राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही बोले, महात्मा गांधी के नाम पर ढकोसला कर रहीं पार्टियां
तीस अक्टूबर 1948 को गांधी (मोहन दास करमचंद गांधी) की हत्या की गई थी, और उसके बाद से लगातार उनके विचारों की अवहेलना करने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन गांधी और व्यापक, विश्वव्यापी होते गए हैं. आज गांधी की विरासत पर कब्जा करने की जैसे होड़-सी मची हुई है
नई दिल्ली: तीस अक्टूबर 1948 को गांधी (मोहन दास करमचंद गांधी) (Mohandas Karamchand Gandhi) की हत्या की गई थी, और उसके बाद से लगातार उनके विचारों की अवहेलना करने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन गांधी और व्यापक, विश्वव्यापी होते गए हैं. आज गांधी की विरासत पर कब्जा करने की जैसे होड़-सी मची हुई है. गांधी को वे लोग भी अपना बता रहे हैं, जिन्होंने कभी गांधी को अपना नहीं माना, और वे लोग भी जो गांधी की विरासत से निकले थे, लेकिन उस विरासत को ही भूल गए, रास्ते से भटक गए थे. आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि खुद को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कहने वाली भाजपा और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को आज गांधी-गांधी रटने की जरूरत पड़ गई है? वयोवृद्ध गांधीवादी, राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही ने इस मुद्दे पर आईएएनएस के साथ खास बातचीत में कहा, "दरअसल, राजनीतिक दलों के पास अपना कोई नैतिक और वैचारिक आधार नहीं है। जिनके पास कोई अपना आधार नहीं होता वे ऐसा कोई मजबूत आधार ढूढ़ते हैं, जो उन्हें मजबूती दे सके.
गांधी से अधिक मजबूत दूसरा आधार देश क्या, पूरी दुनिया में कोई नहीं है. बापू की पूरी दुनिया में स्वीकार्यता है. इसलिए गांधी का नाम वे लोग भी ले रहे हैं, जो हर रोज गांधी विचार की अवहेलना करते रहे हैं. राजनीतिक दल जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। इनका गांधी से कोई लेना-देना नहीं है।"आखिर विरासत अपनाने की यह होड़ कितनी जायज है? क्या इससे वे कुछ प्रेरणा ले पाएंगे? गांधी विचार, गांधी मार्ग को अपना पाएंगे?गांधी की हत्या के बाद गांधी की विरासत संभालने, गांधी विचार को आगे बढ़ाने के लिए जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद सहित तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं द्वारा स्थापित संस्था गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष राही ने कहा, "ये सब गांधी के नाम पर ढकोसला कर रहे हैं। गांधी के विचार को अपनाना ही होता तो इन्हें ये सब करने की जरूरत ही क्यों पड़ती. सच को सच कहने की जरूरत नहीं पड़ती है. यह भी पढ़े: उत्तर प्रदेश विधानसभा महात्मा गांधी की 150वीं जयंती वर्ष पर निरंतर 48 घण्टे का विशेष सत्र करेगा आहूत
आज जब हर तरफ से रास्ते बंद हो रहे हैं, तो गांधी का नाम लिया जा रहा है. चाहे भाजपा हो या कांग्रेस। भाजपा की विरासत तो गांधी और गांधी के विचार की विरोधी रही है, लेकिन कांग्रेस तो गांधी की विरासत से आगे बढ़ी थी, लेकिन उसने भी गांधी के रास्ते को छोड़ दिया, वह भटक गई। आज उसे जब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा तो गांधी याद आ रहे हैं। लेकिन इससे कोई बुनियादी बदलाव नहीं आने वाला है। गांधी का नाम लेने भर से कोई गांधीवादी नहीं बन सकता है। गांधी पर सबका अधिकार है, गांधी सभी के हैं, लेकिन जो गांधी के मार्ग पर चलेगा वही गांधी का होगा."उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने गांधी की 150वीं जयंती को जोर-शोर से मनाने की तैयारी कर रखी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को पूरी तरह बंद कर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने का आह्वान देशवासियों से किया है. वहीं दूसरी तरह कांग्रेस ने भी पूरे देश में गांधी जयंती एक अलग अंदाज में मनाने का कार्यक्रम तय कर रखा है; गांव, ब्लॉक, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पदयात्रा का कार्यक्रम बनाया गया है, जिसमें पार्टी के छोटे से लेकर बड़े सभी नेता शामिल होंगे।ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या गांधी राजनीतिक दलों के लिए मजबूूरी का नाम बन गए है? युवावस्था में ही पूरा जीवन गांधी के नाम समर्पित कर चुके रामचंद्र राही (80) ने कहा, "हां, एक पहलू यह हो सकता है। लेकिन इसमें एक बात और है। वह यह कि गांधी मजबूती प्रदान करते हैं। गांधी का रास्ता किसी भी कमजोर को मजबूती प्रदान करता है। जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब गांधी रास्ता दिखाते हैं; सहारा बनते हैं। हारा हुआ हर व्यक्ति गांधी के रास्ते पर चलने का स्वांग रचता है। यह अलग बात है कि थोड़ी मजबूती मिलने के बाद वह फिर रास्ते से भटक जाता है.
"भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली मौजूदा केंद्र सरकार ने अपने पहले ही कार्यकाल में गांधी की प्रेरणा से देश में स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी, जो अभी भी चल रहा क्या यह गांधी मार्ग पर चलना नहीं है? राही ने कहा, "झाड़ू लगाना और उसका फोटो खिंचा कर अखबारों में छपवा लेना गांधीवाद नहीं है। इससे स्वच्छता भी नहीं आने वाली है। गांधी की स्वच्छता भीतर से शुरू होती है, मन से। पहले मन साफ करना होगा. लेकिन मन तो साफ नहीं है। वरना आज देश में जिस तरह का वातावरण है, वह नहीं होता। पूरे देश में भय का वातावरण है। हिंसा की राजनीति हो रही है.गांधी ने ऐसे भारत की कल्पना नहीं की थी. गांधी हिंसामुक्त, भयमुक्त भारत चाहते थे."
राही ने आगे कहा, "बापू ने अपने अंतिम वसीयत में हिंसामुक्त भारत की बात कही है। जिस अहिंसक तरीके से उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त किया, उसी अहिंसक तरीके से वह देश के भीतर मौजूद हर समस्या को परास्त करना चाहते थे। वह सैन्य शक्ति, दंड की राजनीति के खिलाफ थे, वह सैन्य शक्ति पर लोक शक्ति का अधिकार कायम करना चाहते थे. लेकिन आज की राजनीति हिंसा प्रधान है, पुलिस और सैन्य बल राजनीति का आधार हैं। गांधी ऐसा नहीं चाहते थे. वह व्यक्ति पर प्रौद्योगिकी के वर्चस्व के भी खिलाफ थे। वह चाहते थे कि व्यक्ति की जरूरतें स्थानीय संसाधनों से पूरी हों। किसी को रोजगार के लिए दूर की यात्रा न करनी पड़े। उन्होंने अपने सपनों का भारत बनाने के लिए नेहरू और पटेल के बीच तालमेल बनाया.
देश की आजादी के बाद उनकी चिंता सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आजादी को लेकर थी.उन्होंने कहा था कि 'हमें राजनीतिक आजादी तो मिल गई है, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आजादी पाना अभी बाकी है'। वह इस दिशा में काम कर रहे थे, आगे बढ़ रहे थे, लेकिन जिन्हें उनका यह काम पसंद नहीं था, उनका रास्ता पसंद नहीं था, उन्होंने गांधी को रास्ते से हटा दिया.लेकिन गांधी फिर भी हटे नहीं, अपने रास्ते पर आज भी कायम हैं। पूरी दुनिया में कहीं भी अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठती है, गांधी वहां मौजूद रहते हैं."
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 16, 2019 10:15 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

