ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस हत्याकांड के दोषी दारा सिंह की सजा माफी की पहल पर विवाद
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे रबींद्र कुमार पाल उर्फ दारा सिंह की बाकी सजा माफ करने पर फैसला करने को कहा है.दारा सिंह ने शीर्ष अदालत में अपनी बाकी की सजा माफ करने के लिए एक याचिका दायर की है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 19 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई से पहले अपना फैसला बताने को कहा है. लेकिन अब इस मुद्दे पर विवाद बढ़ रहा है.

वामपंथी दलों समेत कई अन्य संगठनों ने सिंह की समय से पहले रिहाई की पहल की टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं और सुप्रीम कोर्ट से माफी की याचिका खारिज करने की अपील की है.

दारा सिंह को मिली फांसी की सजा को पहले ही उम्रकैद में बदला जा चुका है

यह घटना ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में वर्ष 1999 में 22 जनवरी की रात को हुई थी. आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके पुत्र फिलिप (10 साल) और टिमोथी (6 साल) एक शिविर में हिस्सा लेने के बाद अपने वाहन में सो रहे थे. उसी समय कथित रूप से दारा सिंह के नेतृत्व में एक भीड़ ने उस वाहन को घेर कर उसमें आग लगा दी थी. उस घटना में तीनों लोगों की जलकर मौत हो गई थी. इस घटना ने देश-विदेश में बड़े पैमाने पर सुर्खियां बटोरी थी.

स्टेंस वर्ष 1965 में आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड से भारत आए थे और तीन दशक से भी ज्यादा समय तक ओडिशा के खासकर मयूरभंज जिले में कुष्ठ रोगियों के बीच काम कर रहे थे. तब यह बात सामने आई थी कि स्टेंस पर धर्म परिवर्तन के आरोप लगे थे और उसी से नाराज भीड़ ने उन पर हमला किया था. लेकिन इस घटना की जांच के लिए गठित न्यायमूर्ति डी.पी. वाधवा आयोग की रिपोर्ट में इस बारे में कोई ठोस सबूत नहीं मिले थे. उसमें कहा गया कि सांप्रदायिक तनाव के कारण ही यह हमला किया गया था.

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इस घटना के मुख्य आरोपी माने जा रहे दारा सिंह को वर्ष 2000 में ही गिरफ्तार किया गया था और वो उसी समय से जेल में हैं. उनके अलावा करीब 50 अन्य लोगों की भी गिरफ्तारी हुई थी. वर्ष 2003 में एक स्थानीय अदालत ने दारा सिंह को फांसी की सजा सुनाई और 13 अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा दी गई. बाकियों को रिहा कर दिया गया था. लेकिन वर्ष 2005 में ओडिशा हाईकोर्ट ने दारा सिंह की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया. उनके साथ महेंद्र हेम्ब्रम नामक एक अन्य अभियुक्त की उम्र कैद की सजा बरकरार रखी गई. लेकिन बाकी 12 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया.

वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सिंह की उम्रकैद की सजा ही बरकरार रखी. राज्य सरकार ने अपनी याचिका में उनको फांसी की सजा बहाल करने की मांग की थी. हालांकि ग्राहम स्टेंस की पत्नी ग्लैडिस स्टेंस ने बाद में सार्वजनिक रूप से अपने पति और पुत्रों को हत्यारों को माफ करने का एलान किया था. उन्होंने पति व पुत्रों की हत्या के बावजूद राज्य में अपना काम जारी रखा था. ग्लैडिस स्टेंस को उनके काम के लिए वर्ष 2005 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

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इस मामले के दूसरे अभियुक्त हेम्ब्रम को बीते साल अप्रैल में सजा पूरी होने से पहले ही 'अच्छे व्यवहार' के आधार पर रिहा कर दिया गया था. दारा सिंह ने उससे पहले जुलाई, 2024 में सुप्रीम कोर्ट में समय से पहले रिहाई के लिए एक याचिका दायर की थी. उसमें दलील दी गई थी कि उन्होंने जेल में 25 साल से ज्यादा का समय बिताया है और सजा में छूट की उदार नीति का लाभ हासिल करने के हकदार हैं. उस नीति के तहत जेल में 14 साल बिताने के बाद वो रिहाई की अपील कर सकते हैं. उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि वो अब 27 साल से ज्यादा समय जेल में गुजार चुके हैं और जोश में की गई गलती का उनको पछतावा है.

