राजनीति

सात साल से ज्यादा समय से यूपी की राज्यपाल हैं आनंदीबेन पटेल, क्या कहता है संविधान?

7 साल से भी ज्यादा समय से आनंदीबेन पटेल उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं.

सात साल से ज्यादा समय से यूपी की राज्यपाल हैं आनंदीबेन पटेल, क्या कहता है संविधान?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

7 साल से भी ज्यादा समय से आनंदीबेन पटेल उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं. राज्य के लिए यह एक रिकॉर्ड है. लेकिन अब उनकी लंबी छुट्टी ने कई अटकलों को जन्म दे दिया है. राज्यपालों की नियुक्ति और पदत्याग पर क्या कहता है संविधान?बीजेपी की पूर्व नेता और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, बीते साल बरसों से उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं. लेकिन सात साल पूरे करने के कुछ ही हफ्तों बाद उनका 17 से 26 अगस्त तक गुजरात जाना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया. क्या यह महज नियमित अवकाश है या राजभवन में किसी बदलाव की तैयारी चल रही है?

हालांकि राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव सुधीर बोबड़े का कहना है कि राज्यपाल अपने गृहराज्य गुजरात गई हैं और अवकाश के लिए उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अनुमति ली है.

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उत्तर प्रदेश में आनंदीबेन पटेल का कार्यकाल राज्य के इतिहास में किसी राज्यपाल का सबसे लंबा कार्यकाल है. हालांकि मोदी सरकार के मौजूदा दौर में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत का कार्यकाल आनंदीबेन पटेल से कुछ दिन ज्यादा लंबा है. देवव्रत ने 22 जुलाई 2019 को गुजरात के राज्यपाल का पद संभाला था, जबकिआनंदीबेन पटेल ने 29 जुलाई 2019 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का पद संभाला था.

वैसे देश में किसी राज्यपाल का लगातार सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड इससे भी बड़ा है. मेघालय के पूर्व राज्यपाल एमएम जैकब करीब 12 साल तक इस पद पर रहे थे.

क्या कहता है संविधान?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 156 में राज्यपाल के कार्यकाल का प्रावधान है. इसके मुताबिक राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद पर रहते हैं और उनका सामान्य कार्यकाल पांच साल का होता है. लेकिन इसी अनुच्छेद में कहा गया है कि पांच साल की अवधि पूरी होने के बाद भी राज्यपाल तब तक पद पर बने रहेंगे, जब तक उनका उत्तराधिकारी पदभार नहीं संभाल लेता. यानी संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि पांच साल पूरे होने के बाद राज्यपाल को अलग से कार्यकाल विस्तार का आदेश देना जरूरी हो.

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संवैधानिक मामलों के जानकार वीके त्रिपाठी कहते हैं, "इसका मतलब यह हुआ कि पांच साल का कार्यकाल एक संवैधानिक अवधि है, लेकिन पद पर बने रहने की अधिकतम सीमा पांच साल तय नहीं की गई है. यही वजह है कि भारत में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहां राज्यपाल अपने निर्धारित पांच साल से अधिक समय तक पद पर रहे हैं. और इसे कहीं से भी असंवैधानिक या नियमों के प्रतिकूल नहीं कहा जा सकता.”

लेकिन सवाल यह है कि क्या संवैधानिक रूप से संभव होना राजनीतिक और संस्थागत रूप से भी उचित होने के सवाल का जवाब देता है.

पहले भी राज्यपालों का लंबा कार्यकाल रहा है

भारत में इससे पहले भी राज्यपाल पांच साल से अधिक समय तक पद पर रहे हैं. मेघालय के एमएम जैकब करीब 12 साल, पश्चिम बंगाल की पद्मजा नायडू करीब 11 साल और जम्मू-कश्मीर में एनएन वोहरा दस साल से ज्यादा समय तक राज्यपाल रहे.

संविधान के मुताबिक राज्यपाल, केंद्र और राज्यों के बीच एक संवेदनशील संवैधानिक कड़ी हैं. विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों में विधानसभा, विधेयकों और विश्वविद्यालयों से जुड़े मामलों को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच विवाद सामने आते रहे हैं.

राजभवन और सरकार के बीच मतभेद

उत्तर प्रदेश में राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों एक ही राजनीतिक दल से संबंधित रहे हैं. इसके बावजूद राजभवन और राज्य सरकार के बीच मतभेद के मौके सामने आते रहे हैं. सबसे हालिया मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहक्षेत्र गोरखपुर का है. पिछले दिनों राज्यपाल आनंदीबेन पटेल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहनगर गोरखपुर में थीं और वहां दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन की व्यवस्थाओं पर तीखी नाराजगी जताई और हॉस्टल, भोजन, मेस और कैंटीन की व्यवस्था में कमियों को लेकर अधिकारियों को सुधार के निर्देश दिए.

गोरखपुर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, इसलिए राज्यपाल की यह सार्वजनिक नाराजगी राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बनी. यही नहीं, पिछले साल योगी सरकार के कई मंत्रियों से राज्यपाल की अलग अलग बैठकें भी चर्चा में थीं, वो भी उस वक्त जब कई मंत्रियों की नाराजगी सामने आई थी.

यूपी के राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा रहती है कि चूंकि आनंदीबेन पटेल न सिर्फ गुजरात से आती हैं बल्कि वे केंद्रीय नेतृत्व की बहुत करीबी भी हैं, इसलिए उन्हें राज्य सरकार की निगरानी के लिए यहां भेजा गया है और कार्यकाल पूरा होने के बावजूद हटाया नहीं जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं कि अभी भी उन्हें हटाए जाने की संभावना बहुत कम ही है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में अमिता वर्मा कहती हैं, "देखिए, मुख्यमंत्री के साथ उनका टकराव तो है ही. कई बार ऐसे मौके आ चुके हैं. अब मुख्यमंत्री के क्षेत्र में जाकर जिस तरह से उन्होंने सरकार की आलोचना की तो इसे क्या कहा जा सकता है. यह बात तो वो योगी को बुलाकर भी कह सकती थीं. अनौपचारिक रूप से कह सकती थीं लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐसा कहा. विश्वविद्यालयों में कुलपतियों और अन्य पदों पर नियुक्तियों को लेकर भी टकराव सामने आए हैं.”

हालांकि कई मौकों पर आनंदीबेन पटेल ने योगी सरकार के कामकाज और नीतियों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा भी की है.

आनंदीबेन पटेल का सात साल से ज्यादा समय तक उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बने रहना संविधान के खिलाफ नहीं है. संविधान खुद यह रास्ता देता है कि पांच साल की अवधि पूरी होने के बाद भी राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी के पद संभालने तक पद पर बना रह सकता है. लेकिन नए राज्यपाल की नियुक्ति नहीं होने से यह सवाल जरूर उठता है कि इस संवैधानिक व्यवस्था के तहत किसी राज्यपाल का इतने लंबे समय तक पद पर बने रहना राजनीतिक शुचिता के लिहाज से किस सीमा तक उचित माना जाना चाहिए.

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 20, 2026 06:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).