देश की खबरें | न्यायाधीशों की नियुक्ति में केंद्र की देरी के मुद्दे पर न्यायालय दो हफ्ते बाद सुनवाई के लिए सहमत

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नयी दिल्ली, 24 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में कॉलेजियम द्वारा सिफारिश किए जाने के बाद केंद्र सरकार की ओर से की जा रही देरी पर सवाल उठाने वाली कई याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि वह दो हफ्ते बाद इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इन याचिकाओं को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया था।

पीठ ने कहा कि ये याचिकाएं 2023 में सूचीबद्ध थीं, लेकिन अचानक इन्हें वाद सूची से हटा दिया गया।

दातार ने कहा, ‘‘कुछ न्यायाधीशों के नाम 2019, फिर 2020 और 2022 में दोहराए गए थे, लेकिन अब तक उन्हें मंजूरी नहीं मिली है। न्यायालय में हर स्तर पर निर्णय लेने की एक निश्चित समय सीमा होती है। कुछ हफ्तों की देरी तो समझ में आती है, लेकिन चार साल की देरी बिल्कुल भी समझ से परे है।’’

उन्होंने कहा कि अंतत: होता यह है कि उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीश पद के लिए जिस उम्मीदवार के नाम की सिफारिश की जाती है, वह धीरे-धीरे रुचि और वरिष्ठता खो देता है।

वकील ने उन उदाहरणों का भी ज़िक्र किया जहां दिल्ली और मुंबई के जिन वकीलों के नामों की सिफारिश की गई थी उन्होंने अंततः अपने नाम वापस ले लिए।

प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा कि दिल्ली के मामले में जब केंद्र ने एक महिला वकील के नाम को मंजूरी नहीं दी, तो उन्होंने प्रशासनिक पक्ष को समझाने की कोशिश की।

दातार ने कहा कि इस मामले पर आखिरी बार न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) संजय किशन कौल ने सुनवाई की थी।

भूषण ने दिल्ली की वकील के नाम को मंजूरी नहीं मिलने का जिक्र करते हुए कहा कि वह ‘नेशनल लॉ स्कूल’ की ‘टॉपर’ हैं और दावा किया कि ऐसा बार-बार होता रहा है।

भूषण ने राज्यपालों का मामला उठाने की कोशिश की जिसमें उच्चतम न्यायालय ने विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में राज्यपालों के लिए समय-सीमा तय की है। इस पर, प्रधान न्यायाधीश गवई ने भूषण से कहा कि वह किसी भी विचाराधीन मामले का जिक्र नहीं करें और धैर्य रखें।

शीर्ष अदालत आठ अप्रैल के अपने फैसले के संबंध में राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई कर रही है, जिसमें विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए एक समय-सीमा तय की गई थी।

कुछ वकीलों द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पदोन्नति एवं स्थानांतरण के संबंध में कॉलेजियम की सिफारिशों पर कार्रवाई करने में केंद्र द्वारा कथित देरी से संबंधित याचिकाओं को वाद सूची से अचानक हटाए जाने की ओर इशारा करने पर न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने पांच दिसंबर, 2023 को कहा था, ‘‘कुछ बातें अनकही ही रहने देना बेहतर है।’’

उच्चतम न्यायालय में ऐसी दो याचिकाएं लंबित हैं।

मामले में 20 नवंबर, 2023 को सुनवाई करते हुए न्यायालय ने स्थानांतरण के संबंध में कॉलेजियम की सिफारिश वाले उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के (केंद्र द्वारा) ‘‘चयन और चुनाव’’ के मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह अच्छा संकेत नहीं है।

कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था में न्यायाधीश संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं, जो अक्सर उच्चतम न्यायालय और केंद्र के बीच एक मुद्दा बन जाता है और इस तंत्र की विभिन्न क्षेत्रों से आलोचना की जाती है।

शीर्ष अदालत उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पदोन्नति और स्थानांतरण के संबंध में उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिश वाले नामों को मंजूरी देने संबंधी 2021 के एक फैसले में न्यायालय द्वारा निर्धारित समय-सीमा का कथित रूप से पालन नहीं करने के लिए केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के खिलाफ अवमानना कार्रवाई का अनुरोध किया गया है। इनमें से एक याचिका ‘एडवोकेट्स एसोसिएशन, बेंगलुरु’ ने दायर की है।

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