देश की खबरें | अमेरिका में हुए अध्ययन में प्रदूषण और कोविड-19 के बीच संबंध का ठोस प्रमाण नहीं: भारतीय विशेषज्ञ

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. अमेरिका में तीन हजार से अधिक काउंटी पर किये गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि जो लोग ‘पीएम 2.5’ सूक्ष्म कणों के संपर्क में अधिक समय तक रहते हैं, कोविड-19 से उनकी मौत होने की आशंका बढ़ जाती है।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली/बोस्टन, छह नवंबर अमेरिका में तीन हजार से अधिक काउंटी पर किये गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि जो लोग ‘पीएम 2.5’ सूक्ष्म कणों के संपर्क में अधिक समय तक रहते हैं, कोविड-19 से उनकी मौत होने की आशंका बढ़ जाती है।

इस विश्लेषण के सामने आने के बाद पहले से ही प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे उत्तर भारत के क्षेत्रों में महामारी के रुख और उससे होने वाली मौतों की दर के प्रति चिंता बढ़ गई है।

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भारत की राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्रों में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों में वृद्धि पर श्वास रोग विशेषज्ञ चिंतित हैं लेकिन उनका कहना है कि प्रदूषण कारक सूक्ष्म कणों (पीएम 2.5) और कोविड-19 से होने वाली मौत के बीच अभी तक कोई प्रामाणिक संबंध स्थापित नहीं हुआ है।

‘साइंस एडवांसेज’ नामक शोध पत्रिका में बृहस्पतिवार को प्रकाशित अध्ययन में कोविड-19 से होने वाली मौतों की दर पर ‘पीएम 2.5’ कणों के संपर्क में अधिक समय तक रहने के प्रभाव का जिक्र किया गया है।

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यह अनुसंधान अमेरिका की 3089 काउंटी में रहने वाले लोगों पर किया गया।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शिआओ वू समेत शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि ‘पीएम 2.5’ प्रदूषण कारक कणों के संपर्क में अधिक समय तक रहने पर कोविड-19 से होने वाली मौतों की दर में वृद्धि हुई।

इस विषय पर शंका को कुछ हद तक दूर करते हुए कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि जिन स्थानों की हवा में ‘पीएम 2.5’ कण अधिक मात्रा में हैं वहां कोविड-19 से होने वाली मौत की दर में वृद्धि के ठोस कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं।

गुरुग्राम के कोलंबिया एशिया अस्पताल में श्वास रोग विशेषज्ञ पीयूष गोयल ने पीटीआई- से कहा, “वर्तमान में यह साबित नहीं हो पाया है कि ‘पीएम 2.5’ के स्तर में वृद्धि का संक्रमण या मौत से सीधा संबंध है या नहीं।”

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