नयी दिल्ली, 12 जुलाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने एक समिति का गठन किया गया है जो समुद्र में बढ़ते जल स्तर के द्वीपों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करेगी और उन्हें जलमग्न होने, कटाव, बाढ़ और अन्य प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों से बचाने के लिए एक उपयुक्त नीति तैयार करेगी।
एनजीटी ने एक मीडिया रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय तटों के पास कई द्वीपों में कटाव होने और उनके डूबने का खतरा है।
कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस. के. सिंह, न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य ए. सेंथिल वेल की पीठ ने केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के जवाब पर गौर किया, जिसके अनुसार देश का औसत तापमान 1901 और 2021 के बीच लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है और इसका मुख्य कारण ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है।
पीठ ने मंत्रालय के जवाब पर गौर किया जिसमें कहा गया है, ‘‘तापमान में वृद्धि के कारण हिमनदियां पिघल रही हैं, समुद्र के स्तर में वृद्धि हो रही है, वर्षा की प्रणाली बदल रही है’’ और वैश्विक स्तर पर मौसम और जलवायु की प्रवृत्ति में बदलाव हो रहा है।
पीठ ने कहा कि द्वीपों की रक्षा करना बहुत जरूरी है। उसने एक समिति का गठन किया जिसमें गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ), चेन्नई स्थित राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र, चेन्नई स्थित राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान और देहरादून स्थित भारतीय सर्वेक्षण विभाग के निदेशक शामिल होंगे।
अधिकरण ने कहा, ‘‘उक्त संस्थान द्वीपों पर बढ़ते जल स्तर के प्रभाव का अध्ययन करेंगे और इन द्वीपों को डूबने, कटाव, खारे पानी के घुसने, बाढ़ और अन्य प्रतिकूल पर्यावरणीय पहलुओं से बचाने के लिए नीतियां बनाएंगे।’’
उसने कहा कि एनआईओ समिति की नोडल एजेंसी है और इसकी पहली बैठक एक पखवाड़े के भीतर होगी।
अधिकरण ने कहा कि समिति को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। मामले की सुनवाई को 13 अक्टूबर के लिए स्थगित किया गया है।
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