इस साल अलग क्यों है असम की बाढ़
पूर्वोत्तर राज्य असम एक बार फिर भयावह बाढ़ की चपेट में है.
पूर्वोत्तर राज्य असम एक बार फिर भयावह बाढ़ की चपेट में है. तीन सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले जिले पहली बार इसकी चपेट में आए हैं. इससे मौसम विज्ञानियों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ गई है.असम इस साल भी भयावह बाढ़ की चपेट में है. असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक, बाढ़ से राज्य के छह जिलों में अब तक करीब 70 लोगों की मौत हो चुकी है और छह लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हैं. बीते 24 घंटे के दौरान बारिश कम होने के कारण स्थिति और नहीं बिगड़ी बावजूद इसके तस्वीर काफी भयावह है.
बाढ़ का बदलता स्वरूप
अपने भूगोल, जलवायु और ब्रह्मपुत्र नदी के कारण यह राज्य हर साल कई बार बाढ़ की चपेट में आता है. राज्य के छह लाख से ज्यादा लोग इसकी चपेट में हैं और 70 से ज्यादा की मौत के अलावा डेढ़ लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं. हालांकि यह आंकड़े असली तस्वीर नहीं बताते.
ऊपरी असम के चराईदेव, जोरहाट और शिवसागर के अलावा गोलाघाट जिले के कुछ हिस्सों को बाढ़ से सुरक्षित माना जाता था. लोग गर्व से कहते थे कि बाढ़ का पानी आज तक उनके घरों में नहीं घुसा है. इस साल उन इलाकों पर ही बाढ़ की मार सबसे ज्यादा है.
खासकर चराईदेव और शिवसागर जिलों में बाढ़ से बचने के लिए लोगों को घर की छतों पर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. कुछ ही घंटों में गांव डूब गए और सड़कें टूट गईं.
मौसम विज्ञानियों और पर्वारणविदो का कहना है कि प्राकृतिक आपदा का यह बदलता भूगोल भविष्य के लिए खतरे की घंटी है. असम सरकार ने भी बीते सप्ताह विधानसभा में माना था कि बीते 60 वर्षों में राज्य में हालात इतने खराब नहीं हुए थे.
शुरुआत में बाढ़ के स्वरूप में मौजूदा खतरनाक बदलाव के लिए बादल फटने की घटना को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था लेकिन मौसम विभाग ने इन खबरों का खंडन कर दिया है. विभाग ने कहा है कि ऊपरी असम और पड़ोसी नागालैंड में लगातार भारी बारिश ही इस बाढ़ की वजह है, बादल फटना नहीं.
क्या बाढ़ पर अंकुश संभव है?
विशेषज्ञों का कहना है कि असम में बाढ़ पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है. इसकी वजह यह है कि यह ब्रह्मपुत्र के प्राकृतिक चक्र से जुड़ी है. मौसमी बाढ़ उपजाऊ मिट्टी को फिर से भरने के साथ ही काजीरंगा नेशनल पार्क जैसी आर्द्रभूमि को बनाए रखती है और खेती व मछली पालन में मदद करती है।
उनका कहना है कि असली चुनौती बाढ़ की बेहतर भविष्यवाणी, प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करने वाले आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड्स को बहाल करना, तटबंधों को मजबूत करना, जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाना और तटवर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर निर्माण पर अंकुश लगाकर बाढ़ के असर को घटाना है.
शिक्षाविद अरूप ज्योति सैकिया ने ब्रह्मपुत्र पर अपनी किताब 'द अनक्वाइट रिवर: ए बायोग्राफी ऑफ द ब्रह्मपुत्र' में लिखा है कि असम की भौगोलिक बसावट ही हर साल यहां आने वाली बाढ़ की प्रमुख वजह है.
असम का भूगोल
ब्रह्मपुत्र और बराक घाटियों में बंटा यह राज्य पर्वतीय राज्यों से घिरा है. यह दोनों घाटियां दो नदियों के नाम पर हैं. पर्वतीय कार्बी आंगलोंग और डिमा हसाओ जिले इन दोनों घाटियों को अलग करते हैं.
उनका कहना है कि इन दोनों नदियों की करीब 120 सहायक नदियां हैं. ऊपरी इलाकों में बारिश की वजह से इन नदियों में भारी मात्रा में गाद और पत्थर पहुंचते हैं. इससे हालात और गंभीर हो जाती है.
गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर ध्रुव ज्योति सैकिया इस साल की बाढ़ के बदले स्वरूप की वजहों का अध्ययन कर रहे हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "यह स्थिति बारिश और इंसानी गतिविधियों के मिले-जुले असर का नतीजा है. कई जगह खनन के कारण नदियों में भारी मात्रा में कीचड़ और गाद भर जाता है. इससे उसकी पानी वहन करने की क्षमता कम हो जाती है."
पर्वारणविद चंद्रिमा डेका डीडब्ल्यू को बताती हैं, "बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई ने भी हालत को गंभीर बना दिया है. मैदानी इलाकों के बंजर होने के कारण उनमें पानी सोखने या रोकने की क्षमता नहीं होती." विशेषज्ञों का कहना है कि पर्वतीय इलाकों से मैदानी इलाकों में उतरने वाली पानी के बहाव पर अंकुश लगाने के लिए वहां बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना जरूरी है. इससे बाढ़ के विनाश को कुछ कम किया जा सकता है.