सोशल मीडिया बैन करने के आइडिया से भारतीय टीनएजर्स नाखुश
भारत भी उन देशों में शामिल हो गया है, जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने का सोच रहे हैं.
भारत भी उन देशों में शामिल हो गया है, जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने का सोच रहे हैं. लेकिन भारतीय टीनएजर्स इससे बिल्कुल खुश नहीं हैं और अभी से ऐसे नियमों से बचने के रास्ते तलाश रहे हैं.दिल्ली के रहने वाले 15 साल के आरव गुप्ता इंस्टाग्राम स्क्रॉल कर रहे थे, तभी उन्हें एक न्यूज अलर्ट दिखा कि भारत सरकार उम्र के आधार पर सोशल मीडिया एक्सेस देने का विचार कर रही है. बाद में डीडब्ल्यू से बातचीत में आरव ने कहा, "ये कैसे हो सकता है? मेरे सब दोस्त तो सोशल मीडिया पर ही सब कुछ प्लान करते हैं, चाहे बर्थडे पार्टी हो या फुटबॉल खेलने जाना या फिर पढ़ाई करना. ये तो बिल्कुल भी प्रैक्टिकल नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, "वैसे भी हर लॉग-इन के लिए कोई लीगल आईडी अनिवार्य किए बिना इसे लागू करना मुश्किल ही होगा. और अगर ऐसा हो भी गया, तो हम वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) या फेक बर्थडे डालकर इस बैन को आसानी से बायपास कर ही सकते हैं.”
भोपाल की रहने वाली 14 साल की प्रिया खुल्लर सोशल मीडिया के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर पाती. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मुझे ज्यादातर जानकारी यहीं से मिलती है. फैशन और म्यूजिक के ट्रेंड्स भी यहीं से पता चलते हैं. 16 साल से कम उम्र वालों के लिए इंस्टाग्राम और यूट्यूब शॉर्ट्स बैन करने का कानून सोचना भी मुश्किल है.”
प्रिया के पिता को भी समझ नहीं आ रहा कि सही तरीका क्या है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "आप पूरी तरह से ये बैन कैसे लागू करेंगे? मुझे समझ नहीं आता कि कौन सा खतरा ज्यादा बड़ा है, बच्चों को ऑनलाइन रहने देना या उन्हें डिजिटल दुनिया से पूरी तरह काट देना.”
दुनिया भर में चल रहे ट्रेंड ने भारत में भी छेड़ी बहस
दिसंबर 2025 में ऑस्ट्रेलिया वो पहला देश बना, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन कर दिए. जिसके बाद सरकार ने बयान दिया कि इस बैन का मकसद बच्चों और किशोरों को हानिकारक कंटेंट और दूसरे ऑनलाइन खतरों से बचाना है.
ऑस्ट्रेलिया के ऑनलाइन सेफ्टी अमेंडमेंट (सोशल मीडिया मिनिमम ऐज) कानून के मुताबिक, जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र की सीमा है, उन्हें सुनिश्चित करना होगा कि 16 साल से कम उम्र के बच्चे अकाउंट न बना सके.
फ्रांस की नेशनल असेंबली ने भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसे बैन का समर्थन किया है. दूसरी तरफ ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, डेनमार्क और ग्रीस भी इस मुद्दे पर स्टडी कर रहे हैं.
ऑस्ट्रेलिया के फैसले और भारत के हालिया इकोनॉमिक सर्वे से प्रेरित होकर भारत के कुछ राज्य अब 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन लगाने पर विचार कर रहे हैं.
सर्वे में कहा गया है, "उम्र के आधार पर सोशल मीडिया तक पहुंच को सीमित करने की नीति पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि कम उम्र के यूजर्स को सोशल मीडिया की लत लगने और हानिकारक कंटेंट देखने का ज्यादा खतरा होता है.” इस मामले में फिलहाल, आंध्र प्रदेश और गोवा सबसे आगे हैं. वहां मंत्रियों की कमेटी विचार कर रही है कि इस तरह का बैन कैसे लागू किया जा सकता है.
लत लगने की समस्या और मेंटल हेल्थ खराब होने की चिंता
हालांकि, इकोनॉमिक सर्वे की यह सिफारिश कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह एक मजबूत सुझाव माना जा रहा है. रिपोर्ट में सोशल मीडिया की लत लगने के खतरे पर जोर दिया गया है. इसमें कहा गया है कि सोशल मीडिया तक पहुंच अब मुश्किल नहीं है.
साथ ही, डिजिटल लत लगने से मानसिक स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंच सकता है. सर्वे ने ऐसे अध्ययनों का भी हवाला दिया है, जिनमें कहा गया है कि सोशल मीडिया की लत 15 से 24 साल के युवाओं में चिंता, डिप्रेशन, कम आत्मविश्वास और साइबर बुलिंग से जुड़ी परेशानियों की अहम वजह है.
