भारत में इंजीनियर बनने का सपना फीका क्यों पड़ रहा है?

एक समय इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना एक सुरक्षित कारोबार माना जाता था.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

एक समय इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना एक सुरक्षित कारोबार माना जाता था. आज उनमें से कई खाली हैं या बंद हो रहे हैं. आखिर ऐसा क्या बदला कि इंजीनियर बनने का सपना लाखों युवाओं के लिए पहले जैसा आकर्षक नहीं रहा?करीब डेढ़ दशक पहले उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता था. हर साल हजारों छात्र बीटेक में दाखिला लेते थे और निजी कॉलेजों का तेजी से विस्तार हो रहा था. लेकिन अब वही संस्थान छात्रों के इंतजार में खाली पड़े हैं. कई कॉलेज बंद हो चुके हैं और कई बंद होने की कगार पर हैं. एक समय जिस तकनीकी शिक्षा को रोजगार की गारंटी माना जाता था, वही मॉडल आज सवालों के घेरे में है.

यही नहीं, इंजीनियरिंग की महंगी डिग्री लेने के बाद छात्रों को या तो बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है या फिर बहुत कम तनख्वाह वाली नौकरियां मिलती हैं. नतीजा यह हुआ कि इंजीनियरिंग और एमबीए जैसे तमाम अन्य तकनीकी संस्थान धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं.

ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन यानी एआईसीटीई की एक ताजा रिपोर्ट ने न सिर्फ इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एक गंभीर चेतावनी दी है बल्कि देश के शैक्षिक परिवेश और बेरोजगारी की स्थिति पर भी सोचने को मजबूर किया है. एआईसीटीई के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2025-26 के दौरान देश भर में 58 से ज्यादा इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थान बंद कर दिए गए.

जिन राज्यों में ये कॉलेज बंद हुए हैं, उनमें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष पर हैं. इन दोनों राज्यों में 12-12 संस्थान बंद हुए हैं जबकि मध्य प्रदेश में आठ और तेलंगाना और पंजाब में चार-चार संस्थान बंद हुए हैं. इन 58 संस्थानों में से तीन सरकारी मदद वाले थे, जबकि बाकी निजी तौर पर संचालित हो रहे थे.

क्यों बंद हो रहे हैं कॉलेज?

दरअसल, एआईसीटीई उन स्थितियों में किसी संस्थान को बंद करने का आदेश देती है जब वहां छात्रों का दाखिला लगातार कम हो रहा हो, संस्थान में स्वीकृत संख्या में शिक्षकों की कमी हो और इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन के नियमों का सही तरीके से पालन न हो रहा हो.

एआईसीटीई भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए कानूनी तौर पर बनी राष्ट्रीय संस्था और नियामक है. यह इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, मैनेजमेंट और फार्मेसी जैसे कार्यक्रमों की देख-रेख करती है और गुणवत्ता और मानक बनाए रखने की निगरानी करती है.

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नोएडा के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में मेकेनेकिल इंजीनियरिंग पढ़ाने वाले एक शिक्षक नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि चार साल की पढ़ाई के दौरान एक छात्र औसतन आठ-दस लाख रुपये खर्च करता है लेकिन इस खर्च के अनुरूप उन्हें नौकरी नहीं मिलती.

उनके मुताबिक, "कई कॉलेजों की फीस तो और भी ज्यादा है. चार साल में इंजीनियर बनकर जब छात्र बाहर जाते हैं तो उन्हें 15-20 हजार महीने की नौकरी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है. यही नहीं, इसके बाद वो फिर उन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं जिसके लिए सिर्फ स्नातक की अर्हता होती है. तो धीरे-धीरे पेरेंट्स को भी लगता है कि बीटेक कराने से फायदा ही क्या?”

समस्या सिर्फ रोजगार की नहीं है

यानी समस्या सिर्फ रोजगार की नहीं है, बल्कि चार साल की पढ़ाई पर होने वाले निवेश और उससे होने वाले लाभ या रिटर्न के बिगड़ते समीकरण की भी है. दीपाली राज मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं. नोएडा के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया. वो बताती हैं, "कैंपस प्लेसमेंट में जो ऑफर मिले, उनकी सैलरी चार साल की पढ़ाई पर हुए खर्च के मुकाबले बहुत कम थी. इसलिए मैंने बैंकिंग की तैयारी शुरू कर दी. कम से कम वहां नौकरी की स्थिरता तो है”

दीपाली पिछले तीन साल से तैयारी में हैं लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली. दीपाली कहती हैं कि उनकी तरह हजारों की संख्या में इंजीनियरिंग करने वाले छात्र इन परीक्षाओं की तैयारी क रहे हैं. वजह यह कि कम से कम स्थाई नौकरी तो मिल जाएगी, बीटेक की डिग्री में इसकी गारंटी नहीं है.

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प्राइवेट संस्थानों के बंद होने के पीछे और भी कई कारण हैं. जानकारों के मुताबिक, एक तो ये अभी भी पुराने पाठ्यक्रमों के हिसाब से चल रहे हैं जबकि आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस के जमाने में चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं. इसके अलावा बीटेक के पाठ्यक्रमों का विकल्प अन्य पाठ्यक्रमों में भी है जिन्हें पूरा करने में समय भी कम लगता है और खर्च भी.

