मेशकोर: बिना इंटरनेट के चलने वाला नेटवर्क

दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ती सेंसरशिप के बीच एक सवाल उठ रहा है कि जब संवाद के डिजिटल रास्ते बंद हो जाएं तो क्या किया जाए? इसका शायद जवाब एक छोटे रेडियो मॉड्यूल में छिपा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ती सेंसरशिप के बीच एक सवाल उठ रहा है कि जब संवाद के डिजिटल रास्ते बंद हो जाएं तो क्या किया जाए? इसका शायद जवाब एक छोटे रेडियो मॉड्यूल में छिपा है.जनवरी 2026 में ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. इस बीच सरकार ने लोगों को दुनिया से अलग करने के लिए पूरे देश का इंटरनेट बंद कर दिया. इंटरनेट निगरानी संगठन IODA के मुताबिक, इंटरनेट ट्रैफिक लगभग पूरी तरह गायब हो गया था. इंटरनेट विशेषज्ञ डग मैडोरी ने इसे "दुनिया का सबसे गंभीर इंटरनेट शटडाउन" कहा. वहीं, अंतरराष्ट्रीय चर्चा से दूर, उन्हीं हफ्तों में सरकारी कार्रवाई के कारण लगभग 18,000 लोग मारे गए.

यह सिर्फ ईरान की कहानी नहीं है. रूस, बेलारूस, म्यांमार और सूडान में भी सरकारें विरोध को रोकने के लिए इंटरनेट बैन का इस्तेमाल नियंत्रण के हथियार के रूप में करती हैं. सत्ता में बैठे लोगों की सोच साफ है, जो लोग एक दूसरे से संपर्क नहीं कर सकते, वे मिलकर आंदोलन भी नहीं कर सकते. ऐसे में दुनिया भर के एक्टिविस्ट पूछते हैं कि जब इंटरनेट बंद हो जाए या उस पर कड़ी निगरानी हो, तब लोगों तक संदेश कैसे पहुंचाया जाए?

इस सवाल का दिलचस्प जवाब मिलता है शौकिया रेडियो की दुनिया से.

इंटरनेट शटडाउन का जवाब है रेडियो

इस तकनीक का नाम 'लोरा' है, जिसका पूरा नाम 'लॉन्ग रेंज रेडियो' है. इसे शुरुआत में औद्योगिक सेंसरो के उपयोग के लिए विकसित किया गया था. इनके इस्तेमाल का तरीका बहुत आसान है. सिगरेट के पैकेट के जितने छोटे रेडियो मॉड्यूल, जो लगभग 20 यूरो यानी लगभग 2000 रुपये में मिल जाते हैं, कई किलोमीटर दूर तक सुरक्षित संदेश भेज सकते हैं. इसके लिए न वाई-फाई की जरूरत होती है, न मोबाइल नेटवर्क की और न ही इंटरनेट की.

इन छोटे उपकरणों को नोड्स कहा जाता है और यह ऐसी रेडियो फ्रीक्वेंसी का उपयोग करते हैं जिनके लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं होती. और तो और, इसकी फ्रीक्वेंसी दुनिया भर में आम नागरिकों के उपयोग के लिए उपलब्ध हैं. उदाहरण के तौर पर मौसम मापने वाले उपकरण और गैराज के दरवाजे खोलने वाले रिमोट भी इन्हीं फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करते हैं.

इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत यह है कि कई उपकरण एक साथ जुड़कर एक मेश नेटवर्क तैयार करते हैं. इसमें हर डिवाइस संदेश को अगले डिवाइस तक पहुंचाती है. यह ठीक वैसा ही है, जैसे लोगों की कतार में एक व्यक्ति दूसरे को कोई चीज देता जाए. अगर कोई एक डिवाइस काम करना बंद कर दे, तो संदेश किसी दूसरे रास्ते से पहुंच जाता है. यानी नेटवर्क खुद ही अपना रास्ता बना कर इसे ठीक कर लेता है.

इस नेटवर्क की बड़ी खासियत यह है कि इसका कोई केन्द्रीय नियंत्रण नहीं होता. इसलिए इसे बंद करना बेहद मुश्किल है. इसका न कोई सेवा प्रदाता होता है जिस पर प्रशासन दबाव डाल सके और न ही कोई सर्वर जिसे जब्त किया जा सके. यह छोटे-छोटे रेडियो उपकरण अलग-अलग जगहों पर लगाए जाते हैं और बैटरी या छोटे सोलर पैनल की मदद से ऊर्जा प्राप्त करते हैं.

इंटरनेट की तुलना में इस नेटवर्क का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसमें बहुत छोटे संदेश ही भेजे जा सकते हैं. एक बार में करीब 237 बाइट यानी 237 अक्षरों तक का संदेश ही भेजा जा सकता है. लेकिन यही इसकी ताकत भी है, क्योंकि कम डाटा के कारण सिग्नल ज्यादा दूर तक जाता है, कम बैटरी खर्च होती है और लोकेशन का पता लगने का खतरा भी कम रहता है.

'लोरा' नेटवर्क: जब बातचीत रहे अपने लोगों के बीच

इस तकनीक पर आधारित दो सबसे लोकप्रिय सिस्टम मेशटैस्टिक और मेशकोर हैं. इन्हें कोई भी मुफ्त में इस्तेमाल कर सकता है. ये ओपन-सोर्स हैं और इन्हें चलाने के पीछे कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है.

इन दोनों सिस्टमों की एक बड़ी खासियत मजबूत गोपनीयता है. नेटवर्क के बीच में मौजूद डिवाइस संदेश को आगे तो भेजते हैं, लेकिन उसे पढ़ नहीं सकते. इस कारण किसी तीसरे पक्ष, पुलिस या सरकारी एजेंसी के लिए बातचीत में दखल देना आसान नहीं होता.

