देश की खबरें | मुर्मू की उम्मीदवारी पर दुविधा में टीएमसी, विरोध करने पर आदिवासी मतदाताओं के नाराज होने का डर

कोलकाता, 11 जुलाई राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) दुविधा में है।

पार्टी को डर है कि मुर्मू का विरोध करने की सूरत में पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राज्य के आदिवासी मतदाता उससे नाराज हो सकते हैं।

पश्चिम बंगाल की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी सात से आठ प्रतिशत के बीच है। राज्य की 47 विधानसभा और सात लोकसभा सीट पर आदिवासी निर्णायक भूमिका निभाते हैं जो जंगलमहल क्षेत्र-पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और झाड़ग्राम तथा जलपाईगुड़ी व अलीपुरद्वार में फैली हुई हैं।

तृणमूल कांग्रेस ने राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में यशवंत सिन्हा के नाम पर सहमति बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस बयान से पार्टी की यह दुविधा उजागर हो गई है कि राजग ने मुर्मू को चुनाव मैदान में उतारने से पहले अगर विपक्षी दलों से चर्चा की होती तो वह आम सहमति की उम्मीदवार हो सकती थीं।

ममता ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद राजग के संख्या बल में इजाफा होने से मुर्मू के चुनाव जीतने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं।

टीएमसी प्रमुख के बयान ने विपक्षी खेमे के कई नेताओं को स्तब्ध कर दिया है। हालांकि, पार्टी सूत्रों का मानना है कि आदिवासी बहुल जंगलमहल क्षेत्र का चुनावी गणित ममता के इस बयान के पीछे की वजह हो सकता है।

वरिष्ठ टीएमसी नेता सौगत रॉय ने ‘पीटीआई-’ से कहा, “एक राजनीतिक दल जमीनी हकीकत के आधार पर फैसले लेता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हमें अपने उम्मीदवार के बारे में पहले सूचित नहीं किया। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि मुर्मू का समर्थन या विरोध आदिवासी मतों के मिलने या छिटकने की वजह बनेगा। आदिवासी मतदाताओं का समर्थन इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित क्षेत्रों में पार्टी कितनी मजबूत है।”

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