देश की खबरें | प्राथमिकी रद्द करने के लिए हाईकोर्ट ‘मसौदा आरोप पत्र’ पर भरोसा नहीं कर सकता: न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में शुक्रवार को कहा कि आपराधिक मुकदमा निरस्त करने के लिए उच्च न्यायालय उस “मसौदा आरोप पत्र’’ पर भरोसा नहीं कर सकता, जिसे पुलिस ने अभी तक मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर ही नहीं किया है।

नयी दिल्ली, 12 नवंबर उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में शुक्रवार को कहा कि आपराधिक मुकदमा निरस्त करने के लिए उच्च न्यायालय उस “मसौदा आरोप पत्र’’ पर भरोसा नहीं कर सकता, जिसे पुलिस ने अभी तक मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर ही नहीं किया है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह बहुत ही पुराना कानून है कि उच्च न्यायालयों को अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल 'संयम और सावधानी के साथ’ करना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय का यह फैसला गुजरात उच्च न्यायालय के उस निर्णय के खिलाफ दायर एक आपराधिक अपील पर आया, जिसमें उसने आठ जनवरी, 2019 को राजकोट में एक भूखंड के खरीदारों से धन ऐंठने के आरोप में कई लोगों के खिलाफ दायर प्राथमिकी रद्द कर दी थी।

उच्च न्यायालय ने पुलिस को कुल नौ में से दो आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। इसने पुलिस को मजिस्ट्रेट अदालत में आरोप पत्र दायर करने से पहले मसौदा आरोप पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था और उसके अवलोकन के बाद कुछ आरोपियों के खिलाफ दायर प्राथमिकी खारिज कर दी थी।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि गुजरात उच्च न्यायालय ने प्राथमिकी रद्द करने में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए 'सीमाओं का उल्लंघन’ किया।

फैसले में कहा गया है, “हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उच्च न्यायालय ने प्राथमिकी और सभी परिणामी कार्यवाही को रद्द करने में सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल की सीमाओं का उल्लंघन किया है। उच्च न्यायालय द्वारा प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग किया गया है। हम तदनुसार उच्च न्यायालय के आठ जनवरी 2019 के संबंधित निर्णय और आदेश को निरस्त करते हैं और आपराधिक अपीलों की अनुमति देते हैं।’’

पीठ के लिए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ द्वारा लिखे गये फैसले में कहा गया है, ''यह स्थापित कानून है कि उच्च न्यायालय को धारा 482 (आपराधिक मामलों को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालयों की शक्ति) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल संयम और सावधानी से करना चाहिए।’’

पीठ ने अपने 27 पन्नों के फैसले में कहा, ''हालांकि, उच्च न्यायालय एक ‘मसौदा आरोप पत्र’ पर भरोसा नहीं कर सकता, जिसे धारा 482 के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए मजिस्ट्रेट के सामने रखा जाना शेष है।’’

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