पर्यावरण संरक्षण में क्यों पिछड़ रहा है भारत
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

पर्यावरण संरक्षण के मामले में दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है. पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक, 2026 ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है. हालांकि सरकार इसे खारिज करती रही है.केंद्र सरकार के तमाम दावों के बावजूद भारत पर्यावरण संरक्षण के मामले में प्रगति नहीं कर पा रहा है. ताजा एनवायरनमेंट परफार्मेंस इंडेक्स (ईपीआई) में भी वह नीचे से दूसरे नंबर पर है. उसके बाद लाओस का ही स्थान है. विडंबना यह है कि आठ एशियाई देशों में भी उसका स्थान सबसे अंतिम है. बांग्लादेश का स्थान भी भारत से ऊपर है.

येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय हर दो साल पर पर्यावरण से संबंधित यह वैश्विक सूचकांक तैयार करते हैं. इसके तहत पर्यावरण की स्थिति, पारिस्थितिकी तंत्र की जीवंतता और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले बदलावों से निपटने के उपायों को ध्यान में रखते हुए दुनिया के तमाम देशों को शून्य से सौ के पैमाने पर मापा जाता है.

ताजा सूची में शामिल 177 देशों में भारत 176वें स्थान पर है. सूची में शीर्ष पर एस्टोनिया है. यही नहीं, पहले पांच स्थानों पर यूरोपीय देश ही काबिज हैं. सूची में भारत का ईपीआई स्कोर सौ में से 22.46 है, जबकि एस्टोनिया का 74.79. इससे फर्क समझा जा सकता है.

इससे पहले वर्ष 2024 की ईपीआई में 180 देशों में भी भारत 176वें स्थान पर था जबकि वर्ष 2022 के सूचकांक में वह सबसे अंतिम 180वें स्थान पर था.

अवैध खनन, अतिक्रमण और गाद ने निकाली बिहार की नदियों की जान

हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते दस साल के आंकड़े को ध्यान में रखते हुए भारत की स्थिति में सकारात्मक बदलाव आए हैं. लेकिन कार्बन डाई ऑक्साइड और ग्रीन गैसों के उत्सर्जन की समस्या अब भी गंभीर होने के कारण वैश्विक देशों की सूची में उसकी स्थिति नहीं सुधर रही है.

रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि कम रैंकिंग वाले देशों को हवा, पानी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन पर काफी ध्यान देना चाहिए.

क्या कहती है सरकार

भारत ने इस साल अब तक इस सूचकांक पर कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन वर्ष 2022 में जब देश को 180 देशों में से सबसे नीचे रखा गया था तो पर्यावरण मंत्रालय ने इसे खारिज कर दिया था. उस समय जारी एक बयान में मंत्रालय ने कहा था कि सूचकांक में इस्तेमाल किए गए सूचक अनुमानों और अवैज्ञानिक तरीके पर आधारित है. बयान में सरकार ने आकलन के पैमाने और तरीकों पर सवाल खड़े किए थे.

सरकार की दलील रही है कि सूचकांक तैयार करने के दौरान 2050 के अनुमानित ग्रीन हाउस उत्सर्जन की गणना का सही तरीका नहीं अपनाया जाता. इसके साथ ही इसमें जंगल और वेटलैंड्स के कार्बन सोखने की क्षमता का भी सटीक आकलन नहीं किया गया है. इसके अलावा इस कृषि प्रधान देश में जैव विविधता, मिट्टी के स्वास्थ्य जैसे कई अहम सूचकांकों की भी अनदेखी की जाती रही है.