हाल ही में यह बहस और तेज हो गई, जब उत्तर भारत के गाजियाबाद शहर में तीन बच्चों की कथित तौर पर आत्महत्या से मौत हो गई. जांचकर्ता यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि कहीं किसी ऑनलाइन कोरियन ड्रामा का तो इसमें कोई रोल नहीं था.
आंध्र प्रदेश में सत्ता में मौजूद तेलुगु देशम पार्टी के सांसद, लावु श्री कृष्ण देवरायलु ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "सोशल मीडिया कंपनियों को नाबालिगों को उनके प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने से रोकना होगा. अगर वह ऐसा नहीं करती हैं, तो उन्हें सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा.”
उन्होंने आगे कहा, "ऑस्ट्रेलिया में फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म को कानूनन 16 साल से कम उम्र वालों के अकाउंट बंद करने के लिए कदम उठाने होंगे. हम भारत में भी ऐसा कर सकते हैं.”
बैन लागू करना होगा सबसे बड़ी चुनौती
चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार है. यहां करीब 66 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स और 95 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं.
देश में लगभग 1.16 अरब से भी ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं. इस कारण इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म के लिए भारत एक बहुत बड़ा मार्केट है. हालांकि, टिकटॉक भारत में साल 2020 से ही बैन है.
भारत की करीब एक-चौथाई आबादी 0-14 साल की उम्र के बीच है. इसका मतलब हुआ कि आज के समय में करोड़ों बच्चे ऐसे हैं, जो उम्र के लिहाज से कम उम्र वाले सोशल मीडिया यूजर हो सकते हैं.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत के आकार और विविधता के लिहाज से यहां ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून लागू करना पाना बेहद मुश्किल है.
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अपार गुप्ता कहते हैं, "इस तरीके से बैन सिर्फ कागजी तौर पर ही लागू किया जा सकता है, कि प्लेटफॉर्म से कहा जाए वह 16 साल से कम उम्र वालों के अकाउंट ब्लॉक करें. लेकिन भारत में यह जमीनी तौर पर काम नहीं करेगा और लोगों की प्राइवेसी के लिए भी रिस्की हो सकता है.”
गुप्ता का कहना है कि असल जरूरत है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लत लगाने वाले डिजाइन को रेगुलेट किया जाए, बच्चों की प्रोफाइलिंग रोकी जाए, रिसर्च को फंड किया जाए और एक स्वतंत्र रेगुलेटर को मजबूती दी जाए.
उन्होंने कहा, "अगर उम्र खुद बतानी होगी, तो बच्चे आसानी से झूठ बोल सकते हैं. अगर आईडी से वेरिफिकेशन होता है, तो प्राइवेसी और निगरानी खतरा सामने आ खड़ा होता है.” साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों या नेटवर्क के जरिए इसे लागू करना काफी "सख्त” और अनावश्यक असर कर सकता है.
भारत में करीब 43 फीसदी लोग वीपीएन का इस्तेमाल करते हैं, जो कि सबसे अधिक इस्तेमाल के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर आता है. इस कारण बैन लागू करना और अधिक मुश्किल हो जाता है.
गुप्ता कहते हैं, "प्लेटफॉर्म्स भले ही बैन लागू करें, लेकिन टीनएजर्स वीपीएन का इस्तेमाल करके या अपने से बड़ों के अकाउंट से या फिर नए कम मॉडरेशन वाले ऐप्स से इसे बायपास कर सकते हैं. इससे नुकसान कम नहीं होगा, बल्कि बस जगह बदल लेगा.”
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बैन उल्टा नुकसान कैसे पहुंचा सकता है?
टेक ग्लोबल इंस्टीट्यूट के प्रतीक वाघरे का कहना है कि राज्य सरकारों के पास शायद ऐसा बैन लगाने का अधिकार भी नहीं होगा, क्योंकि यह मामला केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे कानून लागू करने के लिए हर यूजर की पहचान करनी पड़ेगी, जिससे कमजोर समुदायों के लिए जोखिम बढ़ सकता है. उन्होंने कहा, "सामाजिक समस्याओं का समाधान बड़े और व्यापक तरीकों से होना चाहिए, सिर्फ प्लेटफॉर्म पर पाबंदी लगाकर नहीं.”
चाहे भारत सोशल मीडिया बैन लगाए या इसे लागू करने के लिए कोई भी तरीका अपनाएं, डीडब्ल्यू से बात करने वाले टीनएजर्स का कहना है कि उन्हें इससे खास फर्क नहीं पड़ता.
भोपाल की रहने वाली 14-वर्षीय प्रिया खुल्लर ने कहा, "अगर बैन लग भी गया, तो उससे बच निकलने के तरीके हमेशा होते हैं.”
(The above story first appeared on LatestLY on Feb 13, 2026 07:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

