नेपाल की बाढ़ बनी बालेन सरकार के लिए अग्निपरीक्षा

जेन जी के युवाओं के प्रदर्शन की बदौलत प्रधानमंत्री बने बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी एक साल ही हुआ है और देश इस समय भीषण बाढ़ से जूझ रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जेन जी के युवाओं के प्रदर्शन की बदौलत प्रधानमंत्री बने बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी एक साल ही हुआ है और देश इस समय भीषण बाढ़ से जूझ रहा है. अनुभवहीन नेता के सामने विनाशकारी बाढ़ से निपटने की बड़ी चुनौती है.नेपालइस समय बहुत भारी मुसीबत का सामना कर रहा है. पिछले हफ्ते यहां अचानक आई भयानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. इसमें हजारों लोगों के मारे जाने की आशंका है और जान-माल का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. ऐसे मुश्किल समय में देश के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (जो 'बालेन' नाम से जाने जाते हैं और पहले एक रैपर थे) के सामने बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ खड़ी हुई है. उन्हें उजड़े हुए लोगों और उनके घरों को फिर से बसाना है. टूटी-फूटी सड़कों व जरूरी सुविधाओं को दोबारा ठीक करना है.

पत्थर, बर्फ, कीचड़ और मलबे के साथ आई इस बाढ़ ने चीन की सीमा के पास के इलाकों में भीषण तबाही मचाई है. इससे कई शहर बर्बाद हो गए और पनबिजली संयंत्रों को नुकसान पहुंचा है. अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि 900 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. लगभग 4,800 लोग अभी भी लापता हैं, जबकि बचाव लगातार जारी है.

यह विनाशकारी बाढ़ हिमालयी देश में उस समय आई है, जब 8-9 सितंबर, 2025 को ‘जेन-जी' के नेतृत्व में हुए भ्रष्टाचार-विरोधी प्रदर्शनों के एक वर्ष पूरे होने वाले हैं. इन्हीं प्रदर्शनों ने पिछली सरकार को गिरा दिया था और शाह को सत्ता दिलाई थी.

महज 36 साल के युवा पीएम और उनके मंत्रियों की नई-नवेली टीम के लिए यह पहला बड़ा राष्ट्रीय संकट है. पिछले एक दशक में नेपाल ने ऐसी भीषण तबाही नहीं देखी थी. अब बालेन सरकार के सामने इस संकट से पार पाने की असली परीक्षा है.

परिजनों के जीवित होने की खबर का इंतजार कर रहे हैं रिश्तेदार

चीनी और भारतीय विशेषज्ञों सहित बचाव दलों का मानना है कि निर्माणाधीन पनबिजली परियोजनाओं की सुरंगों में सैकड़ों मजदूर फंसे हुए हैं. ये सुरंगे विनाशकारी बाढ़ के कारण कीचड़ से भर गई थीं.

सुशीला गिरी अपने बेटे शिशिर की खबर का इंतजार कर रही थीं, जो काठमांडू विश्वविद्यालय का छात्र है और एक पनबिजली परियोजना में इंटर्नशिप कर रहा था. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "मुझे पता चला कि जब यह आपदा आई, तब मेरा बेटा और बाकी लोग प्रोजेक्ट के क्वार्टर में ही थे. कृपया मेरे बेटे को ढूंढ़ने में मेरी मदद करें.”

जेन जी एक्टिविस्ट रक्षा बाम ने पनबिजली परियोजनाओं में फंसे कर्मचारियों को बचाने में हो रही देरी पर चिंता जताई. उन्होंने सरकार से अपील की कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय से विशेष तौर पर मदद का अनुरोध करे.

आपदा प्रभावित जिलों में, परिवार के लोग अस्पतालों और अस्थायी राहत केंद्रों पर पहुंचे हैं, ताकि उन्हें अपने लापता परिजनों के बारे में कोई खबर मिल सके.

इंद्रा अधिकारी ने बाढ़ में अपना घर और धान के खेत खो दिए. उनके परिवार के चार लोग अभी भी लापता हैं. उन्होंने बताया कि बचाव और राहत काम सिर्फ उन्हीं इलाकों में होता दिख रहा है जहां सड़कें ठीक हैं और जहां मीडिया मौजूद है, खासकर त्रिशूली नदी के एक किनारे पर.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "त्रिशूली बाजार में आए ज्यादातर लोग बचाव दल के सदस्य नहीं बल्कि तमाशबीन हैं. नदी के पार और ऊपर की ओर दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचना अभी भी मुश्किल बना हुआ है.”

संकट से कैसे निपट रही है नई सरकार?

प्रशासन ने खुद माना है कि वह इतने बड़े पैमाने की आपदा से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था. यह नेपाल के लिए 2015 के उस विनाशकारी भूकंप के बाद सबसे जानलेवा आपदा है, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे और बहुत से लोग घायल हुए थे.

सूचना और संचार मंत्री बिक्रम तिमिलसिना ने बाढ़ प्रभावित इलाके का दौरा करने के बाद डीडब्ल्यू को बताया, "पहले दिन हम थोड़े असमंजस में थे कि इस संकट से कैसे निपटा जाए. हालांकि, दूसरे दिन से, हम तेजी से खोज, बचाव और राहत कार्यों में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं.”

