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Supreme Court on Abetment to Suicide: लिव-इन पार्टनर से शादी से इनकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने छह आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की रद्द

उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले किसी साथी द्वारा शादी से इनकार करना और उसके बाद दूसरे साथी द्वारा आत्महत्या कर लेना, स्वतः ही आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता. शीर्ष अदालत ने तेलंगाना से जुड़े इस मामले में मृतक महिला के साथी, उसके माता-पिता और बहन सहित सभी छह आरोपियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को पूरी तरह से रद्द कर दिया है.

Supreme Court on Abetment to Suicide: लिव-इन पार्टनर से शादी से इनकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने छह आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की रद्द

नई दिल्ली: रिश्तों के टूटने और उसके बाद होने वाली दुखद घटनाओं पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम व्यवस्था दी है. अदालत ने कहा है कि यदि किसी प्रेम संबंध या लिव-इन रिलेशनशिप के समाप्त होने के बाद कोई साथी अपनी जान दे देता है, तो केवल ब्रेकअप या विवाह से मना करने के आधार पर पूर्व साथी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने तेलंगाना के एक मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत और तेलंगाना उच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों को खारिज कर सभी छह आरोपियों को बड़ी राहत दी.

'हर व्यक्ति अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है': सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मानवीय व्यवहार और आपराधिक मंशा (Mens Rea) के बीच के अंतर को रेखांकित किया:

  • परिस्थितियों पर भिन्न प्रतिक्रिया: पीठ ने अपने आदेश में कहा, "विभिन्न परिस्थितियों में लोग अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं. यदि कोई ब्रेकअप आत्महत्या में समाप्त होता है, तो इसे हमेशा आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता."
  • जानबूझकर उकसाने का अभाव: अदालत ने कहा कि शादी से मना करने का उद्देश्य महिला को आत्महत्या की ओर धकेलना नहीं था और न ही आरोपी पर यह बात थोपी जा सकती है कि उसे पहले से ज्ञात था कि उसके इनकार से महिला अपनी जान दे देगी.
  • अभियोजन में कमी: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता के बयानों को यदि पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तो भी यह केवल विवाह से इनकार का मामला बनता है, न कि प्रत्यक्ष उकसावे (Instigation) का.

क्या था पूरा मामला?

यह विधिक विवाद वर्ष 2022 में दर्ज एक प्राथमिकी से उपजा था:

  • सहमति से लिव-इन संबंध: अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक महिला और मुख्य आरोपी बचपन के दोस्त थे और सहमति से प्रेम संबंध में थे. दोनों लगभग तीन महीने तक आरोपी के घर पर लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे.
  • पारिवारिक विवाद और रिश्ते का अंत: शुरुआत में शादी का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में कुछ बाहरी दबावों, एक परिचित द्वारा महिला के बारे में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और परिवार के विरोध के कारण विवाद खड़ा हो गया. इसके बाद युवक ने विवाह करने से मना कर दिया.
  • आत्महत्या की घटना: घर में हुए विवाद और शादी से इनकार के बाद महिला ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली. इसके बाद महिला के परिजनों ने युवक और उसके परिवार के खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 34 के तहत मामला दर्ज कराया था.

निचली अदालतों के आदेश खारिज, सभी आरोपी बरी

इस मामले में कानूनी प्रक्रिया कई चरणों से गुजरी:

  • हाईकोर्ट तक का रुख: दिसंबर 2024 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके बाद फरवरी 2026 में तेलंगाना उच्च न्यायालय ने भी उनकी पुनरीक्षण याचिका को अस्वीकार कर दिया था.
  • सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मामले में जानबूझकर उकसाने या किसी सक्रिय षड्यंत्र का कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं है.
  • कार्यवाही रद्द: अदालत ने माना कि ऐसे आधारहीन आरोपों पर मुकदमा चलाना न्यायोचित नहीं है.  खंडपीठ ने सत्र न्यायालय में लंबित कार्यवाही को पूरी तरह रद्द करते हुए निर्देश दिया कि यदि कोई आरोपी अभी हिरासत में है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए और जमानत बॉन्ड रद्द किए जाएं.

(The above story first appeared on LatestLY on Oct 09, 2026 10:48 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).