Karnataka High Court Ruling: पति की गर्लफ्रेंड पर BNS की धारा 85 (क्रूरता) के तहत केस नहीं चल सकता; कर्नाटक हाईकोर्ट का अहम फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 (पूर्ववर्ती IPC की धारा 498A) के तहत वैवाहिक क्रूरता के दायरे को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है. न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि पति की प्रेमिका या विवाहेतर साथी कानूनन 'पति का रिश्तेदार' नहीं मानी जा सकती, इसलिए उस पर पत्नी के प्रति वैवाहिक क्रूरता का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.

Representational picture. (File photo)

बेंगलुरु: भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत वैवाहिक अपराधों की व्याख्या को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बड़ा कानूनी स्पष्टीकरण जारी किया है. Bar and Bench की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी विवाहित पुरुष की गर्लफ्रेंड या विवाहेतर संबंध में शामिल महिला पर BNS की धारा 85 (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के प्रति क्रूरता) के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने एक महिला याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ निचली अदालत में लंबित सभी आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया. यह भी पढ़ें: अहमदाबाद: शादी से पहले वादा कर फिर तंबाकू की लत में पड़ा पति, पत्नी ने पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

क्या था मामला?

यह कानूनी विवाद एक वैवाहिक कलह से जुड़ा हुआ था:

सुप्रीम कोर्ट की नज़ीर: कौन है 'रिश्तेदार'?

कार्यवाही के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 85 (जो पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के समतुल्य है) के तहत आपराधिक दायित्व केवल पति या उसके रिश्तेदारों तक ही सीमित है:

हाईकोर्ट की दो टूक: 'गर्लफ्रेंड पति की रिश्तेदार नहीं हो सकती'

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में दर्ज किया:

"सर्वोच्च अदालत द्वारा स्पष्ट किए गए कानून के आधार पर यदि मौजूदा मामले के तथ्यों को देखा जाए, तो आरोपी नंबर-1 (पति) की महिला साथी/प्रेमिका को किसी भी सूरत में पति का 'रिश्तेदार' नहीं कहा जा सकता."

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता महिला के संबंध में BNS की धारा 85 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत अपराध साबित करने वाले अनिवार्य कानूनी तत्व (Essential Ingredients) पूरी तरह नदारद हैं.

आपराधिक कार्यवाही रद्द

अदालत ने कहा कि जब कानूनन आरोपी उस श्रेणी में आता ही नहीं जिसके खिलाफ यह धाराएं बनाई गई हैं, तो उसके खिलाफ मुकदमा जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. इसके साथ ही पीठ ने याचिकाकर्ता के खिलाफ संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त (Quash) कर दिया.

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