आपदा के दौरान सुरक्षा एजेंसियों के काम की तारीफ हो रही है, खासकर हेलीकॉप्टर की मदद से दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने के उनके प्रयासों की. हालांकि इस आपदा ने सरकार की संकट से निपटने की क्षमता और नेपाल की प्रांतीय व स्थानीय सरकारों के साथ उसके तालमेल पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

नेपाल के पूर्व विदेश सचिव मधु रमण आचार्य ने डीडब्ल्यू को बताया, "जितने बड़े पैमाने पर तबाही हुई है, उसे देखते हुए सरकार ने जिस तेजी और मुस्तैदी से काम किया है, वो सच में काबिले-तारीफ है. शुरुआती खोज और बचाव को लेकर जो प्रयास किए गए और सुरक्षा एजेंसियों ने आपस में जैसा तालमेल दिखाया है, वो वाकई सराहनीय है.”

बाढ़ की चेतावनी के बीच नेपाल में लापता लोगों की तलाश जारी

हालांकि, भूकंप के बाद पुनर्निर्माण का काम देखने वाली संस्था ‘नेशनल रिकंस्ट्रक्शन अथॉरिटी' के पूर्व सीईओ गोविंदा पोखरेल की राय कुछ अलग है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने स्थानीय और प्रांतीय सरकारों को पूरी तरह से शामिल किए बिना, काफी हद तक खुद ही इस संकट से निपटने की कोशिश की है. यह बात इसलिए भी मायने रखती है, क्योंकि प्रधानमंत्री शाह की सत्ताधारी पार्टी ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी' की स्थानीय या प्रांतीय सरकारों में कोई मौजूदगी नहीं है.

पोखरेल ने यह सवाल भी उठाया कि क्या सरकार अपने अनुभव की कमी के कारण यह अंदाजा नहीं लगा पाई कि इस स्थिति से निपटने के लिए किस स्तर की तैयारी और कार्रवाई की जरूरत थी.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "हमारे पड़ोसी देश चीन और भारत शुरुआत से ही बचाव कार्यों, खासकर सुरंग से लोगों को निकालने के लिए मदद देने को तैयार थे. सरकार समय रहते यह तय नहीं कर पाई कि उनकी मदद ली जाए या नहीं, जिसकी वजह से तीन अहम दिन बर्बाद हो गए.”

क्या बालेन सरकार उम्मीदों पर खरी उतर पाएगी?

नेपाल ने शुरुआत में कहा था कि उसकी अपनी बचाव टीमें इस ऑपरेशन को संभालने में सक्षम हैं. लेकिन शुक्रवार तक, विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने मीडिया को बताया कि सरकार ने सुरंगों में बचाव कार्य, डीएनए जांच और फॉरेंसिक जांच के लिए चीन और भारत सहित अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मदद लेने का फैसला किया है.

फैसले में आए इस बदलाव ने नई सरकार के सामने खड़ी मुख्य चुनौतियों में से एक को उजागर कर दिया: क्या सरकार तेजी से बिगड़ते राष्ट्रीय संकट के दौरान तुरंत और असरदार तरीके से काम कर सकती है या नहीं.

पोखरेल ने कहा कि आपदा राहत के लिए देश के भीतर से ही भारी धन जुटाने के सरकार के फैसले ने जनता के भरोसे को साबित किया है. उन्होंने कहा, "एक अच्छी बात यह है कि सरकार देश के भीतर ही ‘प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष' के लिए जनता से बड़ी रकम इकट्ठा कर रही है. इससे सरकार पर जनता का भरोसा दिखता है कि वह राहत के नाम पर जमा किए गए फंड का गलत इस्तेमाल नहीं करती है.”

प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद कार्यालय के अनुसार, शनिवार तक बाढ़ पीड़ितों के लिए सरकार की ओर से चलाए जा रहे आपदा राहत कोष में 5 अरब नेपाली रुपये से ज्यादा रकम जमा हो चुकी थी.

नुवाकोट की बिदुर नगरपालिका की उप-मेयर प्रभा बोगती ने बताया कि संकट के दौरान स्थानीय अधिकारियों के पास काम करने के सीमित अधिकार थे. इसकी वजह यह थी कि केंद्र सरकार ने एक ‘एकल-द्वार' (वन-डोर) नीति अपनाई थी, जिसके तहत राहत के सभी कामों को एक ही कमांड स्ट्रक्चर के जरिए नियंत्रित करना जरूरी था.

नेपाल आपदा के बाद भारत ने हिमालय पर निगरानी बढ़ाई

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "इससे पहले के संकटों के दौरान, खोज, बचाव और राहत कार्यों में स्थानीय समुदायों और स्वयंसेवकों को शामिल किया जाता था.” बोगती ने आगे कहा कि हेलीकॉप्टर से बचाव कार्य तो असरदार रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया और ना ही उन्हें शवों को निकालने या अंतिम संस्कार करने की इजाजत दी गई.

सरकार के प्रवक्ता और शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने प्रशासन के कदमों का बचाव किया. उन्होंने कहा कि खोज, बचाव, राहत और पुनर्वास के कामों के लिए उपलब्ध सभी संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

पोखरेल ने पत्रकारों से कहा, "पहले चरण में हमारा ध्यान इस बात पर था कि जितने भी लोग और साधन हमारे पास उपलब्ध हैं, उनकी मदद से किसी तरह नागरिकों की जान बचाई जाए. इसके साथ ही, स्वयंसेवकों की तैनाती को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है.”

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