देश की खबरें | बिहार में प्रस्तावित जाति जनगणना में ‘‘घुसपैठियों’’ को बाहर रखा जाना चाहिए: गिरिराज सिंह

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बुधवार को कहा कि बिहार में प्रस्तावित जाति आधारित जनगणना में ‘‘बांग्लादेशियों’’ और ‘‘रोहिंग्या’’ जैसे ‘‘घुसपैठियों’’ को ‘‘तुष्टिकरण की राजनीति’’ के तहत स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इन्हें उससे बाहर रखा जाना चाहिए।

कटिहार, एक जून केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बुधवार को कहा कि बिहार में प्रस्तावित जाति आधारित जनगणना में ‘‘बांग्लादेशियों’’ और ‘‘रोहिंग्या’’ जैसे ‘‘घुसपैठियों’’ को ‘‘तुष्टिकरण की राजनीति’’ के तहत स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इन्हें उससे बाहर रखा जाना चाहिए।

भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में शामिल होने के लिए उत्तर बिहार के इस शहर आए भाजपा नेता सिंह ने देश में धर्मांतरण रोधी मजबूत कानून की जरूरत बताते हुए कहा कि ‘‘अल्पसंख्यक’’ शब्द के इस्तेमाल को खत्म करने और विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा उत्पीड़न के प्रतीक सभी चिह्नों को मिटाने की जरुरत है, जैसे वाराणसी में ज्ञानवानी मस्जिद।

बिहार के बेगूसराय लोकसभा सीट से सांसद सिंह ने पत्रकारों के साथ ज्वलंत मुद्दों पर अपनी व्यक्तिगत राय पार्टी के कई सहयोगियों की मौजूदगी में साझा की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में होने वाली सर्वदलीय बैठक से कुछ घंटे पहले केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वह राज्य सरकार के इस कदम के पूर्ण समर्थन में हैं। उन्होंने कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का लाभ उठाने वाले मुसलमानों को भी इस कवायद के तहत शामिल किया जाना चाहिए।

उन्होंने 1990 के दशक में दायर एक याचिका का हवाला देते हुए दावा किया कि बिहार के 11 जिलों में ‘अवैध प्रवासियों’ की आबादी उस समय लगभग चार लाख थी जिनका जिक्र तुष्टीकरण की राजनीति के कारण नहीं किया जाता है। सिंह ने उन ‘अवैध प्रवासियों’ को इस कवायद के तहत शामिल नहीं करने की आवश्यकता को रेखांकित किया जो उन्हें वैधता प्रदान कर सकती है।

सिंह ने कहा, ‘‘चाहे वे बांग्लादेशी हों, रोहिंग्या या किसी अन्य प्रकार के अवैध निवासी हों, उन्हें इस अभ्यास से बाहर रखा जाना चाहिए।’’

कट्टर हिंदुत्व रुख के लिए जाने जाने वाले केंद्रीय मंत्री ने हिंदुओं के कथित धर्मांतरण के खिलाफ मजबूत धर्मांतरण रोधी कानून की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के आदर्श वाक्य के आलोक में अल्पसंख्यक शब्द को फिर से परिभाषित करने और यहां तक कि इस शब्द को खत्म करने की आवश्यकता है।

सिंह ने कहा, ‘‘यहां तक कि (महमूद) मदनी ने भी कहा है कि वह अल्पसंख्यक समूह से संबंधित नहीं हैं, सभी समान विचारधारा वाले लोगों को ध्यान में रखते हुए मुसलमानों को खुद को बहुमत में मानना चाहिए।’’

ज्ञानवापी विवाद और परिसर में किए गए एक सर्वेक्षण के वीडियो फुटेज के लीक होने और 1991 के उपासना स्थल अधिनियम जैसे पहलुओं के बारे में पूछे जाने पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि चूंकि मामला अदालत में विचाराधीन है, वह ऐसे मामले पर टिप्पणी नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा, ‘‘एक संवैधानिक पद पर रहते हुए मैं ऐसे मामले पर ज्यादा टिप्पणी नहीं कर सकता जो अदालत के समक्ष विचाराधीन है। बहरहाल मेरे विचार से उपासना स्थल अधिनियम ज्ञानवापी पर लागू नहीं होता है। हमें यह भी समझना चाहिए कि वीडियो फुटेज के लीक होने को लेकर मुसलमान इतने परेशान क्यों हैं’’।

सिंह ने यह भी कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद ‘‘औरंगजेब की क्रूरता का प्रतीक’’ है और ‘‘सभी आक्रमणकारियों, चाहे वह बाबर, अकबर या शेरशाह’’ से जुड़े ऐसे सभी प्रतीकों को मिटाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर सरदार पटेल लंबे समय तक जीवित रहते और राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति होते तो यह मामला सुलझ गया होता। लेकिन (जवाहरलाल) नेहरू की तुष्टीकरण की राजनीति ने रुकावटें डाल दीं। यह अनावश्यक था। आखिर धर्म के नाम पर देश का बंटवारा हुआ था।’’

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