जब उपचुनावों ने बदली भारतीय राजनीति की तस्वीर

भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कई बार छोटे दिखने वाले उपचुनाव बड़े राजनीतिक बदलावों की भूमिका लिख चुके हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कई बार छोटे दिखने वाले उपचुनाव बड़े राजनीतिक बदलावों की भूमिका लिख चुके हैं. बांकीपुर और दतिया के नतीजों ने इसी बहस को फिर जिंदा कर दिया है.विधानसभा या लोकसभा के उपचुनाव वैसे तो उतना राजनीतिक महत्व नहीं रखते हैं लेकिन कई बार इन चुनावों से ना सिर्फ राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है बल्कि भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कई उपचुनाव ऐसे रहे हैं जिन्होंने आगे चलकर सत्ता परिवर्तन, बड़े नेताओं की वापसी और राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई.

बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिली हार ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. सत्तारूढ़ दल के लिए ये सिर्फ दो सीटों का नुकसान नहीं माना जा रहा बल्कि 2027 और 2029 की राजनीति के लिए इनसे निकले संकेतों को भी पढ़ने की कोशिश हो रही है.

हालांकि भारत का चुनावी इतिहास यह भी बताता है कि हर उपचुनाव राजनीतिक भविष्य का संकेत नहीं होता. कई बार स्थानीय समीकरण राष्ट्रीय निष्कर्षों को गलत साबित कर देते हैं. लेकिन निश्चित तौर पर कुछ उपचुनाव ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने आगे चलकर भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी.

चिकमगलूर और आजमगढ़ उपचुनाव- 1978

1978 में कर्नाटक के चिकमगलूर सीट पर हुआ उपचुनाव ऐसा ही एक चुनाव है जिसने इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी की दिशा तय की. 1977 में आपातकाल के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी. खुद इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गई थीं. ऐसे समय में कर्नाटक के चिकमगलूर लोकसभा उपचुनाव ने उन्हें संसद में वापसी का मौका दिया.

इंदिरा गांधी ने यह चुनाव जनता पार्टी के कद्दावर नेता वीरेंद्र पाटिल को हराकर जीता और यहीं से उनकी राजनीतिक वापसी शुरू हुई. जनता पार्टी सरकार के भीतर बढ़ती कलह के बीच कांग्रेस फिर मजबूत हुई और 1980 के आम चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और इंदिरा गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बन गईं.

हालांकि चिकमगलूर से पहले ही कांग्रेस को एक बड़ी संजीवनी यूपी के आजमगढ़ संसदीय सीट पर मिल चुकी थी जहां कांग्रेस उम्मीदवार मोहसिना किदवई ने जीत दर्ज की. वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार झा कहते हैं, "इंदिरा गांधी ने अपनी भरोसेमंद सहयोगी मोहसिना किदवई को चुनाव मैदान में उतारा और उनकी जीत ने कांग्रेस को नई जान दी. इस चौंकाने वाली जीत ने यह संकेत दिया कि इमरजेंसी के लिए कांग्रेस को कड़ी सजा देने के बावजूद लोगों ने उसे पूरी तरह नकारा नहीं था. इंदिरा गांधी को कर्नाटक में चिकमगलूर उपचुनाव लड़ने की प्रेरणा भी यहीं से मिली.”

दरअसल, ये वो दौर था जब इमरजेंसी के बाद कांग्रेस की लोकसभा के अलावा तमाम राज्यों की विधानसभाओं में भी हार का सिलसिला जारी थी. 1977 के चुनाव में यूपी की एक भी सीट कांग्रेस नहीं जीत पाई थी लेकिन अगले ही साल यानी 1978 में जब आजमगढ़ से जनता पार्टी के सांसद रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बन गए तो उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी.

