रूसी तेल पर अमेरिका ने दी फिर छूट

ईरान-इस्राएल-अमेरिका युद्ध के बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर अस्थायी छूट बढ़ा दी है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ईरान-इस्राएल-अमेरिका युद्ध के बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर अस्थायी छूट बढ़ा दी है. इस फैसले से तेल बाजार को राहत तो मिली, लेकिन विपक्षी नेताओं ने इस फैसले की आलोचना की है.वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहराते संकट, यूक्रेन में जारी युद्ध और ईरान से टकराव के बीच अमेरिका ने रूस के तेल पर लगी पाबंदियों में एक बार फिर अस्थायी ढील देने का फैसला किया है. डॉनल्ड ट्रंप सरकार का यह कदम केवल ऊर्जा बाजार को स्थिर करने की कोशिश भर नहीं, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और आर्थिक दबावों के बीच संतुलन साधने की एक जटिल कवायद के रूप में देखा जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि यूरोप के पास "शायद छह हफ्ते भर का जेट ईंधन बचा है".

जहां एक ओर पश्चिमी देश, खासकर यूरोप, रूस को उसकी यूक्रेन नीति के लिए आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की रणनीति पर कायम हैं, वहीं दूसरी ओर बढ़ती तेल कीमतें और आपूर्ति में बाधाएं उन प्रतिबंधों की मुश्किलें भी बयान कर रही हैं.

ऊर्जा बाजार को साधने की कोशिश

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार को घोषणा की कि देशों को समुद्र में पहले से लदे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने की अनुमति 16 मई तक बढ़ाई जा रही है. 11 अप्रैल को अमेरिका की रूस के तेल की खरीद पर दी गए एक छूट खत्म ही हुई थी कि अब फिर से एक और छूट ने अमेरिकी सांसदों को ट्रंप सरकार की आलोचना का एक और मौका दे दिया. इस बार की छूट में ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया से जुड़े लेन-देन शामिल नहीं हैं.

वित्त मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "जैसे-जैसे ईरान के साथ बातचीत तेज हो रही है, मंत्रालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जिन देशों को तेल की जरूरत है, उन्हें उसकी सप्लाई मिलती रहे.”

यह फैसला एशियाई देशों के दबाव के बाद लिया गया, जो ऊर्जा कीमतों में उछाल से जूझ रहे हैं. जी20 और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की बैठकों के दौरान कई देशों ने अमेरिका से इस छूट को बढ़ाने की मांग की थी. भारत जैसे बड़े खरीदार के साथ भी इस मुद्दे पर बातचीत हुई, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क करना शामिल है.

ट्रंप पर मध्यावधि चुनावों का दबाव

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने दो दिन पहले ही संकेत दिया था कि रूस और ईरान के तेल पर दी गई छूट को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. ऐसे में यह नया फैसला नीति में अचानक बदलाव को दर्शाता है.

ऊर्जा कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले डॉनल्ड ट्रंप और उनकी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गई है. इस कदम को घरेलू राजनीतिक दबाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

इस फैसले की आलोचना भी हो रही है. अमेरिका के दोनों मुख्य दलों के सांसदों ने कहा है कि इस तरह की छूट रूस और ईरान की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती है. यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने भी संकेत दिया कि रूस पर प्रतिबंधों को ढीला करने का यह सही समय नहीं है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि इस युद्ध के कारण इतिहास में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में सबसे भीषण रुकावट पैदा हो चुकी है.

रूस ने मनाई छूट मिलने की खुशी

रूस ने इस कदम का स्वागत किया है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विशेष दूत किरिल दिमित्रिएव ने कहा, "कई देश, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, वैश्विक बाजार की स्थिरता के लिए रूसी तेल और गैस के महत्व को समझते हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि यह निर्णय यूरोप और ब्रिटेन में "युद्ध समर्थकों के बीच उन्माद” पैदा करेगा. उनके अनुसार, इस छूट से करीब 100 मिलियन बैरल रूसी तेल प्रभावित होगा, जिससे कुल मात्रा 200 मिलियन बैरल तक पहुंच सकती है.

इस बीच, ईरान युद्ध ने भी ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है. होर्मुज जलडमरूमध्य को जब चंद घंटों के लिए अस्थायी रूप से फिर से खोला गया था तो शुक्रवार को वैश्विक तेल की कीमतें 9 फीसदी गिरकर लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल हो गईं थीं.

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