मंगल ग्रह और चांद पर अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष में सैकड़ों उपग्रह भेजने के बाद अब भारत पहला रॉकेट लॉन्च करने जा रहा है जो सरकारी संस्था ने नहीं बनाया है.अंतरिक्ष से जुड़ी अर्थव्यवस्था को 2020 में निजी क्षेत्र के लिए खोलने के बाद भारत ने इस दिशा में खूब प्रगति की है. 8.4 अरब डॉलर से ज्यादा की अर्थव्यवस्था बन चुके इस फील्ड में 400 से ज्यादा स्टार्टअप काम कर रहे हैं. कई सरकारी और निजी फर्में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ मिल कर काम कर रही हैं. इस काम के दायरे में रक्षा भी शामिल है जिससे अंतरिक्ष और सुरक्षा एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं.
हालांकि स्काईरूट एयरोस्पेस की निजी तौर पर विकसित पहले रॉकेट को लॉन्च करने की योजना भारत के अंतरिक्ष उद्योग में बड़ा कदम है. यह लॉन्च इसी साल 4 अगस्त के पहले हो सकती है. भारत के अंतरिक्ष विभाग का कहना है, "भारत अंतरिक्ष की गहराई में खोज, अंतरिक्ष विज्ञान और ऑर्बिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर काम कर रहा है. यह उपलब्धियां बढ़ते विश्वास, तकनीकी परिपक्वता और अंतरिक्ष के वैश्विक इकोसिस्टम में भारत की भूमिका के दीर्घकालीन नजरिए को दिखाती हैं." बीते सालों में भारत ने इस दिशा में कई कामयाबियां और लक्ष्य हासिल किए हैं.
मंगल, चांद, सूरज, सागर
2014 में भारत मंगल ग्रह की कक्षा में अंतरिक्षयान भेजने वाला पहला एशियाई देश बना. इसरो ने चांद पर अपने खोजी कार्यक्रम चंद्रयान से भी बहुत सुर्खियां बटोरी. इस कार्यक्रम के तहत 2008 में चांद की कक्षा में एक ऑर्बिटर भेजा गया. इसके बाद 2019 में चांद पर उतरने की नाकाम कोशिश और फिर 2023 में चांद पर रोवर उतरने में सफलता शामिल है. रोवर मिशन से भारत चांद पर मानवरहित यान उतारने वाला चौथा देश बन गया. इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन ने यह कारनामा किया था.
भारत का चौथा चंद्रयान मिशन 2017 में चांद पर उतरने की उम्मीद कर रहा है. यह चांद की सतह से चट्टान लेकर धरती पर आएगा. इसके साथ ही शुक्र ग्रह की कक्षा के लिए भी एक मिशन 2028 में भेजा जाना है. भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी 'आदित्य' नाम के एकसौर मिशन पर भी काम कर रही है. यह सूरज की बाहरी परतों और अंतरिक्ष के मौसम पर नजर रख रहा है.
पृथ्वी पर इसरो की टेक्नोलॉजी ने भारत को मत्स्य पनडुब्बी विकसित करने में मदद दी है. इसका नाम हिंदू पुराणों में विष्णु के मत्स्य अवतार से लिया गया है.
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के मुताबिक यह पनडुब्बी 2027 तक वैज्ञानिकों को समुद्र के भीतर 6 किलोमीटर की गहराई तक ले जाने में सक्षम होगी.
उपग्रह भेजने का किफायती तरीका
इसरो ने 1975 में सोवियत रॉकेट की मदद से अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा था. उसके बाद से अब तक भारत ने किफायती अंतरिक्ष मिशनों की मदद से काफी अच्छी छवि बनाई है. 22014 के बाद से इसके अंतरिक्ष कार्यक्रम में काफी तेजी आई है और यह व्यापारिक उपग्रहों के बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश में है.
इसरो ने अब तक 430 से ज्यादा विदेशी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे हैं. इससे उसे 60 करोड़ डॉलर से ज्यादा की कमाई हुई है. भारत ने अपने लिए भी 114 से ज्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं.
