नई दिल्ली, 28 मई: दिल्ली की एक विशेष अदालत (Delhi Court) ने चार साल की मासूम बच्ची के अपहरण और दुष्कर्म (Abduction and Rape) के दोषी 22 वर्षीय युवक को फांसी की सजा देने से साफ इनकार कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह अपराध 'दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों' की कानूनी श्रेणी के अंतर्गत नहीं आता है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित सहरावत ने मृत्युदंड की मांग को खारिज करते हुए दोषी सनी कुमार को पोक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कठोर आजीवन कारावास (Rigorous Life Imprisonment) की सजा सुनाई है. इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता के इलाज और पुनर्वास के लिए कुल 13.5 लाख रुपये का वित्तीय मुआवजा जारी करने का भी निर्देश दिया है. यह भी पढ़ें: Gujarat Horror: गुजरात के बनासकांठा में पति की शर्मनाक हरकत, ₹50,000 में किया पत्नी का सौदा; बेचने के बाद महिला से गैंगरेप
न्यायालय ने सजा तय करते समय राहतकारी कारकों पर दिया ध्यान
अदालत ने सजा की मात्रा (Quantum of Punishment) पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया. अभियोजन पक्ष ने मासूम बच्ची के साथ की गई इस बर्बरता को "राक्षसी कृत्य" करार देते हुए दोषी के लिए मृत्युदंड की आक्रामक पैरवी की थी.
इसके विपरीत, अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दोषी की कम उम्र, उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड न होना और अदालत के समक्ष अपनी गलती स्वीकार करना कुछ ऐसे राहतकारी कारक (Mitigating Factors) हैं, जिनके कारण उसे फांसी नहीं दी जा सकती. न्यायाधीश ने आदेश में लिखा, "यह अदालत इस राय की नहीं है कि वर्तमान मामला दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में आता है. दोषी की कम उम्र और साफ सुथरे अतीत को देखते हुए, वर्तमान मामले में मृत्युदंड न्यायसंगत नहीं है." अदालती कार्यवाही के दौरान दोषी ने अपने कृत्य पर गहरा पछतावा व्यक्त किया और इसके लिए शराब के नशे को जिम्मेदार ठहराया.
पीड़िता की गंभीर स्थिति और परिवार की आर्थिक बदहाली पर कोर्ट की टिप्पणी
इस मामले में दोषी ठहराए जाने की शुरुआती प्रक्रिया 30 अप्रैल को पूरी हुई थी, जिसमें यह साबित हुआ था कि हमले के कारण बच्ची को गंभीर आंतरिक चोटें आई थीं. गवाहों और चिकित्सा रिपोर्टों के अनुसार, बच्ची की जान बचाने के लिए उसकी कई जटिल सर्जिकल प्रक्रियाएं करनी पड़ीं.
पीड़िता की मां ने अदालत को बताया कि इस चिकित्सा संकट ने परिवार को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है. बच्ची की चौबीसों घंटे देखभाल करने के लिए माता-पिता दोनों को अपनी नौकरियां छोड़नी पड़ीं. बच्ची वर्तमान में पूरी तरह से लिक्विड डाइट पर है और वह स्वतंत्र रूप से बैठने या खड़े होने में असमर्थ है. न्यायाधीश ने परिवार के इस दर्द को महसूस करते हुए कहा, "पीड़िता की पीड़ा की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इतनी कम उम्र में कई सर्जरी से गुजरना और बिस्तर पर पड़े रहना बेहद दर्दनाक है."
उम्रकैद में किसी भी तरह की ढील या पैरोल से इनकार
अदालत ने भले ही दोषी सनी कुमार को फांसी की सजा न दी हो, लेकिन जज अमित सहरावत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दोषी का यह कृत्य बेहद जघन्य (Diabolical) था और वह समाज के लिए एक स्थायी खतरा है. इसलिए वह किसी भी प्रकार की सजा में छूट या समय से पहले पैरोल का हकदार नहीं है.
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, "भले ही दोषी को मृत्युदंड नहीं दिया जा रहा है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसके कुकृत्य राक्षसी प्रवृत्ति के हैं. वह किसी भी प्रकार की नरमी का हकदार नहीं है और उसे जब तक संभव हो समाज से बाहर रखा जाना आवश्यक है. यदि कोई व्यक्ति इतनी छोटी बच्ची के साथ ऐसा कर सकता है, तो वह पूरे समाज के लिए गंभीर खतरा है, इसलिए उसे जीवन भर सलाखों के पीछे ही रहना होगा."
पुनर्वास के लिए ₹13.5 लाख का मुआवजा स्वीकृत
पीड़िता के दीर्घकालिक इलाज, चिकित्सा आवश्यकताओं और कल्याण को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने कुल 13.5 लाख रुपये का मुआवजा पैकेज अंतिम रूप से स्वीकृत किया है.
चूंकि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही ₹5 लाख की अंतरिम राहत राशि परिवार को पहले ही जारी की जा चुकी थी, इसलिए अदालत ने दिल्ली राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (DSLSA) को निर्देश दिया है कि वह शेष ₹8.5 लाख की राशि का वितरण जल्द से जल्द सुनिश्चित करे ताकि बच्ची के चल रहे इलाज में कोई बाधा न आए.













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