क्या फेमिनिज्म में पुरुषों की कोई जगह नहीं है?

"फेमिनिज्म में मर्दों की कोई जगह नहीं है," यह नारीवाद के खिलाफ सबसे आम भ्रांतियों में से एक है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

"फेमिनिज्म में मर्दों की कोई जगह नहीं है," यह नारीवाद के खिलाफ सबसे आम भ्रांतियों में से एक है. सच यह है कि नारीवादी आंदोलन में पुरुषों की भी उतनी ही बात हुई है, जितनी महिलाओं की.फेमिनिज्म के बारे में एक आम समझ यही कहती है कि यह विचारधारा सिर्फ महिलाओं के लिए है. इसमें पुरुषों की कोई जगह नहीं है. लेकिन क्या नारीवाद सिर्फ महिलाओं की बात करता है? ऐसा बिल्कुल नहीं है.

नारीवाद सभी के लिए समान राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिकारों की वकालत करता है. नारीवाद हर उस इंसान के लिए बराबरी की बात करता है, जिसे समाज में किसी-न-किसी तरीके से दबाया गया हो. इसमें पुरुष भी शामिल हैं.

नारीवाद की लड़ाई ना पुरुषों से है, न कभी थी. इसके उलट नारीवाद इस बात में यकीन करता है कि समाज में लैंगिक बराबरी लाने के लिए पुरुषों की भूमिका भी उतनी ही अहम है, जितनी महिलाओं की.

मैरी वुलस्टोनक्राफ्ट को वर्स्ट वेव फेमिनिज्म की ‘मदर' के तौर पर जाना जाता है. उनका मानना था कि पुरुष और महिला, दोनों ही इंसान हैं और उनके पास जीवन, आजादी और खुश रहने के तरीके खोजने का अधिकार है. यानी, नारीवादी आंदोलन और नारीवादियों ने शुरुआत से ही सबके लिए बराबरी की मांग की.

मर्द, मर्दानगी और फेमिनिज्म

पुरुषों को हमेशा नारीवादी विचारधारा से पीड़ित समूह की तरह पेश किया गया है. नारीवाद में पुरुषों की कोई जगह नहीं है, इस मिथक को लगातार मजबूत किया गया. लेकिन इसके उलट नारीवादी आंदोलन पुरुषों को पितृसत्ता की बनाई रूढ़िवादी कैद से आजाद करने में लगा हुआ है. नारीवादी सदियों से चले आ रहे जेंडर रोल, यानी लैंगिक भूमिकाओं को चुनौती देते हैं, उनका विरोध करते हैं. इसका फायदा पुरुषों को भी मिलता है.

लैंगिक भूमिकाएं किसी इंसान के जन्म के साथ ही तय कर दी जाती हैं. वह कैसा व्यवहार करेगा, कैसे कपड़े पहनेगा, कौन से काम करेगा, खुद को कैसे व्यक्त करेगा जैसे सारे फैसले पितृसत्तात्मक ढांचे के तहत लिए जाते हैं. यही ढांचा पुरुषों को सिखाता है कि उन्हें रोना नहीं है. उन्हें अपनी भावनाएं खुद तक रखनी हैं. खुलकर व्यक्त करने वाले पुरुष 'कमजोर' माने जाते हैं. आज भी कई पुरुष मानते हैं कि घर के काम उनके लिए नहीं बने और यह भी कि महिलाएं उनसे कमतर हैं.

चिममहनदह गोजी अदीचे अपनी किताब 'वी शुड ऑल बी फेमिनिस्ट' में लिखती हैं, "कुछ पुरुष नारीवाद से डरते हैं. मुझे लगता है कि यह उस असुरक्षा से आता है, जिस तरीके से लड़कों को बड़ा किया जाता है. अगर वे एक मर्द के तौर पर स्वाभाविक रूप से मालिक नहीं हैं, तो उनका आत्मसम्मान कम हो जाता है."

पितृसत्तात्मक सोच के तहत पुरुषों को हर स्तर पर अपनी 'मर्दानगी' साबित करनी पड़ती है. यह पितृसत्तात्मक दबाव, पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह है. इस तरह यह ढांचा जितना महिलाओं के लिए नुकसानदायक है, उतना ही पुरुषों के लिए भी है. इसलिए नारीवाद जेंडर आधारित भूमिकाओं और रूढ़िवादी सोच को चुनौती देता है. रिसर्च बताती हैं कि समाज में लैंगिक बराबरी की बेहतरी के साथ-साथ पुरुष और महिला, दोनों ही लंबा जीवन जीते हैं.

क्या पुरुष बन सकते हैं फेमिनिज्म का हिस्सा?

किसी भी आंदोलन के सफल होने के लिए उसे अधिक-से-अधिक समर्थन की जरूरत होती है. ठीक इसी तरह नारीवादी आंदोलन में भी पुरुष हिस्सा ले सकते हैं. जेंडर के आधार पर मिले विशेषाधिकारों के कारण पुरुषों ने ऐतिहासिक रूप से पितृसत्ता को आगे बढ़ाया है. ऐसे में वे इन्हीं विशेषाधिकारों का इस्तेमाल कर लैंगिक बराबरी के मुद्दों को आगे ले जा सकते हैं क्योंकि उनके पास दूसरे जेंडर के मुकाबले अधिक सत्ता, मौके और मंच हैं.

नारीवाद इस बात पर भी जोर देता है कि पुरुष अपने विशेषाधिकारों को पहचानें, ताकि समाज में लैंगिक बराबरी आ सके. अगर हम यह समझ जाएं कि पितृसत्ता पुरुषों के भी खिलाफ है, तो हमारे लिए यह मानना आसान हो जाएगा कि नारीवाद कैसे पुरुषों के अधिकारों की भी बात करता है. पुरुष नारीवाद से पीड़ित नहीं हैं, बल्कि यह विचारधारा पितृसत्ता को चुनौती देकर उन्हें फायदा ही पहुंचा रही है.

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