Surrogacy Rule Challenge: क्या 35 साल से कम उम्र की सिंगल महिला सरोगेसी से बन सकती है मां? कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है. कानून के तहत 35 वर्ष से कम उम्र की अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा (सिंगल) महिलाओं को सरोगेसी की अनुमति नहीं है. कोर्ट ने एक 32 वर्षीय सिंगल महिला को अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए सरकार से इस आयु सीमा पर जवाब मांगा है.
बेंगलुरु: भारत में मां बनने के कानूनी अधिकारों और सरोगेसी नियमों (Surrogacy Rule) को लेकर एक नया कानूनी विवाद सामने आया है. कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) ने सोमवार, 29 जून 2026 को केंद्र और राज्य सरकार को एक नोटिस जारी कर पूछा है कि क्या 35 वर्ष से कम उम्र की सिंगल महिलाओं को सरोगेसी (किराए की कोख) के जरिए संतान प्राप्ति का अधिकार मिलना चाहिए. अदालत ने यह कदम सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Surrogacy Regulation Act) की धारा 2(1)(s) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर उठाया है. हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता 32 वर्षीय सिंगल महिला को तुरंत इलाज शुरू करने की अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है. यह भी पढ़ें: Karnataka High Court: पति से ज्यादा कमाने वाली आत्मनिर्भर पत्नी सिर्फ महिला होने के नाते नहीं मांग सकती गुजारा भत्ता; हाईकोर्ट ने बदला फैसला
क्या कहता है वर्तमान सरोगेसी कानून?
मौजूदा सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 2(1)(s) के तहत 'इच्छुक महिला' (Intending Woman) की पात्रता को बेहद सीमित दायरे में रखा गया है. कानून के मुताबिक, भारत में केवल वही सिंगल महिला सरोगेसी का लाभ उठा सकती है जो:
- कानूनी रूप से विधवा (Widow) या तलाकशुदा (Divorcee) हो.
- जिसकी उम्र 35 से 45 वर्ष के बीच हो.
इस परिभाषा के कारण, जो महिलाएं अविवाहित (Unmarried) हैं या जिनकी उम्र 35 वर्ष से कम है, वे इस तकनीक का उपयोग करके मां नहीं बन सकती हैं. याचिकाकर्ता ने इसी आयु सीमा और वैवाहिक स्थिति की शर्त को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है.
32 साल की याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देने से कोर्ट का इनकार
न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला के वकील ने दलील दी कि बढ़ती उम्र और कुछ चिकित्सीय कारणों (Medical Indications) की वजह से महिला के लिए भविष्य में मां बनना मुश्किल हो सकता है. इसलिए, जब तक मुख्य याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक कोर्ट उन्हें सरोगेसी प्रक्रिया शुरू करने की अंतरिम अनुमति प्रदान करे.
हालांकि, उच्च न्यायालय की पीठ ने इस चरण में कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने से मना कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह सीधे तौर पर संसद द्वारा पारित एक केंद्रीय कानून (Central Statute) की वैधता को चुनौती देने का मामला है, इसलिए बिना केंद्र सरकार का पक्ष सुने और कानून के पीछे के मूल विधायी इरादे (Legislative Intent) को समझे बिना कोई भी अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती.
कानून के भेदभावपूर्ण रवैये पर उठी आवाज
याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान कानून एक तरफ तो विवाहित जोड़ों के लिए सरोगेसी की न्यूनतम आयु सीमा महिला के मामले में 23 वर्ष तय करता है, लेकिन सिंगल महिलाओं के लिए इसे बढ़ाकर सीधे 35 वर्ष कर देता है. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह वर्गीकरण पूरी तरह से अतार्किक है और उन महिलाओं के प्रजनन अधिकारों (Reproductive Autonomy) पर चोट करता है जो बिना शादी किए या कम उम्र में अकेले ही बच्चे का पालन-पोषण करने में सक्षम और इच्छुक हैं.
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राज्य स्वास्थ्य विभाग को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है. इस मामले की अगली सुनवाई अब आगामी हफ्तों में होगी, जिसके बाद यह तय होगा कि भारत में सिंगल महिलाओं के लिए मातृत्व के कानूनी नियम बदलेंगे या नहीं.