लेकिन इस उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत ने राजनीतिक हालात को नाटकीय ढंग से बदल दिया और कांग्रेस पार्टी उम्मीद की नई किरण जगा दी. वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, "मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी ही सीट पर अपनी पार्टी के उम्मीदवार को नहीं जिता पाने के बाद रामनरेश यादव राजनीतिक रूप से इतने डर गए कि विधानसभा का उपचुनाव पूर्वांचल से लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. विधानसभा का उपचुनाव उन्होंने पश्चिमी यूपी की निधौलीकलां सीट से लड़ा और जीते.”

इन दोनों उपचुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद इंदिरा गांधी नई ऊर्जा के साथ चुनावी मैदान में डटीं और फिर 1980 में बड़ी जीत के साथ सरकार में वापसी की.

1988 का इलाहाबाद उपचुनाव और वीपी सिंह

देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले उपचुनावों में 1988 का इलाहाबाद संसदीय सीट पर हुआ चुनाव भी बेहद अहम रहा है.

राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस छोड़ चुके थे. इलाहाबाद सीट से लोकसभा पहुंचे अमिताभ बच्चन ने इस्तीफा दे दिया था. उनके इस्तीफे से यह सीट खाली हुई तो विश्वनाथ प्रताप सिंह उपचुनाव में मैदान में आए. उनके सामने कांग्रेस के सुनील शास्त्री थे.

वीपी सिंह भारी बहुमत से जीतकर संसद पहुंचे. यह जीत आने वाले कई साल की राजनीतिक दिशा तय करने वाला क्षण साबित हुई. बोफोर्स विवाद के बीच वीपी सिंह की इस जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का चेहरा बना दिया. महज एक साल बाद हुए 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने.

अरविंद कुमार सिंह ने 1988 के इस उपचुनाव को कवर किया था. डीडब्ल्यू से बातचीत में अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, "कांग्रेस के लिए वो आश्चर्यजनक हार थी. ये वो चुनाव था जिसमें तमाम बाहरी नेता आए, मसलन- देवीलाल, ज्योति बसु जैसे नेता इलाहाबाद आए. लेकिन असली डैमेज हुआ इस चुनाव में कांशीराम के उतरने पर. दलित वोट बैंक पहली बार कांग्रेस से अलग हुआ. कांशीराम को इस उपचुनाव में अस्सी हजार वोट मिले. यहां से बिछड़े दलित वोट को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस आज तक संघर्ष कर रही है.”

वीपी सिंह का कार्यकाल भले ही एक साल से भी कम रहा और उसके बाद गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ लेकिन भारतीय राजनीति में जो परिवर्तन आया वो महत्वपूर्ण था. देश में मंडल-कमंडल की राजनीति की शुरूआत यहीं से हुई और तमाम राजनीतिक मुद्दों के बीच आज भी चुनाव में यही मुद्दा सबसे अहम रहता है.

नांदयाल लोकसभा सीट और नरसिंहाराव

महत्वपूर्ण उपचुनावों की श्रृंखला में 1991 का नांदयाल लोकसभा सीट का उपचुनाव भी बहुत दिलचस्प है. 1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद पीवी नरसिंहराव के नेतृत्व में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन उस वक्त नरसिंराव लोकसभा सदस्य नहीं थे.

आंध्र प्रदेश के नांदयाल उपचुनाव में उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की. अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि तेलुगुदेशम पार्टी कांग्रेस की धुर विरोधी पार्टी थी, लेकिन टीडीपी ने ‘तेलुगु गौरव' के नाम पर नरसिंहाराव के खिलाफ उम्मीदवार ही नहीं उतारा और नरसिंहाराव ने करीब छह लाख वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की.

उसके बाद देश में आर्थिक उदारीकरण का नया दौर शुरू हुआ. इस उपचुनाव में नरसिंहराव को लगभग नब्बे प्रतिशत वोट मिले थे. दूसरे नंबर पर बीजेपी उम्मीदवार बंगारू लक्ष्मण रहे जिन्हें सिर्फ छह फीसद वोट मिले. बंगारू लक्ष्मण बाद में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने.

