देश की खबरें | जलवायु परिवर्तन पर कड़ा रुख अपनाना लोकतंत्र में हमेशा व्यावहारिक नहीं होता: केंद्रीय मंत्री
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नयी दिल्ली, 29 अगस्त केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बृहस्पतिवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई पहल काफी हद तक जनता के समर्थन पर निर्भर करती हैं और एक लोकतांत्रिक देश में कड़ा रुख अपनाना हमेशा व्यावहारिक नहीं हो सकता।
एसोचैम के यहां आयोजित पर्यावरण और कार्बन सम्मेलन को संबोधित करते हुए पर्यावरण राज्य मंत्री सिंह ने कहा कि कर्नाटक के एक दूरदर्शी मुख्यमंत्री को ‘‘किसानों के लिए पानी के उपयोग’’ पर कर लगाने का निर्णय लिए जाने के तुरंत बाद सत्ता से बाहर कर दिया गया था।
मंत्री ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बहुत सी पहल लोगों पर काफी अधिक निर्भर हैं और एक लोकतंत्र होने के नाते, आप जानते हैं कि इसका क्या मतलब है... कभी-कभी, सही रुख अपनाना, कठोर रुख अपनाना एक लोकतांत्रिक देश होने के संदर्भ में बहुत व्यावहारिक नहीं हो सकता।’’
उन्होंने कहा कि उनके गृह राज्य उत्तर प्रदेश में किसान बहुत खुश हैं क्योंकि उनके पास ‘‘जितना चाहें उतना पानी निकालने की पूरी शक्ति’’ है।
सिंह ने कहा, ‘‘हाल के चुनावों में, यह सकारात्मक तरीके से बात करने का विषय था क्योंकि आपको वोट चाहिए। इसलिए, हम कहेंगे कि हमारे पास आज सिंचाई के इतने संसाधन हैं कि हमारा किसान बस पंप चालू करता है, सोने के लिए घर चला जाता है... और सुबह जब वह खेत पर वापस आता है, तो न वह केवल अपने खेतों की सिंचाई कर चुका होता है, बल्कि अपने पड़ोसियों के खेतों को भी भर चुका होता है। इसकी बहुत सराहना होती है, जबकि वास्तव में यह हमारे जल संसाधनों की बर्बादी है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, जब हम शुद्ध शून्य (उत्सर्जन) हासिल करने की बात करते हैं, जब हम जलवायु परिवर्तन से लड़ने की बात करते हैं, जब हम उस भविष्य की आशा करते हैं जो हम अपनी भावी पीढ़ियों को देने जा रहे हैं, तो हमें कई पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।’’
मंत्री ने कहा कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश को अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करने के लिए उद्योगों और व्यवसायों के वास्ते सक्षम नीतियां बनाई हैं, लेकिन ‘‘हमें भी अपना योगदान देना होगा’’।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र अवसरंचना संधि (यूएनएफसीसीसी) और जलवायु परिवर्तन सम्मेलन इस बात पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं कि उद्योग जलवायु परिवर्तन से कैसे निपट सकता है और बुनियादी ढांचे में किस तरह के बदलाव की जरूरत है, लेकिन ‘‘समय-समय पर आपको भी अपने अंदर झाँककर देखना होगा कि हम कहाँ संसाधनों का अनावश्यक दोहन कर रहे हैं।’’
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