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'कॉकरोच जनता पार्टी': सोशल मीडिया पर धमाल के बाद जमीनी हकीकत क्या है?

सोशल मीडिया पर सनसनी के तौर पर उभरी सीजेपी एक महीने के भीतर ही देश में जगह जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है.

'कॉकरोच जनता पार्टी': सोशल मीडिया पर धमाल के बाद जमीनी हकीकत क्या है?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सोशल मीडिया पर सनसनी के तौर पर उभरी सीजेपी एक महीने के भीतर ही देश में जगह जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है. कई लोग इसमें युवाओं के नेतृत्व को लेकर उम्मीदें जता रहे हैं तो कइयों को इसके भविष्य को लेकर आशंकाएं भी हैं.देश के बेरोजगारों की कॉकरोच से तुलना के बाद इसी नाम से बनी कॉकरोच जनता पार्टी ने बनते ही युवाओं और देश की मीडिया में सनसनी पैदा कर दी. कुछ ही दिन के भीतर सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोवर बना लेने वाली पार्टी पहली बार जब आंदोलन के मैदान में उतरी तो वो लगभग फ्लॉप रही लेकिन पहले कार्यक्रम की परिस्थितियों और इसके फ्लॉप होने के बावजूद वो आंदोलन के मकसद को लेकर जिस तरह से सक्रिय है, उससे कई चर्चाएं जन्म ले रही हैं.

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने पिछले हफ्ते ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था. पार्टी अभी कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर बनी थी और कुछ ही दिनों के भीतर दो करोड़ से ज्यादा फॉलोवर बना लेने के बावजूद जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में महज कुछ सौ लोग ही पहुंचे. उनमें भी ज्यादा संख्या उन प्रतियोगी छात्रों और उनके परिजनों की थी जो ऐसे किसी भी मंच की तलाश में थे जहां उनकी भावनाओं को व्यक्त करने का मौका मिले. प्रदर्शन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग हुई और एक हफ्ते का अल्टीमेटम दिया गया.

रविवार को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में भी सीजेपी ने विरोध प्रदर्शन किया जिसमें साउथ की फिल्मों के स्टार अभिनेता प्रकाश राज और सोनम वांगचुक भी शामिल हुए. यहां भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हुई. प्रकाश राज ने सीजेपी के समर्थन में कहा, "यदि आप इन युवाओं को 'अर्बन नक्सल', 'पाकिस्तानी' या 'कॉकरोच' कह रहे हैं, तो भी वे डरते नहीं हैं. वे अपने सपनों के लिए लड़ रहे हैं- चुप हो जाइए और उनकी बात सुनिए.”

इससे पहले सीजेपी ने महाराष्ट्र के पुणे, उत्तर प्रदेश के लखनऊ और पंजाब के अमृतसर में भी विरोध प्रदर्शन किए जिसमें NEET पेपर लीक मामले, CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में कथित गड़बड़ियों और परीक्षा से जुड़ी अन्य कथित खामियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई. हालांकि लखनऊ में सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके का विरोध भी हुआ और छात्रों ने उनके आंदोलन में जबरन घुसपैठ करने के आरोप लगाए.

अल्टीमेटम की अवधि बीत गई, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हुआ और न ही होने की कोई संभावना है. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि सीजेपी की आगे की राह क्या है. क्या यह युवाओं के छिट-पुट आंदोलन को एक व्यापक और राष्ट्रीय नेतृत्व दे पाएगी या फिर सनसनी की तरह प्रकट होने के बाद वैसे ही विलुप्त भी हो जाएगी.

जंतर-मंतर के प्रदर्शन से उठ रहे सवाल

राजनीतिक विश्लेषक छात्रों के आंदोलन और सीजेपी के साथ युवाओं के जुड़ने के पीछे व्यवस्था के प्रति असंतोष और उनके आक्रोश को देख रहे हैं. लेकिन एक थ्योरी यह भी है कि सीजेपी को इस वजह से खड़ा किया गया और फिर पर्दे के पीछे से इसे समर्थन दिया जा रहा है ताकि इस असंतोष और आक्रोश को कमजोर और दिग्भ्रमित किया जा सके.

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार झा कहते हैं, "युवाओं में असंतोष और नाराजगी तो है ही. और यह नाराजगी सड़कों पर उनके होने वाले बार-बार के प्रदर्शनों में दिख भी रही है. लेकिन अब जब नीट पेपर लीक और सीबीएसई की धांधली के बाद कांग्रेस पार्टी के छात्र और युवा विंग भी इस आंदोलन में उतर आए, ऐसे में अचानक कॉकरोच पार्टी का बनना, आंदोलन में उतरना, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना ऊपर से तो दिखाता है कि छात्रों-युवाओं के समर्थन में है लेकिन जंतर-मंतर पर जिस तरह उसे प्रदर्शन की अनुमति मिली और सीजेपी ने भी जिस तरह पुलिस की इच्छानुसार प्रदर्शन किया, उससे ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये सत्तारूढ़ पार्टी की मुश्किलों को बढ़ाने नहीं बल्कि उसे कम करने का काम कर रही है.”

हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस तरह से युवाओं के मुद्दों और छात्रों की समस्याओं को उठाया है, उसे देखते हुए उनकी गतिविधियों को सीधे तौर पर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक टूल्स को चुनौती के तौर पर भी देखा जा रहा है.

चूंकि प्रधानमंत्री अक्सर युवाओं की बात करते हैं, युवा आबादी का जिक्र करते हैं, देश को युवा देश बताते हैं, परीक्षा पर चर्चा करते हैं, ऐसे में परीक्षा में होने वाली धांधली और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को लोगों को सामने लाने का काम यदि सीजेपी कर रही है तो कहीं न कहीं, यह सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी करती दिख रही है.

बावजूद इसके, सीजेपी को इस तरह तो इसके प्रशंसक भी नहीं देख रहे हैं कि यह जेपी आंदोलन, वीपी सिंह, अन्ना हजारे जैसा कोई आंदोलन खड़ा कर पाएगा. जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान असम की एक युवती रूपम गोस्वामी का कहना था, "पूरा सिस्टम खराब हो गया है. युवाओं-छात्रों की बात सुनी नहीं जा रही है. सिस्टम का विरोध करने पर डंडे बरसाए जाते हैं. ऐसे में हम क्या करें. हमारी समस्या को कोई भी उठा रहे हैं तो हम उसके साथ खड़े हैं.”

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं कि सीजेपी के नेताओं को कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और वो इतने परिपक्व दिखते भी नहीं हैं लेकिन युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्ति और मंच तो दिया ही है.

क्या यह 'अन्ना' जैसा आंदोलन है?

डीडब्ल्यू से बातचीत में शरद गुप्ता कहते हैं, "सोशल मीडिया पर आंदोलन शुरू करने वाले इन युवाओं के पास कोई सोची-समझी रणनीति तो है नहीं. हां, ये जरूर है कि वे युवाओं के भीतर दबे हुए आक्रोश को हवा दे रहे हैं. युवाओं का यह आक्रोश अभी धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहा है. लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए बिना किसी लाइन-लेंथ के ये युवा आज सीजेपी के साथ दिख रहे हैं तो हो सकता है कल को किसी और के साथ दिखें."

वहीं, राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं कि सीजेपी को नजरअंदाज करना या पारंपरिक राजनीति के पैमाने से इसका आकलन करना ठीक नहीं है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने लिखा है, "कॉकरोच जनता पार्टी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. यह न इससे ज्यादा है और न कम. यह बस आम जनता ही है. यह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि एक क्षण है. और यही वजह है कि यह महत्वपूर्ण है."

यह ठीक है कि सीजेपी को किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी. फिर भी तमाम विश्लेषकों को इसमें संभावनाएं भी दिख रही हैं. इसके पीछे बड़ा तर्क यह है कि सीजेपी का आंदोलन आम लोगों, खासकर युवाओं को सीधे उनके मुद्दों से जोड़ता है. लेकिन आंदोलन के कर्ता-धर्ता आंदोलन के आगे बढ़ने से पहले ही जिस तरह राजनीति में आने को उत्सुक दिख रहे हैं, उससे इसे सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी और उनके नेताओं से जोड़कर देखा जा रहा है. अभिजीत दीपके समेत सीजेपी के कई नेताओं का अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी की ही उपज होना इसकी पुष्टि भी करता है.

वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष भी 'अन्ना आंदोलन' के समय आम आदमी पार्टी से जुड़े थे लेकिन कुछ समय बाद ही उनका राजनीति से मोहभंग हो गया. सत्यहिन्दी वेबसाइट पर एक लेख में सीजेपी को लेकर आशुतोष लिखते हैं कि किसी भी आंदोलन को शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने वालों को ये सोचना होगा कि उनका आंदोलन किस सरकार के खिलाफ है.

कौन हैं ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के फाउंडर, जिनके एक्स अकाउंट को भारत में बैन कर दिया गया?

आशुतोष लिखते हैं, "मोदी सरकार भारतीय इतिहास की पहली सरकार है जो गलती मानने को अपनी तौहीन मानती है. जिसे लगता है कि गलती मानना सरकार को कमजोर करता है, विपक्ष की मांग को उचित ठहराता है. मोदी सरकार वो गलती नहीं करेगी जो मनमोहन सिंह ने की थी जब विपक्ष और मीडिया के दबाव में मंत्रियों के त्यागपत्र ले लिए जाते थे. मंत्रियों का पद छोड़ना एक तरह से जवाबदेह सरकार की निशानी है, लेकिन जो सरकार चुनाव जीतने को ही लोकतंत्र मानती हो, वो सरकार जवाबदेही को उचित नहीं मानती. ऐसे में कॉकरोच किसी गलतफहमी में न रहें. वो शोर मचा कर ठंडे हो जाएंगे और सरकार वही करेगी जो वो चाहेगी.”

(The above story first appeared on LatestLY on Jun 15, 2026 04:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).