भारत में नए नए हाईवे और एक्सप्रेसवे आखिर टूट क्यों रहे हैं?
भारत में नए हाईवे और एक्सप्रेसवे जिस रफ्तार से बन रहे हैं, उससे भी ज्यादा रफ्तार से इनमें आ रही दरारें, इनके धंसने और टूटने की घटनाओं ने एक दूसरा ही सवाल खड़ा कर दिया है.
भारत में नए हाईवे और एक्सप्रेसवे जिस रफ्तार से बन रहे हैं, उससे भी ज्यादा रफ्तार से इनमें आ रही दरारें, इनके धंसने और टूटने की घटनाओं ने एक दूसरा ही सवाल खड़ा कर दिया है.लखनऊ से कानपुर तक की दूरी करीब 75 किमी है और दोनों बड़े शहरों को जोड़ने के लिए पहले से ही बेहतर सड़कें थीं लेकिन इन दोनों शहरों के बीच सफर और आसान करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई ने एक एक्सप्रेसवे बना दिया. करीब 4200 करोड़ रुपये की लागत से बना 63 किमी लंबा यह लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उद्घाटन के बाद से ही दम तोड़ने लगा. एक्सप्रेसवे पर दर्जनों जगह गड्ढे हो गए हैं, जगह-जगह डामर उखड़ गया है और कई जगह लंबी दरारें आ गई हैं.
मरम्मत के दौरान टूटे हुए हिस्से को सुखाने के लिए बड़े-बड़े बिजली के पंखे लगाए गए थे जिनकी तस्वीरें और वीडियो खूब वायरल हुए. लेकिन यह अकेला मामला नहीं है.
अभी कुछ दिन पहले 12 हजार करोड़ रुपये की लागत से बने दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के निर्माण में लगातार खामियां सामने आ रहीं हैं. कहीं सड़क धंस गई है, कहीं फ्लाईओवर के लेंटर से पानी टपक रहा है तो कई जगह दरारें आ गई हैं. इसी साल 14 अप्रैल को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एक्सप्रेसवे का लोकार्पण किया था. महज साढ़े तीन महीने के भीतर ही इसमें कई समस्याएं आ चुकी हैं. एक्सप्रेसवे पर कार की रफ्तार 100 किमी प्रति घंटा निर्धारित है, लेकिन यात्रियों का कहना है कि 50-60 की रफ्तार से भी चलना मुश्किल है क्योंकि ज्यादा स्पीड पर झटके लगने लगते हैं.
साल भर में 48 हजार करोड़ रिश्वत में देते हैं ट्रक ड्राइवर
इसके अलावा गुरुग्राम-सोहना हाईवे पर भी सड़क धंसने की घटनाएं सामने आती रही हैं. करीब 2,000 करोड़ रुपये की लागत वाले इस कॉरिडोर के एक हिस्से में इसी साल मई में यानी बरसात शुरू होने से पहले ही सड़क धंस गई थी.
सड़कों के अलावा कई पुलों और अन्य निर्माण कार्यों में भी लगातार खामियां आ रही हैं. सवाल सिर्फ सड़क के टूटने का नहीं है. सवाल यह है कि जिस सड़क की उम्र दशकों होनी चाहिए, वह महीनों में जवाब देने लगे तो गलती आखिर किसकी है?
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
हाईवे इंजीनियरिंग को समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि किसी सड़क की मजबूती सिर्फ ऊपर दिखाई देने वाली एस्फाल्ट यानी डामर या कंक्रीट की परत से तय नहीं होती बल्कि सड़क के नीचे कई परतें होती हैं. अगर सड़क के नीचे पानी पहुंच जाता है और जलनिकासी यानी ड्रेनेज ठीक नहीं है तो मिट्टी की परतें धंसने लगती हैं और भारी ट्रैफिक के दबाव में सड़क धंस जाती है. इसके लिए जरूरी है कि सड़क बनाने से पहले वहां डाली गई मिट्टी बिल्कुल ठोस हो जाए.
