भारत में बढ़ रही आईबीडी की समस्या से निपटने के लिए दिशा-निर्देशों की आवश्यकता: विशेषज्ञ

उन्होंने यह भी कहा कि दिशा-निर्देशों में आईबीडी का शुरू में ही निदान सुनश्चित किया जाना चाहिए।

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नयी दिल्ली, 18 मई विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में निदान में विलंब के चलते प्रदाहक आंत्र रोग (आईबीडी) की समस्या की गंभीरता बढ़ रही है और भारत सरकार को इसकी रोकथाम तथा उपचार में लगने वाली भारी भरकम राशि में कटौती के लिए मानक दिशा-निर्देश तय करने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि दिशा-निर्देशों में आईबीडी का शुरू में ही निदान सुनश्चित किया जाना चाहिए।

विश्व जठरांत्र विज्ञान संगठन के अनुसार यह बीमारी अज्ञात कारणों से उत्पन्न होने वाली दीर्घकालिक प्रदाहक आंत संबंधी स्थितियों का एक समूह है।

आईबीडी के अंतर्गत दो मुख्य श्रेणियां- ‘क्रोन्स बीमारी’ (सीडी) और ‘अल्सरेटिव कोलाइटिस’ (यूसी) आती हैं।

पाचन तंत्र में सूजन, दस्त, कब्ज, दर्द या मल के साथ रक्त आने जैसी स्थिति इस बीमारी के लक्षण हैं।

विशेषज्ञों ने 19 मई को आईबीडी दिवस से पहले कहा कि मौजूदा स्थिति यह है कि भारत में आईबीडी के असल रोगियों की संख्या पता ही नहीं है क्योंकि इस बीमारी से संबंधित आंकड़ों की कोई उचित प्रणाली नहीं है। देश में न ही कोई ऐसी व्यवस्था है जिससे मरीजों को गलत इलाज की वजह से गंभीर स्थिति में जाने से रोका जा सके।

उनका यह भी कहना है कि देश में इस बीमारी के बारे में जागरूकता का घोर अभाव है।

एआईजी हैदराबाद की जानी-मानी उदर रोग विशेषज्ञ डॉ. रूपा बनर्जी ने कहा, ‘‘आईबीडी पर भारत के लिए तत्काल मानक दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है। विश्व के इस हिस्से में यह समस्या बढ़ रही है और हम इसके रोगियों की असल संख्या के बारे में नहीं जानते।’’

आईबीडी पर बनर्जी के कई पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।

उन्होंने कहा कि भारत में अभी बीमारी के निदान में काफी विलंब होता है।

बनर्जी ने कहा, ‘‘प्रत्येक रोगी औसतन दो साल तक कम से कम पांच-छह डॉक्टरों के पास जाता है और तब उसे पता चलता है कि उसे आईबीडी है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और फिर उसे इसे नियंत्रण में रखने के लिए महंगी दवाएं खानी पड़ती हैं।’’

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में जठरांत्र विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. विनीत आहूजा ने कहा कि 20 से 29 और 30 से 39 साल तक की उम्र के लोग अपनी निष्क्रिय जीवनशैली और बीमारी के बारे में जागरूकता न होने की वजह से आईबीडी से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं।

उन्होंने पीटीआई- से कहा, ‘‘एशिया में फिलहाल इस बीमारी का सर्वाधिक भार है और वह भी 20 से 29 और 30 से 39 साल की उम्र तक की युवा आबादी में। वे सर्वाधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि जागरूकता के अभाव में इसका निदान देर से होता है और इसे आम तौर पर पेट की दस्त जैसी सामान्य समस्या माना जाता है।’’

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