जब उपचुनाव के नतीजों का नहीं हुआ असर

हालांकि कुछ उपचुनाव ऐसे भी हुए हैं जिसमें हार-जीत का संदेश तो बहुत बड़ा था लेकिन उसके परिणाम बहुत दूरगामी साबित नहीं हुए.

2018 में गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीटों पर उपचुनाव थे. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री बनने के बाद दोनों लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे थे. समाजवादी पार्टी दोनों सीटों पर चुनाव लड़ रही थी और बहुजन समाज पार्टी ने उम्मीदवार नहीं उतारे. नतीजा यह हुआ कि बीजेपी दोनों सीटें हार गई.

उस वक्त इसे विपक्षी एकता की बड़ी सफलता बताया गया और 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बताया गया लेकिन 2019 के आम चुनाव में बीजेपी ने भारी जीत दर्ज की. हां, ये जरूर है कि यूपी में उसकी लोकसभा सीटें कम हो गईं.

मुख्यमंत्री ही हार गए विधानसभा सीट पर चुनाव

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह देश की राजनीति में बड़ा असर डालने वाले एक और उपचुनाव का जिक्र कहते हैं. वो कहते हैं, "अक्टूबर 1970 में त्रिभुवन नारायण सिंह जब संयुक्त विधायक दल की सरकार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो वो विधान सभा के सदस्य नहीं थे बल्कि राज्यसभा के सदस्य थे. उन्हें विधायक बनाने के लिए गोरखपुर की मानीराम सीट खाली कराई गई. वहां उपचुनाव हुए लेकिन टीएन सिंह हार गए. अगर वो चुनाव जीत जाते तो यूपी में उसी वक्त समाजवादी विचारधारा बहुत मजबूत हो गई होती. लेकिन उनकी हार ने इस पर पानी फेर दिया.”

यूपी के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ ने लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद मानीराम की सीट से इस्तीफा दे दिया था. त्रिभुवन नारायण सिंह ने इसी सीट से विधानसभा उपचुनाव लड़ने का फैसला किया. त्रिभुवन नारायण सिंह अपनी जीत के प्रति इतने आश्वस्त थे कि वो क्षेत्र में एक बार भी प्रचार करने तक नहीं गए. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने रामकृष्ण द्विवेदी को उनके खिलाफ उतारा था और उनका प्रचार करने खुद उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गई थीं.

मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह यह चुनाव 15 हजार से भी ज्यादा वोटों से हार गए. भारत के इतिहास में ये पहला मौका था जब कोई मुख्यमत्री इस तरह उपचुनाव में पराजित हुआ था. उपचुनाव का परिणाम तब आया जब सदन में राज्यपाल का अभिभाषण चल रहा था. टीएन सिंह ने भाषण के बीचोंबीच मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की घोषणा करके सबको चौंका दिया.

बांकीपुर और दतिया क्या संदेश दे रहे हैं

बांकीपुर और दतिया के नतीजों को भी राजनीतिक विश्लेषक कुछ इसी तरह देख रहे हैं. अरविंद कुमार सिंह के मुताबिक, "पिछले तीन दशक से शहरी मतदाता बीजेपी का हार्डकोर मतदाता रहा है. लेकिन इस उपचुनाव में वो बीजेपी से अलग हो गया यानी शहरी मतदाता ने बीजेपी को खारिज कर दिया. यही नहीं, युवा मतदाता भी बीजेपी के विरोध में दिखा. जिन वजहों से इस वर्ग की बीजेपी से दूरी हुई है, वो अभी भी बनी हुई हैं इसलिए आने वाले दिनों में भी बीजेपी के इस राजनीतिक नुकसान से इनकार नहीं किया जा सकता.”

इतिहास बताता है कि हर उपचुनाव भविष्य नहीं बदलता, लेकिन कुछ उपचुनाव ऐसे जरूर होते हैं जो आने वाले राजनीतिक बदलावों की पहली झलक दिखा देते हैं. भारतीय लोकतंत्र में कई बार सबसे बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत सबसे छोटे चुनाव से हुई है.

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