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इस साल मार्च में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से दारा सिंह की अपील पर छह सप्ताह के भीतर विचार करने का अनुरोध किया था. लेकिन सरकार ने कुछ और समय मांगा था. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर कोई फैसला सुनाने से परहेज करते हुए उम्मीद जताई है कि राज्य सरकार के सजा समीक्षा करने वाले बोर्ड की प्रक्रिया शीघ्र पूरी हो जाएगी और अगली सुनवाई यानी 19 अगस्त से पहले सरकार उस आधार पर किसी फैसले पर पहुंच जाएगी.

राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "सजा समीक्षा बोर्ड ने छह जुलाई की बैठक में उम्र कैद की सजा काट रहे 56 कैदियों के मामले की समीक्षा कर सरकार को अपनी सिफारिशें सौंप दी हैं. लेकिन दारा सिंह के मामले में फैसले के लिए उसने कुछ और दस्तावेज मांगे हैं."

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दारा सिंह की रिहाई की याचिका और इस मामले में होने वाली पहल पर विवाद बढ़ता जा रहा है. राज्य के दो वामपंथी दलों—सीपीआई और सीपीएम ने इसका विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट से सिंह की माफी याचिका को खारिज करने की अपील की है.

इन दोनों दलों की ओर से जारी एक साझा बयान में कहा गया है कि किसी जघन्य सांप्रदायिक अपराध के दोषी व्यक्ति के प्रति नरमी बरतने से न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा कम होगा और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को नुकसान पहुंचेगा. उनकी दलील है कि ऐसी कोई भी पहल राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव और कानून व्यवस्था की स्थिति के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है.

सीपीएम के प्रदेश सचिव सुरेश पाणिग्रही ने राज्य की बीजेपी सरकार की मंशा और इस याचिका की टाइमिंग पर सवाल उठाया है. उन्होंने भुवनेश्वर में पत्रकारों से बातचीत में कहा, "किसी अपराधी को महिमामंडित करना या उसे राजनीतिक संरक्षण देना लोकतंत्र, संविधान और कानून का अपमान है."

आलोचकों का सवाल है कि आखिर सरकार ऐसे सुनियोजित सांप्रदायिक अपराध के दोषी अभियुक्त की रिहाई की दिशा में पहल क्यों कर रही है? इससे समाज में गलत संदेश जाएगा. उनका कहना है कि जिस क्योंझर जिले में वह घटना हुई थी, वह मौजूदा मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी का गृह जिला है.

एक सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा बेहरा डीडब्ल्यू से कहती हैं, "कहीं इस मामले का संबंध राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने से तो नहीं है? इस मामले में सक्रियता से संदेह तो पैदा होता ही है. ऐसे अपराधी की रिहाई के बाद उससे सुरक्षा का जिम्मा कौन लेगा?"

जहां तक ईसाई समुदाय की बात है, उनकी राय बंटी हुई है. चर्च के कुछ नेता माफी को 'ईश्वर की नेमत' बता रहे हैं. उनका कहना है कि अभियुक्त को उसके अपराध की काफी सजा मिल चुकी है. लेकिन कुछ नेता सजा माफी का विरोध कर रहे हैं. नाम नहीं बताने की शर्त पर एक ईसाई नेता डीडब्ल्यू से कहते हैं, "स्टेंस और उनके पुत्रों को जला कर मारने जैसे जघन्य अपराध के लिए जितनी भी सजा दी जाए, वो कम ही है."

अब तमाम निगाहें राज्य सरकार के फैसले पर टिकी हैं.