"आपका संवाद, आपकी सुरक्षा का अधिकार और आपका नियंत्रण" नामक संदेश मेशकोर की वेबसाइट पर दिया गया है. इसका मतलब है, जो संदेश भेजता है, नियंत्रण उसी के हाथ में रहता है. यूक्रेन में मेशटैस्टिक-यूए जैसे प्रोजेक्ट दिखाते हैं कि युद्ध जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी यह प्रणाली उपयोगी हो सकती है. यह प्रोजेक्ट गिटहब नामक क्लाउड प्लेटफॉर्म पर मौजूद है. एक सार्वजनिक रीयल-टाइम नेटवर्क मैप पूरे देश में सक्रिय नोड्स दिखाता है, जिनमें से कई, मोर्चे के आसपास मौजूद हैं. मेशकोर भी दुनिया भर में फैले नोड्स का मैप दिखाता है. हालांकि, कई उपयोगकर्ता सुरक्षा कारणों से अपनी लोकेशन छिपाकर रखते हैं.

सेंसरशिप के खिलाफ एक मजबूत नेटवर्क

जब किसी सरकार को ऑनलाइन गतिविधियों पर नियंत्रण करना होता है, तो वह अक्सर वेबसाइटों को ब्लॉक करती है, डाटा ट्रैफिक की गहराई से जांच करती है और इंटरनेट कंपनियों को नियमों के तहत सहयोग के लिए बाध्य करती है.

उदाहरण के तौर पर, रूस में सेंसरशिप एजेंसियां दूरसंचार कंपनियों को कानून के तहत डाटा साझा करने के लिए मजबूर करती हैं. आदेश न मानने पर कंपनी अपना लाइसेंस खो सकती है. हालांकि, यह निगरानी तभी संभव है, जब संचार इंटरनेट नेटवर्क पर आधारित हो.

यही कारण है कि लोरा मेश नेटवर्क को रोकना मुश्किल माना जाता है. इसमें ब्लॉक करने के लिए कोई सर्वर या इंटरनेट सेवा नहीं होती. संदेश सीधे रेडियो तरंगों के जरिए आगे बढ़ते हैं, जिससे वे कई निगरानी और सेंसरशिप प्रणालियों से बच निकलते हैं.

हर तकनीक की तरह इसमें भी जोखिम

हालांकि, इस तकनीक की भी अपनी सीमाएं हैं. साथ ही, सख्त सरकारी नियंत्रण वाले देशों में ये सीमाएं जानलेवा भी साबित हो सकती हैं.

इस तकनीक का सबसे बड़ा जोखिम लोकेशन ट्रैकिंग है. संदेश भले ही एन्क्रिप्टेड हों, लेकिन रेडियो सिग्नल का स्रोत खोजा जा सकता है. विशेष तकनीक की मदद से अधिकारी यह पता लगा सकते हैं कि सिग्नल कहां से आ रहा है, भले ही उन्हें संदेश का कंटेंट न पता हो. हालांकि, अगर ट्रांसमीटर किसी अलग या छिपे हुए स्थान पर रखा गया हो, तो उसके पीछे मौजूद लोगों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है.

एक और चुनौती यह है कि मेश नेटवर्क तभी प्रभावी बनता है, जब उसमें पर्याप्त संख्या में लोग और उपकरण जुड़े हों. कम डिवाइस जुड़े होने पर नेटवर्क की पहुंच भी सीमित रह जाती है और संदेश दूर तक पहुंचाने में भी दिक्कत होती है. साथ ही, पूरा नेटवर्क तैयार करने में समय लगता है, जो किसी अचानक पैदा हुई युद्ध की स्थिति में उपलब्ध नहीं होता.

आखिर में, कानूनी खतरे को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कई देशों में बिना अनुमति वाली रेडियो तकनीक का उपयोग अपराध माना जाता है. ईरान या रूस जैसे देशों में तो केवल ऐसे उपकरण रखने भर से भी गंभीर कानूनी नतीजों का सामना करना पड़ सकता है.

किताबी बातें या जमीनी हकीकत?

फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि सेंसरशिप वाले देशों में कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर लोरा मेश नेटवर्क का उपयोग कर रहे हैं या नहीं. इसका कारण यह है कि ऐसे नेटवर्क चलाने वाले लोग जानबूझकर अपनी पहचान और गतिविधियों को छिपाकर रखते हैं.

लेकिन यूक्रेन का अनुभव बताता है कि यह तकनीक संकट और संघर्ष जैसी परिस्थितियों में भी उपयोगी साबित हो सकती है. इसकी हार्डवेयर डिवाइस आसानी से खरीदी जा सकती हैं. इसके अलावा, इसे चलाने के लिए बहुत अधिक तकनीकी ज्ञान की जरूरत नहीं होती.

नोड: छोटा उपकरण, बड़ा सवाल

लोरा-मेश कोई जादुई समाधान नहीं है और न ही यह पूरी डिजिटल सुरक्षा की जगह ले सकता है. लेकिन, यह एक ऐसा साधन है जो कम लागत पर, बिना किसी केंद्रीय नियंत्रण के और कई तरह की सेंसरशिप के बीच भी काम कर सकता है.

जब सरकारें इंटरनेट पर नियंत्रण बढ़ा रही हों और ऑनलाइन विकल्प सीमित होते जा रहे हों, तब यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि लोगों के पास संवाद बनाए रखने के लिए क्या बचता है­?

ऐसे में, इस सवाल का जवाब शायद यह 20 यूरो यानी लगभग 2000 रुपये का छोटा सा रेडियो उपकरण हो सकता है.

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