गिरफ्तार युवाओं को जमानत नहीं मिलने पर जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी- 'गंगा किनारे चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं'
न्यायमूर्ति भुयान ने रेखांकित किया कि सामान्य और गैर-अपराधिक गतिविधियों के लिए भी लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है तथा अदालतें भी राहत देने में देरी कर रही हैं या कड़ी शर्तों के साथ जमानत दे रही हैं.
Eating Chicken Biryani on Ganga No Crime: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने देश में असहमति व्यक्त करने और भिन्न विचार रखने के घटते सार्वजनिक स्थान पर गहरी चिंता जताई है. भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित 'जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर' को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा रहा है.
न्यायमूर्ति भुयान ने रेखांकित किया कि सामान्य और गैर-अपराधिक गतिविधियों के लिए भी लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है तथा अदालतें भी राहत देने में देरी कर रही हैं या कड़ी शर्तों के साथ जमानत दे रही हैं. यह भी पढ़े: Rs 370 Biryani Row: बिरयानी विवाद पर भड़के सीएम फडणवीस, कहा- 'कॉमेडियंस को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए'; VIDEO
"गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं"
न्यायमूर्ति भुयान ने अपने संबोधन के दौरान गंगा नदी में नाव पर इफ्तारी आयोजित करने और चिकन बिरयानी खाने के मामले में युवाओं की गिरफ्तारी का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि गंगा नदी के ऊपर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून मौजूद नहीं है.
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, "मुझे पूरा यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है. लेकिन इसके बावजूद उन युवाओं को गिरफ्तार किया गया और तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा. क्या ऐसी गतिविधि के लिए लोगों को गिरफ्तार किया जा सकता है और तीन महीने तक जमानत देने से इनकार किया जा सकता है? जनता यह सब देख रही है."
जमानत की सख्त शर्तों पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने अदालतों द्वारा जमानत मंजूर करते समय लगाई जाने वाली प्रतिबंधात्मक शर्तों पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि कई बार अदालतें राहत तो देती हैं, लेकिन उसमें काफी देरी हो चुकी होती है.
उन्होंने कहा कि जमानत देते समय सार्वजनिक सभाओं में शामिल न होने, सोशल मीडिया पर न लिखने या देश न छोड़ने जैसी शर्तें थोप दी जाती हैं. न्यायमूर्ति भुयान के अनुसार, ये शर्तें नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं और एक तरह से लोगों को असहमति जताने से हतोत्साहित करती हैं.
परिसरों में छात्रों के दमन और प्रदर्शनों पर विचार
छात्रों के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों में अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाने वाले छात्रों को 30 से 40 दिनों तक जेल में रखा जाता है और उन्हें निलंबित कर दिया जाता है. इसके बाद उन्हें कानूनी राहत के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं.
उन्होंने गाजा के समर्थन में मुंबई में प्रदर्शन की अनुमति न मिलने और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर आवाज उठाने वालों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किए जाने का भी उदाहरण दिया.
विश्वविद्यालयों में आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने की अपील
न्यायमूर्ति भुयान ने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालयों को आलोचनात्मक सोच और शोध का केंद्र होना चाहिए, न कि वहां असहज करने वाले सवाल पूछने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए.
उन्होंने शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) का हवाला देते हुए कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का स्वतंत्र रूप से कार्य करना लोकतंत्र के संतुलन के लिए बेहद जरूरी है.