देश की खबरें | उच्चतम न्यायालय ने मप्र की महिला न्यायिक अधिकारी को बहाल करने का आदेश दिया

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नयी दिल्ली, 10 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को मध्य प्रदेश की उस पूर्व महिला न्यायिक अधिकारी को नौकरी पर वापस लेने का आदेश दिया जिन्होंने उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न के उनके आरोपों की जांच के मद्देनजर 2014 में इस्तीफा दे दिया था। न्यायालय ने कहा कि उनके इस्तीफे को ‘स्वैच्छिक’ नहीं कहा जा सकता।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जब कभी कोई बेहतर उपलब्धियों वाला न्यायिक अधिकारी इस्तीफा देता है तो उच्च न्यायालयों के वरिष्ठ न्यायाधीशों को उस अधिकारी को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाने का प्रयास करना चाहिए।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की खंडपीठ ने पूर्व महिला अधिकारी का इस्तीफा स्वीकार करने वाला आदेश निरस्त कर दिया और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को वापस लेने और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने इस बात का संज्ञान लिया कि अपने इस्तीफे के एक पखवाड़े के भीतर ही महिला अधिकारी ने राष्ट्रपति और भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को अपना प्रतिवेदन दिया था और उसकी एक प्रति मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी सौंपी थी, जिसमें उन्होंने उन परिस्थितियों का जिक्र किया था, जिसकी वजह से इस्तीफा देने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था।

पीठ ने कहा कि यह कहना संभव नहीं है कि याचिकाकर्ता को इस्तीफे के लिए बाध्य किया गया था, लेकिन यहां उपजी परिस्थितियां ऐसी होंगी जिससे उनके पास और कोई चारा नहीं था।

शीर्ष अदालत ने अपने 86-पन्नों के फैसले में लिखा है, ‘‘हम घोषणा करते हैं याचिकाकर्ता का ग्वालियर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद से 15 जुलाई 2014 को दिया गया इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं कहा जा सकता और प्रतिवादी संख्या दो (मप्र सरकार) द्वारा 17 जुलाई के निर्णय हालांकि स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पुराने वेतन के लिए अधिकृत नहीं होंगी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह स्थापित किया है कि उनका तबादला आदेश ‘ट्रांसफर पॉलिसी’ के विपरीत था और उनकी ओर से दिये गऐ दो प्रतिवेदन खारिज किया जाना मनमाना था।

उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी के ‘आवेग’ में लिये गये निर्णय को ‘दंडात्मक’ नहीं कहा जा सकता। इसके जवाब में शीर्ष अदालत ने कहा कि निस्संदेह एक न्यायिक अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने कर्तव्य के निर्वहन के मामले में स्वतंत्र, निडर, भावहीन और आवेगहीन हो।

न्यायालय ने आगे कहा, ‘‘लेकिन एक न्यायिक अधिकारी भी इंसान ही होता है। एक न्यायिक अधिकारी भी माता-पिता होता है। वह पिता या माता हो सकता है। सवाल यह होगा कि क्या न्यायिक अधिकारी अपने व्यक्तिगत मामले में एक इंसान के रूप में, एक पिता या माता की क्षमता में निर्णय लेते समय उसी पैमाने द्वारा आंका जाएगा।’’

न्यायालय ने कहा कि कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता कि याचिकाकर्ता ने उस अवधि के दौरान कितनी मानसिक पीड़ा का सामना किया होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को इस बात का भान नहीं था कि उसकी शिकायत के कारण उसे तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश, ग्वालियर द्वारा तबादला किया जा रहा था। उसे इस बात की जानकारी बहुत बाद में हुई थी।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी बेटी की बारहवीं कक्षा की पढ़ाई के मद्देनजर कुछ समय के लिए ग्वालियर में ही रहने देने का प्रतिवेदन भी दिया था और कहा था कि उसकी बेटी जब बारहवीं पास कर जाएगी तो वह वहां चली जाएगी, जहां उसे भेजा जाएगा, लेकिन उसे दो दिन के भीतर ही खारिज कर दिया गया।

न्यायालय ने कहा कि इस तरह की परिस्थितियों में याचिकाकर्ता जिस मानसिक परेशानी से गुजरी होगी उसका जिक्र उनके इस्तीफे में इस्तेमाल की गई से पता चलता है।

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