पर्यावरणविदों ने गिनाए पिछड़ने के कारण

पर्यावरणविदों का कहना है कि कोयले पर अतिरिक्त निर्भरता, तेजी से बढ़ती आबादी और अनियंत्रित शहरीकरण के कारण जंगल की कटाई बढ़ना और कचरा प्रबंधन ठीक नहीं होने के कारण नदियों और भूमिगत पानी में प्रदूषण बढ़ा है. इसके अलावा, विकास की होड़ के कारण पर्यावरण नियमों की अनदेखी किए जाने और इन नियमों को जमीनी स्तर पर कड़ाई से लागू नहीं करने के कारण पर्यावरण संरक्षण में देश पिछड़ रहा है.

असम की पर्यावरण कार्यकर्ता सुमति बसुमतरी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "हरित और सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ने के सरकारी दावों के बावजूद देश में दो-तिहाई से बिजली उत्पादन कोयले से ही किया जाता है. इससे वायु प्रदूषण के साथ ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ता है."

उनका कहना था कि अनियंत्रित विकास के कारण कई बार पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जाती है. इससे कानून होने के बावजूद अपेक्षित नतीजे नहीं मिलते.

मेघालय के वरिष्ठ पर्यावरणविद एम. खोंगताव डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बढ़ती आबादी की जरूरतें पूरी करने और विकास की होड़ में आधारभूत ढांचा तैयार करने के लिए देश के खासकर पूर्वोत्तर इलाके में जंगलों की कटाई तेजी से बढ़ी है. इसके लिए अक्सर पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जाती रही है. इससे पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंच रहा है."

सिलीगुड़ी स्थित गैर-सरकारी पर्यावरण संगठन हिमालयन नेचर एंड एडवेंचर फाउंडेशन की कार्यकर्ता कनिका बसु डीडब्ल्यू से कहती हैं, "विकास की होड़ में हम कचरे और प्लास्टिक का समुचित प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं. इससे इलाके की नदियों के साथ ही भूमिगत पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. इस समय ज्यादातर नदियों का पानी सीधे पीने के लायक नहीं है."

विकास बनाम पर्यावरण के टकराव से बने हालात

मणिपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता और लोकटक झील के संरक्षण के बनी तकनीकी समिति के सदस्य सलाम राजेश डीडब्ल्यू से कहते हैं, "विकास बनाम पर्यावरण के टकराव में अक्सर बाजी विकास के हाथ रहती है. ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कोई कामयाबी नहीं मिल सकती. पूर्वोत्तर भारत में मीठे पानी की सबसे बड़ी लोकटक झील इसकी मिसाल है. कड़े कानूनों के बावजूद पेड़ों की कटाई पर अंकुश नहीं लग पा रहा है और जंगल तेजी से साफ हो रहे हैं."

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन इलाके में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले बदलावों पर लंबे अरसे से शोध करने वाले जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुगत हाजरा डीडब्ल्यू को बताते हैं, "ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्यावरण में होने वाले बदलावों की वजह से सुंदरबन इलाके में कई द्वीप पानी में डूब चुके हैं. दरअसल, पर्यावरण नियमों को लागू करने की जिम्मेदारी किसी एक एजेंसी के पास नहीं है. इसलिए केंद्र और राज्य अक्सर इसकी अनदेखी का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ते रहते हैं. इसकी वजह से नियम कड़ाई से लागू नहीं हो पाते."

पर्वतीय राज्य सिक्किम में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने वाली महिला कार्यकर्ता सोंगमित लेप्चा डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों को कड़ाई से लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को एक अलग नोडल एजेंसी का गठन करते हुए उसकी जवाबदेही तय करनी चाहिए. इसके अलावा बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता घटाते हुए जल प्रबंधन की बेहतर रणनीति तैयार की जानी चाहिए. उसके बिना तस्वीर में सुधार संभव नहीं है."

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी वैश्विक रिपोर्ट को खारिज करना समस्या का हल नहीं है. इसकी वजह रेखांकित कर उसे दूर करने की दिशा में ठोस पहल की जानी चाहिए. अगर ऐसा नहीं किया गया तो भावी पीढ़ी को इसका गंभीर नतीजा भुगतना पड़ सकता है.