सीपीडब्ल्यूडी के रिटायर्ड सिविल इंजीनियर दिनेश कुमार कई बड़ी सड़क परियोजनाओं का हिस्सा रहे हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "जल्दबाजी में सड़क के नीचे डाली गई मिट्टी और परतों को ठीक से दबाया नहीं जाता, जिससे अंदर नमी या एयर-पॉकेट्स रह जाते हैं. भारी मानसूनी बारिश के दौरान पानी सड़क के बेस तक रिस जाता है, जिससे मिट्टी अपनी पकड़ खो देती है और सड़क बैठने लगती है. इन सबके लिए समय चाहिए होता है लेकिन अक्सर देखने में आता है कि उद्घाटन की जल्दबाजी और तय डेडलाइन के चक्कर में जरूरी तकनीकी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर दी जाती है.”
घटिया निर्माण के पीछे की बड़ी वजह
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के मामले में खुद एनएचएआई ने सड़क धंसने के बाद खुद स्वीकार किया है कि इसके पीछे असली समस्या ड्रेनेज की है और ड्रेनेज तभी नुकसान पहुंचाता है जब मिट्टी खोखली हो यानी पूरी तरह से ठोस न हो पाई हो. हालांकि दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के मामले में एनएचएआई ने निर्माण गुणवत्ता को प्राथमिक कारण मानने से इनकार किया है. एनएचएआई की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि स्थानीय जलभराव और स्थायी क्रॉस-ड्रेनेज सिस्टम के चालू नहीं हो पाने के कारण सड़क की सतह धंसी.
लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही एक तथ्य सड़कों और पुलों के धंसने और ढहने के लिए जिम्मेदार है. तकनीकी खामियों के अलावा निर्माण परियोजनाओं में भ्रष्टाचार और कमजोर निगरानी भी एक गंभीर सवाल है. सड़क परियोजनाओं से जुड़े अफसर सीधे तौर पर कहते हैं कि जल्दबाजी के अलावा सिस्टम में नीचे से लेकर ऊपर तक जो भ्रष्टाचार चल रहा है, वह निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. कई बार ऐसी खामियां सड़क बनवाने वाले ठेकेदारों पर डाल दी जाती हैं लेकिन जानकारों के मुताबिक जिम्मेदारी केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं की जा सकती, बल्कि डिजाइन, गुणवत्ता नियंत्रण, साइट निरीक्षण और भुगतान की मंजूरी से जुड़े दूसरे स्तर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
जल्दबाजी और डेडलाइन
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की परियोजना से ही जुड़े एक बड़े अधिकारी नाम न छापने का अनुरोध करते हुए भ्रष्टाचार की कहानी विस्तार से बताते हैं, "देखिए किसी भी हाईवे या एक्स्प्रेसवे या किसी भी प्रोजेक्ट में सिर्फ ठेकेदार ही जिम्मेदार नहीं होता बल्कि डिजाइन कंसल्टेंट, हाईवे अथॉरिटी के इंजीनियर्स, अन्य इंजीनियर्स, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सिस्टम इत्यादि सभी की भूमिका होती है. यदि किसी सड़क में खराब सामग्री का इस्तेमाल हुआ, मिट्टी को ठीक से दबाने का काम नहीं हुआ या डिजाइन के मुताबिक परतें नहीं बिछाई गईं, तो यह केवल ठेकेदार की गलती नहीं रह जाती. सवाल यह भी होता है कि काम की निगरानी किसने की और उसे पास किसने किया?”
कई मामलों में यह सवाल भी उठता है कि ऊंची परियोजना लागत के बावजूद निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और काम की गुणवत्ता पर पर्याप्त निगरानी क्यों नहीं हो पाती. अगर निर्माण सामग्री या सड़क की अलग-अलग परतें तय मानकों के मुताबिक नहीं हैं, तो उसका असर सड़क बनने के कुछ समय बाद ही सामने आ सकता है.