भारत दक्षिण पूर्व के तट पर आंध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा के लॉन्चपैड का विस्तार कर रहा है. तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में भारत ने दूसरा स्पेसपोर्ट बनाया है. भारत को उम्मीद है कि उसका अंतरिक्ष उद्योग 2033 तक बढ़ कर 44 अरब और 2040 तक 100 अरब डॉलर का होगा.
भारत अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के साथ ही यूरोपीय स्पेस एजेंसी ईएसए, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और सऊदी अरब के साथ भी मिल कर काम कर रहा है. उसके मानवसहित अंतरिक्ष मिशन को रूस सहयोग दे रहा है.
अंतरिक्ष उद्योग में निजी क्षेत्र का विस्तार
तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की महत्वाकांक्षाओं के साथ भारत में अंतरिक्ष उद्योग का निजी क्षेत्र भी तेजी से पैर पसार रहा है. प्रमुख फर्मों में एक नाम 'स्काईरूट एयरोस्पेस' का है जो निजी क्षेत्र के पहले ऑर्बिटल क्लास रॉकेट को विकसित किया है.
विक्रम-1 नाम का यह रॉकेट छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षाओं तक ले जा सकता है. इसे कुछ ही दिनों में श्रीहरिकोटा से छोड़ा जाना है.
एक और कंपनी है 'पिक्सेल' जो कृषि से लेकर पर्यावरण पर नजर रखने के एप्लिकेशंस के लिए निगरानी उपग्रह बना रही है.
इसी तरह 'बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस' सेटेलाइट प्रोपल्शन सिस्टम का विकास कर रही है और 'अग्नीकुल कॉसमॉस' छोटे सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल बना रही है जिन्हें 3डी प्रिंटेड रॉकेट इंजनों से ताकत मिलती है.
अंतरिक्ष के क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश का एक असर यह भी हुआ है कि इसरो अब अपने कर्मचारियों के स्वैच्छिक अवकाश लेने से रोक रही है. ऐसी खबरें आ रही थीं कि बहुत से वैज्ञानिक इसरो को छोड़ कर निजी कंपनियों में जा रहे हैं.
सैन्य साझेदारी
भारत का नागरिक अंतरिक्ष और सैन्य उद्योग आपस में गुंथा हुआ है जिसमें कई सरकारी और निजी कंपनियां दोनों क्षेत्रों के लिए सप्लाई दे रही हैं.
इनमें लॉन्च रॉकेट, प्रोपल्शन, सेटेलाइट, इलेक्ट्रॉनिक और गाइडेंस सिस्टम शामिल हैं. इनका इस्तेमाल अंतरिक्ष के साथ ही भारत के प्रक्षेपास्त्र और सैन्य ड्रोन के कार्यक्रमों में होता है.
इसरो ने भारत सरकार के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाजेशन (डीआरडीओ) के साथ सक्रिय सहयोग की तारीफ की है. भारत और रूस के सहयोग से चल रहे ब्रह्मोस मिसाइल कार्यक्रम में इसरो की भी सक्रिय भूमिका है. इसरो को एवियोनिक्स और गाइडेंस सिस्टम की सप्लाई देने वाली कंपनियां सैन्य साजोसामान के लिए बड़े ऑर्डर मिलने से काफी फायदे में हैं.
2025 में पाकिस्तान के साथ सैन्य टकराव के बाद भारत ने अरबरों डॉलर रक्षा खरीद में झोंके हैं. उस संघर्ष में ड्रोन और मिसाइलों का जमकर इस्तेमाल हुआ था.
अंतरिक्ष के लिए मानव मिशन
इसरो अंतरिक्ष के लिए अपना मानव मिशन भी लॉन्च करने की तैयारी में है. टेस्ट रन के लिए जो पहला मिशन बिना मानव के भेजा जाएगा वह 2026 के आखिर में जाना है.
गगनयान नाम से इसरो के मिशन में तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्री 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिन के लिए जाएंगे.
इसकी तैयारी के लिए 2025 में भारतीय वायु सेना के पायलट शुभ्रांशु शुक्ला स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक गए थे.
भारतीय प्रधानमंत्री का कहना है कि 2035 तक भारत के पास अपना अंतरिक्ष स्टेशन होगा और 2040 तक चांद पर पहला भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेजा जाएगा.













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