Election Commission On Dissent: 'अलग-अलग विचार संस्थागत विमर्श का सामान्य हिस्सा'; दो चुनाव आयुक्तों के मतभेद की रिपोर्ट पर ECI का पहला आधिकारिक बयान
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया और आंतरिक कामकाज पर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की मीडिया रिपोर्ट पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को अपना पहला आधिकारिक बयान जारी किया है. आयोग ने आंतरिक फूट या खींचतान की बात को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में अंतिम निर्णय तक पहुंचने से पहले भिन्न-भिन्न विचार और टिप्पणियां आना एक सामान्य और स्वस्थ विचार-विमर्श का हिस्सा है.
नई दिल्ली: निर्वाचन आयोग के भीतर बड़े नीतिगत फैसलों पर आंतरिक असहमति की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद मचे सियासी घमासान के बीच भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने बुधवार दोपहर आधिकारिक रुख स्पष्ट किया है. NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने मीडिया रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आंतरिक फाइलों पर आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई टिप्पणियां किसी कलह का प्रमाण नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग हैं.
आयोग ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच प्रशासनिक स्तर पर हुए आदान-प्रदान को अलग-थलग करके देखना पूरी तस्वीर को उजागर नहीं करता. यह भी पढ़ें: SIR Political Row: चुनाव आयोग में असहमति के दावों से गरमाई राजनीति, विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की
"अलग-अलग विचार विमर्श का हिस्सा, फैसले सर्वसम्मत": आयोग का बयान
The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के उप निदेशक पी. पवन द्वारा जारी बयान में कहा गया:
-
विमर्श की स्वाभाविक प्रक्रिया: "किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान भिन्न दृष्टिकोण और टिप्पणियां आना एक सामान्य बात है. अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले यह निर्णय लेने की प्रक्रिया का ही हिस्सा होते हैं. केवल तीन आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी चुनावी प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह अधिकृत है. ड्राफ्टिंग स्तर पर सदस्यों द्वारा उठाए गए परिचालन संबंधी सवाल मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए मानक प्रशासनिक प्रक्रिया हैं.'
-
तस्वीर का केवल एक पहलू: ईसीआई ने कहा कि पिछले 10 महीनों में दर्ज विशिष्ट आंतरिक नोट्स को अलग से रेखांकित करना और इस दौरान लिए गए सैकड़ों स्वीकृतियों, निर्देशों और लगभग 40 नई पहलों की अनदेखी करना पूरी स्थिति का केवल एक पहलू पेश करता है.
-
आयोग ने दोहराया कि देश भर में मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) सहित सभी सुधारवादी कदम पिछले एक वर्ष में तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति (Unanimous decisions) से ही लागू किए गए हैं.
क्या था 'द इंडियन एक्सप्रेस' की खोजी रिपोर्ट में?
The Indian Express की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के विभिन्न फैसलों पर लिखित असहमति जताई थी:
-
फॉर्म 6 में संशोधन: नए मतदाताओं के पंजीकरण फॉर्म में पिछली एसआईआर से जुड़ा घोषणापत्र जोड़ने पर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी और नियमों में संशोधन के बिना इसे अनुचित कहा था.
-
डेटा का केंद्रीकरण और सॉफ्टवेयर पहुंच: राज्यों के मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को ईसीआई के केंद्रीय सॉफ्टवेयर (ERONet/ECINet) तक सीमित पहुंच दिए जाने और मतदाता सूची से नाम हटाने/जोड़ने के अधिकारों पर सवाल उठाए गए थे.
-
अपील दायर करने की प्रक्रिया: पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल स्तर पर मतदाताओं के नाम बहाल करने के न्यायिक आदेशों के खिलाफ बिना आयुक्तों की संज्ञान के अपील दायर करने पर भी ऐतराज जताया गया था.
विपक्ष ने साधा निशाना: राहुल गांधी ने 'वोट चोरी' का लगाया आरोप
आयोग के बयान के बावजूद विपक्षी दलों का हमला जारी रहा:
-
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हुए आरोप लगाया कि 'वोट चोरी' देश की जनता के साथ धोखा और संविधान पर हमला है. उन्होंने दावा किया कि भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग की मिलीभगत से यह सब हो रहा है.
-
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने आयोग के रुख को लीपापोती करार देते हुए मांग की कि रिपोर्ट में उठाए गए 14 बिंदुओं पर बिंदुवार (Point-by-point) स्पष्टीकरण जारी किया जाए.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने की आयुक्तों की सराहना
PTI के हवाले से आई रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा फाइलों पर लिखित असहमति दर्ज कराने की सराहना की:
-
कुरैशी ने कहा कि वह शुरुआत से ही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रियाओं के आलोचक रहे हैं और इस बात को लेकर चिंतित थे कि दोनों आयुक्त चुप्पी क्यों साधे हुए हैं.
-
उन्होंने कहा, "वे भी समान मताधिकार वाले सदस्य हैं। अब जब यह आंतरिक सच्चाई सामने आई है कि दोनों आयुक्त बहुत शांति से और फाइलों पर नोट लिखकर आपत्ति दर्ज करा रहे थे, तो मेरी नजर में उनका सम्मान और बढ़ गया है."
निर्वाचन आयोग की इस सफाई के बाद भी मतदाता सूची के डिजिटलीकरण, डेटा सुरक्षा और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर शुरू हुई राजनीतिक व संवैधानिक बहस जल्द शांत होती नहीं दिख रही है.