भ्रष्टाचार और जवाबदेही
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की कई ऑडिट रिपोर्टों में हाईवे परियोजनाओं में कॉन्ट्रैक्ट मैनेजमेंट, निर्माण और ठेकेदारों को अनुचित लाभ से जुड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं. महाराष्ट्र की चार हाईवे परियोजनाओं की एक सीएजी ऑडिट में एनएचएआई की ओर से ठेकेदारों को करीब 203 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ दिए जाने का जिक्र है. ऐसी रिपोर्टें यह सवाल जरूर उठाती हैं कि परियोजनाओं में सिर्फ निर्माण करने वाले ठेकेदार की नहीं, बल्कि टेंडर से लेकर निरीक्षण और भुगतान तक पूरी व्यवस्था की जवाबदेही कितनी प्रभावी है.
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कंपनी और राजनीति के बीच एक पारिवारिक कड़ी भी चर्चा में है. परियोजना का ठेका पाने वाली कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक के सीएमडी प्रदीप कुमार जैन, बीजेपी के राज्यसभा सांसद नवीन जैन के बड़े भाई हैं. नवीन जैन के चुनावी हलफनामे में पीएनसी इंफ्राटेक में उनकी हिस्सेदारी भी दर्ज है. नवीन जैन खुद इस बारे में कोई बातचीत नहीं करते.
हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि कंपनी को यह ठेका उसके राजनीतिक संबंधों की वजह से मिला. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक पीएनसी इंफ्राटेक ने प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में सबसे कम बोली लगाकर परियोजना हासिल की थी, फिर भी कंपनी और सत्तारूढ़ दल के एक सांसद के बीच यह पारिवारिक और आर्थिक संबंध इस सवाल को जरूर महत्वपूर्ण बनाता है कि इतनी बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं में हितों के टकराव से बचने और निगरानी को स्वतंत्र रखने के लिए व्यवस्था कितनी मजबूत है.
पुराने हाईवे इतने मजबूत कैसे?
लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है. यदि सड़क निर्माण में तकनीकी मानकों, मिट्टी की कसावट और जलनिकासी की इतनी अहम भूमिका है तो देश में कई दशक पुराने हाईवे और सड़कें आज भी इस्तेमाल में हैं, क्या पहले सड़कें बेहतर बनती थीं या अब निर्माण का तरीका बदल गया है?
हाईवे इंजीनियरिंग के जानकारों के मुताबिक इसकी कोई एक वजह नहीं है. पुरानी और नई सड़कों की तुलना करते समय सड़क का डिजाइन, उस पर पड़ने वाला ट्रैफिक, रखरखाव, निर्माण सामग्री और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होता है, लेकिन एक बड़ा फर्क यह है कि आज सड़क निर्माण की परियोजनाएं कहीं ज्यादा बड़ी हैं और उन्हें कम समय में पूरा करने का दबाव भी ज्यादा है.
सिविल इंजीनियर राजेश कुमार यादव कहते हैं, "किसी एक्सप्रेसवे की मजबूती उसके निर्माण के बाद नहीं बल्कि निर्माण के दौरान तय होती है. यदि निर्माण के विभिन्न चरणों में जल्दबाजी होती है तो ऊपर से बनी सड़क कुछ समय तक बिल्कुल ठीक दिखाई दे सकती है, लेकिन बारिश और भारी यातायात के बाद उसकी कमजोरियां सामने आने लगती हैं. इसके अलावा अब देश में ऐसे इलाकों में भी बड़े एक्सप्रेसवे बनाए जा रहे हैं जहां मिट्टी, भूजल, बारिश और भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं. ऐसे में पुराने डिजाइन प्रारूपों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ड्रेनेज और डिजाइन तैयार करनी चाहिए.”
दरअसल, सड़क की ऊपरी परत सबसे पहले दिखाई देती है, इसलिए टूटने पर नजर भी उसी पर जाती है. लेकिन सड़क की असली मजबूती उसके नीचे छिपी परतों, जलनिकासी यानी ड्रेनेज, मिट्टी की कसावट, डिजाइन और निगरानी से तय होती है. इसलिए अगर नई सड़क कुछ महीनों में टूटती है तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि डामर खराब था या नहीं. असली सवाल यह है कि सड़क बनने के बाद क्यों पता चलता है कि उसके निर्माण के दौरान कहीं कुछ गलत हुआ था और उस गलती की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 18, 2026 05:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

