कोल इंडिया के पूर्व प्रमुख ने सरकार से कोयला धुलाई की अनिवार्यता समाप्त नहीं करने को कहा

उन्होंने कहा कि कोल इंडिया धुले कोयले की आपूर्ति के वादे को पूरा नहीं कर पाने के कारण पिछले दस साल में बाजार में उसे करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये कम मूल्य प्राप्त हुआ है।

जमात

नयी दिल्ली, 19 मई कोल इंडिया के पूर्व चेयरमैन पार्थ एस भट्टाचार्य ने केंद्र से कोयले की धुलाई की अनिवार्यता समाप्त करने के प्रस्ताव को वापस लेने को कहा है। उनका कहना है कि यह ‘प्रतिगामी’ कदम होगा।

उन्होंने कहा कि कोल इंडिया धुले कोयले की आपूर्ति के वादे को पूरा नहीं कर पाने के कारण पिछले दस साल में बाजार में उसे करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये कम मूल्य प्राप्त हुआ है।

केंद्र तापीय बिजलीघरों को कोयला भेजने से पहले कोयले की धुलाई की अनिवार्यता समाप्त करने की योजना बना रहा है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 में जलवायु परिवर्तन प्रतिबद्धता के तहत सरकार ने खान से 500 किलोमीटर से अधिक दूरी वाले सभी तापीय इकाइयों को आपूर्ति के लिये कोयले की धुलाई करना अनिवार्य किया था। यह देश के जलवायु परिवर्तन पर बातचीत में रुख के अनुरूप था। उसमें भारत का रुख कोयले की खपत में कमी किये बिना उत्सर्जन नियंत्रण पर ध्यान देने का था।

पूर्व कोयला सचिव ने कहा कि सरकार कोयला धुलाई की पाबंदी को हटाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।

भट्टाचार्य ने पर्यावरण, वन और जलवयु परिवर्तन मंत्रालय में सचिव सी के मिश्रा को लिखे पत्र में कहा है, ‘‘पर्यावरण मंत्रालय में कोयला धुलाई की अनिवार्यता को वापस लेने का जो प्रस्ताव आया है, मेरे विचार से एक प्रतिगामी कदम है। भारत को कोयला आधारित तापीय बिजली उत्पादन की कुछ और दशकों तक जरूरत को देखते हुए यह अनिवार्य है कि कोयले की धुलाई की व्यवस्था को वापस लेने के बजाए उसे पूरी कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।’’

कोयले की धुलाई से उसकी दक्षता और गुणवत्ता बढ़ती है। इससे कोयले की कीमत भी बढ़ती है।

उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न कारणों से वाशरी निर्माण कार्यक्रम (बिना धुलाई वाला कोयले की आपूर्ति को समाप्त करना) आगे नहीं बढ़ पाया...यह स्थिति तबतक थी जबतक पर्यावरण मंत्रालय ने 500 किलोमीटर से अधिक की दूरी या बड़े शहरों में ग्राहकों की खपत वाले कोयले के लिये राख की पाबंदी 34 प्रतिशत पर अधिसूचित की।

इस मानदंड को कोयले की धुलाई के जरिये या फिर कम राख वाले आयातित कोयले के मिश्रण के जरिये पूरा किया जा सकता है।

कोल इंडिया द्वारा वाशरीज की स्थापना में देरी के कारण आयातित कोयले के मिश्रण वाले विकल्प की मांग बढ़ी। परिणामस्वरूप तापीय कोयले का आयात उल्लेखनीय रूप से बढ़ा।

महंगा तापीय कोयले का आयात बढ़कर 12 करोड़ टन से ऊपर पहुंच गया। यानी 8-9 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा आयात के लिये खर्च करनी पड़ी। दूसरी तरफ उत्पादन लक्ष्य से कम होने के बावजूद कोल इंडिया के लिये बढ़ते कोयला भंडार को संभालना मुश्किल हो गया।

आयातित कोयले की जगत घरेलू कोयले के उपयोग से न केवल कोल इंडिया और ईंधन का उत्पादन करेगा बल्कि घरेलू कोयले की मांग बढ़ेगी। फलत: आयातित कोयले पर निर्भरत कम होगी।

इससे सरकार कोयला ब्लाक की नीलामी सफलतापूर्वक कर पाएगी।

हालांकि जलवायु परिवर्तन की बाध्यताओं को पूरा करने के लिये जरूरी है कि कोयले की धुलाई हो जिससे इसमें राख की मात्रा 34 प्रतिशत से कम रहे।

दूसरे शब्दों में इसके लिये यथाशीघ्र कोल इंडिया को धुलाई क्षमता बढ़ाने की जरूरत है।

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