देश की खबरें | महज मेधा सूची में नाम शामिल होना ही नियुक्ति का अधिकार नहीं देता : न्यायालय
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, सात अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि चयन सूची में अभ्यर्थियों का नाम शामिल होना मात्र ही किसी अभ्यर्थी को नियुक्ति का अधिकार प्रदान नहीं करता है। न्यायालय ने इसके साथ ही दिल्ली उच्च न्यायालय का वह आदेश निरस्त कर दिया, जिसमें दिल्ली पुलिस को दो लोगों को बतौर सिपाही नियुक्त करने का निर्देश दिया था जबकि वे अंतिम मेधा सूची में जगह पाने में असफल हो गये थे।

शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस में 523 सिपाहियों की भर्ती के लिये दिल्ली पुलिस की नियुक्ति की प्रक्रिया की कड़ी आलोचना की। इन पदों पर भर्तियों के लिये 2013 में नोटिस प्रकाशित किया गया था लेकिन नियुक्ति 2016 में हुयी और वह भी कानूनी लड़ाई की वजह से मेधा सूची कई बार रद्द करने और उनका पुनरीक्षण करने के बाद हुआ था।

यह भी पढ़े | Unlock 5.0 Restaurant Reopening in Delhi: दिल्ली में रेस्टोरेंट 24 घंटे खोलने की अनुमति, परमिट राज भी होगा समाप्त.

न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी की पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘सार्वजनिक पदों के लिये भर्ती की प्रक्रिया में इस तरह की अनियमिततायें विभिन्न स्तरों पर पहले अधिकरणों में, फिर उच्च न्यायालयों और आखिर में इस न्यायालय में कानूनी लड़ाई की वजह बन रही हैं। अधिकांश मुकदमे और सार्वजनिक पदों पर भर्ती में विलंब को टाला जा सकता है यदि इस काम की जिम्मेदारी निभाने वाले पूरी कर्मठता और जिम्मेदारी से इसे करें।’’

न्यायालय ने इस भर्ती प्रक्रिया में विलंब के घटनाक्रम का भी जिक्र अपने फैसले में किया।

यह भी पढ़े | RBI ने कार्यकारी निदेशक एम. राजेश्वर राव को डिप्टी-गवर्नर नियुक्त किया: 7 अक्टूबर 2020 की बड़ी खबरें और मुख्य समाचार LIVE.

इस भर्ती के लिये अक्टूबर, 2013 में शारीरिक परीक्षण की प्रक्रिया के बाद 39,000 से अधिक अभ्यर्थी आठ मार्च 2014 को हुयी लिखित परीक्षा में शामिल हुये लेकिन यह रद्द हो गयी।

फिर से 25 मई, 2014 को लिखित परीक्षा हुयी लेकिन इस बार भी इसे रद्द कर दिया गया। अंतत: नवंबर, 2014 में परीक्षा संपन्न हुयी और ओएमआर तालिका के आकलन के बाद 13 जुलाई, 2015 को 514 अभ्यर्थियों का अस्थायी रूप से चयन किया गया।

लेकिन एक बार फिर नियुक्ति की प्रक्रिया अटक गयी और मेधा सूची फिर से तैयार की गयी क्योंकि उन उम्मीदवारों को बोनस अंक नहीं दिये जा सके थे जिनकी शारीरिक परीक्षण में ऊंचाई 178 सेमी या इससे अधिक थी।

नयी मेधा सूची 17 जुलाई, 2015 को घोषित हुयी, जिसमें 32 नये उम्मीदवार शामिल थे जबकि 34 पुराने अभ्यर्थी इससे बाहर हो गये थे।

इसे लेकर कुछ अभ्यर्थियों ने कैट में मामला दायर कर आरोप लगाया कि कुछ सवालों के उत्तर गलत थे।

इसके बाद, विशेषज्ञ समिति का गठन हुआ और फिर 22 फरवरी, 2016 को अंतिम परिणाम घोषित हुआ, जिसमें 129 नये अभ्यर्थी शामिल हो गये और पहले की सूची में शामिल 123 अभ्यर्थी इससे बाहर हो गये।

अन्य पिछड़े वर्ग की श्रेणी से पहले चयनित और बाद में सूची से बाहर होने वाले उमेश कुमार और सत्येन्द्र सिंह को दिल्ली उच्च न्यायालय से राहत मिली क्योंकि उसने दिल्ली पुलिस को इन दोनों को सिपाही के पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया था।

शीर्ष अदालत ने अपने पहले के फैसले का हवाला देते हुये कहा कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या प्रतिवादी रिट अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत राहत के हकदार थे। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या नियुक्ति के लिये उनका हक है और निश्चित ही इसका जवाब नकारात्मक है।

पीठ ने कहा, ‘‘हमारा मत है कि दिल्ली उच्च न्यायालय का छह दिसंबर, 2018 का फैसला कानून के अनुरूप नहीं है। उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ताओं को प्रतिवादियों को दिल्ली पुलिस में सिपाही (कार्यकारी) के पद पर नियुक्ति का परमादेश देकर स्पष्ट रूप से गलत किया।’’

पीठ ने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय का निर्देश कानून के विपरीत था। प्रतिवादियों ने चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया था और परिवर्तित नतीजे घोषित होने के बाद न्यायालय के समक्ष यह सामने आया कि वे ओबीसी श्रेणी के लिये निर्धारित कट ऑफ से अधिक अंक पाने में असफल रहे।’’

अनूप

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)