गाजियाबाद के एबीईएस कॉलेज में कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर आदित्य टंडन बताते हैं, "बीटेक में भीड़ बढ़ गई है. डेटा साइंस में भरमार हो गई है और इसमें सिर्फ बीटेक ही नहीं चाहिए, दूसरे क्षेत्रों के लोग भी आते हैं. इसके अलावा, बीटेक के विकल्प के रूप में बीसीए, बीएससी कंप्यूटर साइंस जैसे कोर्स तीन साल में ही हो जा रहे हैं. इनका पाठ्यक्रम बीटेक जैसा ही है. यही नहीं, कई प्रोग्राम ऑनलाइन और डिस्टेंस लर्निंग मोड में भी हैं. तो छात्रों को यह भी एक विकल्प मिल जाता है. छात्रों की संख्या में कमी की वजह ये भी है.”

तकनीक तेजी से बदल रही है

पिछले कुछ वर्षों में आईटी और तकनीकी कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया भी बदली है. कई कंपनियां अब केवल डिग्री के आधार पर भर्ती करने के बजाय उम्मीदवार के कौशल, प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप और समस्या सुलझाने की क्षमता पर ज्यादा जोर दे रही हैं. ऐसे में केवल बीटेक की डिग्री नौकरी की गारंटी नहीं रह गई है.

यहीं एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा होता है कि यदि इंजीनियरिंग का आकर्षण कम हो रहा है, तो फिर हर साल लाखों छात्र जेईई जैसी परीक्षाओं की तैयारी क्यों कर रहे हैं?

दिल्ली, कोटा, पुणे, कानपुर जैसी जगहों पर लाखों की संख्या में छात्र इन्हीं प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. दिल्ली में एक इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले दुर्गेश कुमार खुद भी आईआईटी से इंजीनियर रहे हैं. नौकरी करने की बजाय उन्होंने छात्रों को पढ़ाने का फैसला किया.

डीडब्ल्यू से बातचीत में दुर्गेश कहते हैं, "यह कहना ठीक नहीं है कि इंजीनियरिंग में लोगों की दिलचस्पी कम हो गई है. लेकिन हां, उन संस्थानों से बीटेक का क्रेज जरूर खत्म हुआ है जहां पढ़ाई, ट्रेनिंग और प्लेसमेंट का स्तर कमजोर है. जो संस्थान इसे सिर्फ पैसा कमाने का जरिया बनाए हुए हैं. आज भी आईआईटी, एनआईटी और तमाम अन्य संस्थानों की मांग वैसी ही बनी हुई है जैसी बीस-तीस साल पहले थी. इसका कारण है कि इन संस्थानों ने अपनी गुणवत्ता बरकरार रखी है और आधुनिक तकनीक और समय के हिसाब से खुद को ढालते रहे हैं. ज्यादातर संस्थान सरकारी नियंत्रण में हैं जहां पैसा कमाना संस्थान का लक्ष्य नहीं बल्कि संस्थान से बेहतर प्रशिक्षित लोग तैयार करना है.”

सिर्फ यही संस्थान टिक पाएंगे

जानकारों का मानना है कि उद्योगों की मांग अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स और सेमीकंडक्टर जैसी नई तकनीकों की ओर बढ़ रही है. जिन संस्थानों ने समय के अनुरूप अपने पाठ्यक्रम, प्रयोगशालाओं और उद्योगों से जुड़ाव को मजबूत नहीं किया, वहां छात्रों का रुझान लगातार घटा है. आदित्य टंडन कहते हैं कि आने वाले समय में वही संस्थान टिक पाएंगे, जो आधुनिक तकनीकों को अपनाने के साथ कौशल आधारित शिक्षा और उद्योगों के साथ बेहतर समन्वय पर जोर देंगे.

उनके मुताबिक, "चूंकि निजी क्षेत्र के ज्यादातर संस्थान किसी तरह मान्यता लेने की कोशिश करते हैं, इसके लिए तमाम मानकों का उल्लंघन भी करते हैं लेकिन जब छात्र यहां आते हैं तो खुद को ठगा महसूस करते हैं. ऐसे में धीरे-धीरे वहां छात्रों की संख्या में कमी आने ही लगती है. यही नहीं, संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता और उनका प्रोफाइल भी बहुत मायने रखता है. बहुत से निजी संस्थान इस तरफ भी ज्यादा ध्यान नहीं देते. नतीजा, छात्रों की कमी होना ही है.”

दरअसल, यह कहानी केवल 58 इंजीनियरिंग कॉलेजों के बंद होने की नहीं है बल्कि यह भारत की तकनीकी शिक्षा के उस दौर के खत्म होने की कहानी है, जिसमें सिर्फ डिग्री मिल जाना ही सफलता की गारंटी माना जाता था. अब छात्र डिग्री नहीं, रोजगार तलाश रहा है. ऐसे में आने वाले दिनों में वही इंजीनियरिंग संस्थान टिक पाएंगे जो बदलती तकनीक, उद्योगों की जरूरत और छात्रों की अपेक्षाओं के साथ खुद को बदल सकेंगे. बाकी संस्थानों के लिए चुनौती और कठिन होती जाएगी.

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