तब संक्रांति होता है, और जब सूर्य मिथुन से कर्क राशि में प्रवेश करता है तब कर्क संक्रांति की स्थिति होती है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस दिन कर्क संक्रांति होता है, उसी दिन से सूर्य का दक्षिणायन गमन शुरू हो जाता है. इस दिन भगवान विष्णु का व्रत एवं पूजा-अर्चना की परंपरा है. इसी दिन भगवान विष्णु योग निद्रा शुरू होती है. हिंदू धर्म में इस दिन अन्न, वस्त्र एवं अन्य उपयोगी वस्तु का दान देने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है. कर्क संक्रांति को श्रावण संक्रांति भी कहते हैं. गौरतलब है कि सूर्य के दक्षिणायन शुरू होने से दिन छोटे होते हैं और रातें लंबी होने लगती हैं. हिंदू पंचांग के अनुसार कर्क संक्रांति 16 जुलाई, शनिवार को मनाया जायेगा. आइये जानें इस संदर्भ में कुछ रोचक तथ्य...

कर्क संक्रांति की पूजा अनुष्ठान के नियम

कर्क संक्रांति पर प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात किसी पवित्र नदी, सरोवर अथवा घर के पानी में गंगाजल की कुछ बूंदे डालकर स्नान करें. एक तांबे के लोटे में जल एवं तिल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें. घर के मंदिर में विष्णु जी की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान करवाकर स्थापित करें. धूप एवं दीप प्रज्जवलित कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत एवं पूजा का संकल्प लें. विष्णु जी को पीला पुष्प, अक्षत, पीला चंदन, पीतांबर एवं गाय के दूध से बनी मिठाई एवं पीले फल चढ़ाएं. विष्णु सहस्त्रनाम स्त्रोत का जाप करें. अंत में विष्णु जी की आरती उतार कर प्रसाद वितरित करें. पूजा के पश्चात ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र एवं तेल दान करना चाहिए.

कर्क संक्रांति का पुण्यकाल

कर्क संक्रांति पुण्य काल 05.34 AM से 05.09 PM तक (16 जुलाई, शनिवार 2022)

संक्रांति महापुण्य काल 02.51 PM से 05.09 PM तक (16 जुलाई, शनिवार 2022)

सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश का समय 10.50 PM पर (16 जुलाई, शनिवार 2022)

कर्क संक्रांति का महात्म्य

सूर्य जब राशि विशेष में गोचर करते हैं, उस तिथि को संक्रांति कहते हैं. ध्यान रहे कि सूर्य 12 माह के दरम्यान सभी 12 राशियों में क्रमशः प्रवेश करते हैं. हर राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है. इसमें मकर और कर्क संक्रांति का विशेष महत्व बताया जाता है, क्योंकि कर्क राशि में प्रवेश के साथ ही सूर्य दक्षिण की ओर प्रस्थान करते हैं. कर्क संक्रांति पर सूर्यदेव एवं विष्णु जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन स्नान-दान, पूजा-पाठ, जप-तप आदि करने से अक्षुण्ण पुण्य प्राप्त होता है, सारे दोष एवं पाप नष्ट होते हैं, तथा ग्रह-नक्षत्रों का शुभ फल प्राप्त होता है. इस दिन भगवान वराह स्वामी की विशेष पूजा का भी विधान है.

तर्पण एवं पिंडदान के लिए अनुकूल है दिन

मानसून के आगमन के प्रतीक स्वरूप कर्क संक्रांति कृषि के लिए तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही जो लोग दिवंगत परिजनों की शांति के लिए तर्पण एवं पिंडदान आदि कार्य करना चाहते हैं, उनके लिए कर्क राशि का विशेष महत्व होता है.

कर्क संक्रांति की खास बातें

* दक्षिणायन की अवधि छह माह होती है. मान्यता है कि दक्षिणायन से देवताओं की रात्रि शुरू हो जाती है.

* कहते हैं कि सूर्य के दक्षिणायन गोचर से नकारात्मक शक्तियां तेजी से सक्रिय हो जाती हैं, और शुभ शक्तियां कम होती हैं.

* दक्षिणायन काल में सूर्य कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि मे गोचर करते हैं.

* ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कर्क संक्रांति काल में सूर्य की पूजा करने से जातक के सभी रोग एवं दोष दूर हो जाते हैं.

* कर्क संक्रांति पर आदित्य हृदय स्तोत्र, सूर्य चालीसा और सूर्य मंत्रों का जप करना चाहिए.